Adhyaya 108
Anushasana ParvaAdhyaya 10844 Verses

Adhyaya 108

ज्येष्ठ-कनिष्ठ-धर्मः — Duties of Elders and Juniors (Anuśāsana-parva 108)

Upa-parva: Ācāra–Jyeṣṭha-Dharma (Conduct and Duties toward Elders) — discourse unit within Anuśāsana-parva

Yudhiṣṭhira asks Bhīṣma to define correct reciprocal conduct between elder and younger siblings. Bhīṣma replies that Yudhiṣṭhira should embody the steadiness of an elder, stressing that a teacher’s (guru’s) conduct carries greater weight than a student’s and that one cannot properly ‘manage’ an unwise superior—highlighting asymmetry of authority and the need for discernment. He advises that even the capable may appear ineffective in adverse conditions, and that speech should be framed with ‘parihāra’ (avoidance/mitigation) to prevent transgression and escalation. The chapter warns that people with divided hearts, including rivals, exploit fissures—especially when prosperity inflames envy—so family unity must be actively protected. The elder can elevate or ruin the lineage; an elder who harms a younger forfeits status and may be subject to regulation by rulers. Unjust conduct leads to demerit and reputational collapse. Norms of fair shares are indicated: wrongdoing disqualifies from portions, and an elder should not arrange marriage-wealth without providing for juniors; paternal inheritance is distinguished from self-earned property. The text forbids unequal allotment among sons and prohibits contempt toward elders even if one perceives personal excellence, grounding hierarchy in dharma. It ranks authorities—mother, father, teacher—and states that after the father’s death the elder brother functions as a father, maintaining and protecting juniors, who in turn honor and depend upon him. It closes by extending maternal equivalence to the elder sister and certain affinal relations, emphasizing kinship as a moral infrastructure.

Chapter Arc: राजा से कहा जाता है कि जो इस प्रसंग को नित्य सुनता और कहता है, वह शुभ लोकों को प्राप्त होता है—इस वचन से अध्याय का द्वार ‘श्रवण-कीर्तन’ की पुण्य-प्रतिज्ञा पर खुलता है। → फिर उपदेश सूक्ष्म आचार-विधानों में उतरता है: रात्रि-आचरण, भोजन के बाद की मर्यादा, कुछ पदार्थों का निषेध (विशेषतः रात में), और ऐसे व्यवहार जिनसे आयु, यश और कुल-प्रतिष्ठा क्षीण होती है। → स्त्री-रक्षा और काम-नियमन का कठोर शिखर आता है—ईर्ष्या को अनायुष्य बताकर त्यागने की आज्ञा, परस्त्रीगमन को आयु-नाशक पाप कहकर दृढ़ निषेध, तथा गृहस्थ-धर्म की मर्यादा को ‘यत्नतः’ साधने का आग्रह। → अध्याय सामाजिक-धर्म के व्यावहारिक निष्कर्ष पर टिकता है: विवाह-योग्य कन्या का योग्य वर से विवाह, संतान-व्यवस्था, और कुल-पालन—गृहस्थ के लिए नीति को कर्म-रूप में बाँधकर।

Shlokas

Verse 104

(य इमं शृणुयान्नित्यं यश्चापि परिकीर्तयेत्‌ स शुभानू प्राप्तुते लोकान्‌ सदाचारव्रतान्नूप ।।) नरेश्वर! जो प्रतिदिन इस प्रसंगको सुनता और कहता है, वह सदाचार-व्रतके प्रभावसे शुभ लोकोंमें जाता है ।। इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि आयुष्याख्याने चतुरधिकशततमो<ध्याय:

ભીષ્મે કહ્યું—હે નરેશ્વર! જે આ પ્રસંગને નિત્ય સાંભળે છે અને જે તેનો ઉચ્ચાર પણ કરે છે, તે સદાચાર-આધારિત વ્રતોના પ્રભાવથી શુભ લોકોને પ્રાપ્ત કરે છે।

Verse 119

नक्तं न कुर्यात्‌ पित्र्याणि भुक्त्वा चैव प्रसाधनम्‌

ભીષ્મે કહ્યું—રાત્રે પિતૃકાર્ય કરવું નહિ; અને ભોજન કર્યા પછી પ્રસાધન અથવા શૌચ-શુદ્ધિ માટેની વિધિ-તૈયારી પણ કરવી નહિ।

Verse 120

वर्जनीयाश्रैव नित्यं सक्तवो निशि भारत

ભીષ્મે કહ્યું—હે ભારત! કેટલાક કર્મો અને આસક્તિઓ સદાય વર્જનીય છે—વિશેષ કરીને જે રાત્રે આસક્તિ પેદા કરે છે।

Verse 121

शेषाणि चैव पानानि पानीयं चापि भोजने । भरतनन्दन! रातमें सत्तू खाना सर्वथा वर्जित है। अन्न-भोजनके पश्चात्‌ जो पीनेयोग्य पदार्थ और जल शेष रह जाते हैं, उनका भी त्याग कर देना चाहिये ।। सौहित्यं न च कर्तव्यं रात्री न च समाचरेत्‌

ભીષ્મે કહ્યું—હે ભરતનંદન! રાત્રે સત્તૂનું સેવન સર્વથા વર્જ્ય છે. ભોજન પછી જે પીવા યોગ્ય પદાર્થો અને પાણી શેષ રહે, તેનો પણ ત્યાગ કરવો જોઈએ. અતિ તૃપ્તિ સુધી ખાવું નહિ અને રાત્રે આવું આચરણ પણ ન કરવું।

Verse 122

महाकुले प्रसूतां च प्रशस्तां लक्षणैस्तथा

ભીષ્મે કહ્યું—(વિવાહ માટે) મહાન અને પ્રતિષ્ઠિત કુળમાં જન્મેલી તથા શુભ લક્ષણો અને ગુણોથી પ્રશંસિત એવી સ્ત્રીને પસંદ કરવી જોઈએ।

Verse 123

अपत्यमुत्पाद्य तत: प्रतिष्ठाप्प कुलं तथा

સંતાન ઉત્પન્ન કરીને પછી યથાવિધી કુળપરંપરાને પ્રતિષ્ઠિત કરી સ્થિર રાખવી જોઈએ.

Verse 124

पुत्रा: प्रदेया ज्ञानेषु कुलधर्मेषु भारत । भारत! उसके गर्भसे संतान उत्पन्न करके वंश-परम्पराको प्रतिष्ठित करे और ज्ञान तथा कुलधर्मकी शिक्षा पानेके लिये पुत्रोंको गुरुके आश्रममें भेज दे ।। कन्या चोत्पाद्य दातव्या कुलपुत्राय धीमते

હે ભારત! પુત્રોને શાસ્ત્રજ્ઞાન અને કુળધર્મોની શિક્ષા માટે ગુરુના આશ્રમમાં સોંપવા જોઈએ; અને કન્યા જન્મે તો સારા કુળના બુદ્ધિમાન યોગ્ય યુવકને વિવાહમાં આપવી જોઈએ.

Verse 125

शिर:स्नातो<थ कुर्वीत दैवं पित्रमथापि च,भारत! मस्तकपरसे स्नान करके देवकार्य तथा पितृकार्य करे। जिस नक्षत्रमें अपना जन्म हुआ हो उसमें एवं पूर्वा और उत्तरा दोनों भाद्रपदाओंमें तथा कृत्तिका नक्षत्रमें भी श्राद्धका निषेध है

હે ભારત! શિરઃસ્નાન કરીને પછી દેવકાર્ય તથા પિતૃકાર્ય કરવું જોઈએ; અને વિધિનિયમ મુજબ પોતાના જન્મનક્ષત્રમાં, પૂર્વા-ઉત્તરા ભાદ્રપદા બંનેમાં તથા કૃત્તિકામાં શ્રાદ્ધ નિષિદ્ધ છે.

Verse 126

नक्षत्रे न च कुर्वीत यस्मिन्‌ जातो भवेन्नर: । न प्रोष्ठपदयो: कार्य तथाग्नेये च भारत,भारत! मस्तकपरसे स्नान करके देवकार्य तथा पितृकार्य करे। जिस नक्षत्रमें अपना जन्म हुआ हो उसमें एवं पूर्वा और उत्तरा दोनों भाद्रपदाओंमें तथा कृत्तिका नक्षत्रमें भी श्राद्धका निषेध है

જે નક્ષત્રમાં મનુષ્યનો જન્મ થયો હોય, તેમાં આ કર્મ ન કરવું; ન તો બંને પ્રોષ્ઠપદા (ભાદ્રપદા) માં, અને ન જ અગ્નેય નક્ષત્ર (કૃત્તિકા) માં—હે ભારત.

Verse 127

दारुणेषु च सर्वेषु प्रत्यरें च विवर्जयेत्‌ । ज्योतिषे यानि चोक्तानि तानि सर्वाणि वर्जयेत्‌,(आश्लेषा, आर्द्रा, ज्येष्ठा और मूल आदि) सम्पूर्ण दारुण नक्षत्रों और प्रत्यरिताराका- भी परित्याग कर देना चाहिये। सारांश यह है कि ज्योतिष-शास्त्रके भीतर जिन-जिन नक्षत्रोंमें श्राद्धछक्ता निषिध किया गया है, उन सबमें देवकार्य और पितृकार्य नहीं करना चाहिये

બધા દારુણ (અશુભ) નક્ષત્રો અને પ્રત્યરી (વિરોધી) તારાઓનો ત્યાગ કરવો જોઈએ; સંક્ષેપમાં, જ્યોતિષશાસ્ત્રમાં જે નક્ષત્રો નિષિદ્ધ કહ્યા છે, તે બધામાં દેવકાર્ય અને પિતૃકાર્ય ન કરવું.

Verse 128

प्राडमुख: श्मश्रुकर्माणि कारयेत्‌ सुसमाहित: । उदड्मुखो वा राजेन्द्र तथायुर्विन्दते महत्‌,राजेन्द्र! मनुष्य एकाग्रचित्त होकर पूर्व या उत्तरकी ओर मुँह करके हजामत बनवाये, ऐसा करनेसे बड़ी आयु प्राप्त होती है

Bhīṣma said: “O king, a man should have shaving and related grooming rites performed while fully composed, facing either the east or the north. By doing so, O best of kings, he is said to obtain great longevity.”

Verse 129

(सतां गुरूणां वृद्धानां कुलस्त्रीणां विशेषतः ।) परिवादं न च ब्रूयात्‌ परेषामात्मनस्तथा | परिवादो ह्वाधर्माय प्रोच्यते भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ! सत्पुरुषों, गुरुजनों, वृद्धों और विशेषतः कुलांगनाओंकी, दूसरे लोगोंकी और अपनी भी निन्दा न करे; क्योंकि निन्‍दा करना अधर्मका हेतु बताया गया है

Bhishma said: One should not speak words of slander—especially against the virtuous, one’s teachers, the elderly, and above all the women of noble families; nor should one malign other people, or even oneself. For, O bull among the Bharatas, slander is declared to be a cause that leads toward adharma.

Verse 130

वर्जयेद्‌ व्यंगिनीं नारीं तथा कन्यां नरोत्तम | समार्षा व्यड्धितां चैव मातु: स्वकुलजां तथा,नरश्रेष्ठी जो कन्या किसी अंगसे हीन हो अथवा जो अधिक अंगवाली हो, जिसके गोत्र और प्रवर अपने ही समान हो तथा जो माताके कुलमें (नानाके वंशमें) उत्पन्न हुई हो, उसके साथ विवाह नहीं करना चाहिये

Bhishma said: “O best of men, a man should avoid marrying a maiden who is physically defective, as well as one with excessive or abnormal bodily features; likewise he should not marry a girl whose gotra and pravara are the same as his own, nor one born in his mother’s own clan (i.e., from the maternal lineage).”

Verse 131

वृद्धां प्रवजितां चैव तथैव च पतिव्रताम्‌ । तथा निकृष्टवर्णा च वर्णोत्कृष्टां च वर्जयेत्‌

Bhīṣma said: One should refrain from harming or violating a woman who is aged, or who has renounced worldly life, or who is devoted to her husband; likewise, one should also refrain from targeting a woman of a socially ‘lower’ varṇa as well as one of a ‘higher’ varṇa. The ethical point is restraint: certain persons are to be treated as inviolable, and one must not let social distinctions become a pretext for wrongdoing.

Verse 132

जो बूढ़ी, संन्यासिनी, पतिव्रता, नीच वर्णकी तथा ऊँचे वर्णकी स्त्री हो, उसके सम्पर्कसे दूर रहना चाहिये ।। अयोनिं च वियोनिं च न गच्छेत विचक्षण: । पिंगलां कुष्ठिनीं नारीं न त्वमुद्रोढुमर्हसि,जिसकी योनि अर्थात्‌ कुलका पता न हो तथा जो नीच कुलमें पैदा हुई हो, उसके साथ विद्वान्‌ पुरुष समागम न करे। युधिष्ठिर! जिसके शरीरका रंग पीला हो तथा जो कुष्ठ रोगवाली हो, उसके साथ तुम्हें विवाह नहीं करना चाहिये

Verse 133

अपस्मारिकुले जातां निहीनां चापि वर्जयेत्‌ । श्वित्रिणां च कुले जातां क्षयिणां मनुजेश्वर,नरेश्वर! जो मृगीरोगसे दूषित कुलमें उत्पन्न हुई हो, नीच हो, सफेद कोढ़वाले और राजयक्ष्माके रोगी मनुष्यके कुलमें पैदा हुई हो, उसको भी त्याग देना चाहिये

Verse 134

लक्षणैरन्विता या च प्रशस्ता या च लक्षणै: । मनोज्ञां दर्शनीयां च तां भवान्‌ वोढुमहति,जो उत्तम लक्षणोंसे सम्पन्न, श्रेष्ठ आचरणोंद्वारा प्रशंसित, मनोहारिणी तथा दर्शनीय हो, उसीके साथ तुम्हें विवाह करना चाहिये

Bhishma said: “You should marry that woman who is endowed with auspicious marks, whose conduct is praised as excellent, and who is pleasing to the mind and worthy to behold.”

Verse 135

महाकुले निवेष्टव्यं सदृशे वा युधिष्िर । अवरा पतिता चैव न ग्राह्मा भूतिमिच्छता,युधिष्ठिर! अपना कल्याण चाहनेवाले पुरुषको अपनी अपेक्षा महान्‌ या समान कुलमें विवाह करना चाहिये। नीच जातिवाली तथा पतिता कन्याका पाणिग्रहण कदापि नहीं करना चाहिये

Bhīṣma said: “O Yudhiṣṭhira, one who seeks his own welfare and prosperity should contract marriage into a great family, or at least into one equal in standing. A woman of inferior birth, and especially one who is fallen from right conduct, should not be accepted in marriage by a man who desires lasting well-being.”

Verse 136

अग्नीनुत्पाद्य यत्नेन क्रिया: सुविहिताश्च या: । वेदे च ब्राह्मणै: प्रोक्तास्ताश्न सर्वा: समाचरेत्‌,(अरणी-मन्थनद्वारा) अग्निका उत्पादन एवं स्थापन करके ब्राह्मणोंद्वारा बतायी हुई सम्पूर्ण वेदविहित क्रियाओंका यत्नपूर्वक अनुष्ठान करना चाहिये

Bhishma said: Having carefully kindled the sacred fires (by due means), one should diligently perform all the rites that are properly enjoined—those prescribed in the Veda and taught by the Brahmins. The teaching emphasizes disciplined adherence to Vedic duty through correctly established ritual fire and conscientious practice.

Verse 137

न चेर्ष्या स्त्रीषु कर्तव्या रक्ष्या दाराश्व सर्वश: । अनायुष्या भवेदीर्ष्या तस्मादीर्ष्या विवर्जयेत्‌,सभी उपायोंसे अपनी स्त्रीकी रक्षा करनी चाहिये। स्त्रियोंसे ईर्ष्या रखना उचित नहीं है। ईर्ष्या करनेसे आयु क्षीण होती है। इसलिये उसे त्याग देना ही उचित है

Verse 138

अनायुष्यं दिवा स्वप्न तथाभ्युदितशायिता । प्रगे निशामाशु तथा नैवोच्छिष्टा: स्वपन्ति वै,दिनमें एवं सूर्योदयके पश्चात्‌ शयन आयुको क्षीण करनेवाला है। प्रातः:काल एवं रात्रिके आरम्भमें नहीं सोना चाहिये। अच्छे लोग रातमें अपवित्र होकर नहीं सोते हैं

ભીષ્મે કહ્યું—દિવસે સૂવું અને સૂર્યોદય પછી શયન કરવું આયુષ્ય ઘટાડનારું છે. પ્રાતઃકાળે તથા રાત્રિના આરંભે સૂવું ન જોઈએ. સદાચારીઓ રાત્રે ઉચ્છિષ્ટ (અશુચિ) રહીને સૂતા નથી.

Verse 139

पारदार्यमनायुष्यं नापितोच्छिष्टता तथा । यत्नतो वै न कर्तव्यमभ्यासश्रैव भारत,परस्त्रीसे व्यभिचार करना और हजामत बनवाकर बिना नहाये रह जाना भी आयुका नाश करनेवाला है। भारत! अपवित्रावस्थामें वेदोंका अध्ययन यत्नपूर्वक त्याग देना चाहिये

ભીષ્મે કહ્યું—પરસ્ત્રીગમન આયુષ્ય નાશ કરનારું છે; તેમજ નાપિતની સેવા પછી સ્નાન કર્યા વિના ઉચ્છિષ્ટ (અશુચિ) રહેવું પણ હાનિકારક છે. તેથી, હે ભારત, આવા આચરણથી યત્નપૂર્વક દૂર રહેવું જોઈએ અને અશૌચ અવસ્થામાં વેદાધ્યયન પણ ત્યજી દેવું જોઈએ.

Verse 140

संध्यायां च न भुज्जीत न स्नायेन्न तथा पठेत्‌ । प्रयतश्न॒ भवेत्‌ तस्यां न च किंचित्‌ समाचरेत्‌,संध्याकालमें स्नान, भोजन और स्वाध्याय कुछ भी न करे। उस बेलामें शुद्ध चित्त होकर ध्यान एवं उपासना करनी चाहिये। दूसरा कोई कार्य नहीं करना चाहिये

ભીષ્મે કહ્યું—સંધ્યાકાળે ન ભોજન કરવું, ન સ્નાન કરવું, ન પાઠ/સ્વાધ્યાય કરવો. તે પવિત્ર સમયે સંયમિત રહી શুদ্ধ ચિત્તથી ધ્યાન-ઉપાસનામાં લીન રહેવું; બીજું કોઈ કાર્ય ન કરવું.

Verse 141

ब्राह्मणान्‌ पूजयेच्चापि तथा स्नात्वा नराधिप । देवांश्व॒ प्रणमेत्‌ स्नातो गुरूंश्वाप्पभिवादयेत्‌

ભીષ્મે કહ્યું—હે નરાધિપ! સ્નાન કરીને બ્રાહ્મણોની પણ પૂજા કરવી. સ્નાત થઈ દેવતાઓને પ્રણામ કરવો અને ગુરુજનો તથા વૃદ્ધોને આદરપૂર્વક અભિવાદન કરવું.

Verse 142

नरेश्वर! ब्राह्मणोंकी पूजा, देवताओंको नमस्कार और गुरुजनोंको प्रणाम स्नानके बाद ही करने चाहिये ।। अनिमन्त्रितो न गच्छेत यज्ञं गच्छेत दर्शक: । अनर्चिते हानायुष्यं गमनं तत्र भारत,बिना बुलाये कहीं भी न जाय, परंतु यज्ञ देखनेके लिये मनुष्य बिना बुलाये भी जा सकता है। भारत! जहाँ अपना आदर न होता हो, वहाँ जानेसे आयुका नाश होता है

ભીષ્મે કહ્યું—હે નરેશ્વર! બ્રાહ્મણપૂજા, દેવતાઓને નમસ્કાર અને ગુરુજનોને પ્રણામ—આ બધું સ્નાન પછી જ કરવું જોઈએ. આમંત્રણ વિના ક્યાંય ન જવું; પરંતુ યજ્ઞ જોવા માટે દર્શક તરીકે આમંત્રણ વિના પણ જઈ શકાય. હે ભારત! જ્યાં પોતાનો આદર ન થાય ત્યાં જવાથી આયુષ્ય ક્ષીણ થાય છે.

Verse 143

न चैकेन परिव्रज्यं न गन्तव्यं तथा निशि । अनागतायां संध्यायां पश्चिमायां गृहे वसेत्‌,अकेले परदेश जाना और रातमें यात्रा करना मना है। यदि किसी कामके लिये बाहर जाय तो संध्या होनेके पहले ही घर लौट आना चाहिये

ભીષ્મે કહ્યું— એકલા ફરવું યોગ્ય નથી અને રાત્રે મુસાફરી પણ ન કરવી. સંધ્યા આવતાં પહેલાં—ખાસ કરીને પશ્ચિમ તરફ ગોધૂળી છવાય તે પહેલાં—ઘરે જ રહેવું જોઈએ.

Verse 144

मातु: पितुर्गुरूणां च कार्यमेवानुशासनम्‌ । हित॑ चाप्यहितं चापि न विचार्य नरर्षभ

ભીષ્મે કહ્યું— માતા, પિતા અને ગુરુજનોની આજ્ઞા કર્તવ્ય માનીને અવશ્ય કરવી. હે નરશ્રેષ્ઠ, તે હિતકારી છે કે અહિતકારી—એવો વિચાર ન કરવો.

Verse 145

नरश्रेष्ठ) माता-पिता और गुरुजनोंकी आज्ञाका अविलम्ब पालन करना चाहिये। इनकी आज्ञा हितकर है या अहितकर, इसका विचार नहीं करना चाहिये ।। धनुर्वेदे च वेदे च यत्न: कार्यो नराधिप । हस्तिपृषछ्ेडश्चपृष्ठे च रथचर्यासु चैव ह,नरेश्वर! क्षत्रियको धनुर्वेद और वेदाध्ययनके लिये यत्न करना चाहिये। राजेन्द्र! तुम हाथी-घोड़ेकी सवारी और रथ हाँकनेकी कलामें निपुणता प्राप्त करनेके लिये प्रयत्नशील बनो, क्योंकि यत्न करनेवाला पुरुष सुखपूर्वक उन्नतिशील होता है। वह शत्रुओं, स्वजनों और भृत्योंके लिये दुर्धर्ष हो जाता है

ભીષ્મે કહ્યું— હે નરશ્રેષ્ઠ, માતા-પિતા અને ગુરુજનોની આજ્ઞાનું વિલંબ વિના પાલન કરવું જોઈએ; તે હિતકારી છે કે અહિતકારી—એવો વિચાર ન કરવો. અને હે નરાધિપ, ક્ષત્રિયે ધનુર્વેદ તથા વેદાધ્યયનમાં પ્રયત્ન કરવો જોઈએ. હે રાજેન્દ્ર, હાથી-ઘોડાની સવારી અને રથ હાંકવાની કલામાં પણ નિપુણતા મેળવવા પ્રયત્નશીલ થાઓ; કારણ કે પ્રયત્નવાન પુરુષ સુખપૂર્વક ઉન્નતિ પામે છે અને શત્રુઓ, સ્વજનો તથા ભૃત્યો માટે પણ દુર્ધર્ષ બની જાય છે.

Verse 146

यत्नवान्‌ भव राजेन्द्र यत्नवान्‌ सुखमेधते । अप्रधृष्यश्न शत्रूणां भृत्यानां स्वजनस्य च,नरेश्वर! क्षत्रियको धनुर्वेद और वेदाध्ययनके लिये यत्न करना चाहिये। राजेन्द्र! तुम हाथी-घोड़ेकी सवारी और रथ हाँकनेकी कलामें निपुणता प्राप्त करनेके लिये प्रयत्नशील बनो, क्योंकि यत्न करनेवाला पुरुष सुखपूर्वक उन्नतिशील होता है। वह शत्रुओं, स्वजनों और भृत्योंके लिये दुर्धर्ष हो जाता है

ભીષ્મે કહ્યું— હે રાજેન્દ્ર, પ્રયત્નવાન બનો; પ્રયત્નવાન પુરુષ સુખપૂર્વક સમૃદ્ધ થાય છે. તે શત્રુઓ માટે, તેમજ સ્વજનો અને ભૃત્યો માટે પણ, અપ્રધર્ષ્ય બની જાય છે.

Verse 147

प्रजापालनयुक्तश्न न क्षतिं लभते क्वचित्‌ । युक्तिशास्त्रं च ते ज्ञेयं शब्दशास्त्रं च भारत,जो राजा सदा प्रजाके पालनमें तत्पर रहता है, उसे कभी हानि नहीं उठानी पड़ती। भरतनन्दन! तुम्हें तर्कशास्त्र और शब्दशास्त्र दोनोंका ज्ञान प्राप्त करना चाहिये

ભીષ્મે કહ્યું— જે રાજા સદા પ્રજાપાલનમાં તત્પર રહે છે, તેને ક્યાંય હાનિ થતી નથી. હે ભારત, તારે યુક્તિશાસ્ત્ર (તર્ક) અને શબ્દશાસ્ત્ર (વ્યાકરણ) બંનેનું જ્ઞાન મેળવવું જોઈએ.

Verse 148

गान्धर्वशास्त्रं च कला: परिज्ञेया नराधिप । पुराणमितिहासाश्च॒ तथाख्यानानि यानि च

ભીષ્મે કહ્યું—હે નરાધિપ! તારે ગાન્ધર્વશાસ્ત્ર (સંગીતશાસ્ત્ર) તથા સર્વ કલાઓનું પણ સુપરિચય મેળવવો જોઈએ. તેમ જ પુરાણો, ઇતિહાસો અને વિવિધ ઉપાખ્યાન-આખ્યાનોનું જ્ઞાન પણ રાખવું જોઈએ.

Verse 149

महात्मनां च चरितं श्रोतव्यं॑ नित्यमेव ते । नरेश्वर! गान्धर्वशास्त्र (संगीत) और समस्त कलाओंका ज्ञान प्राप्त करना भी तुम्हारे लिये आवश्यक है। तुम्हें प्रतेदिन पुराण, इतिहास, उपाख्यान तथा महात्माओंके चरित्रका श्रवण करना चाहिये ।। १४८ $ ।। (मान्यानां मानन कुर्य न्निन्द्यानां निन्दनं तथा । गोब्राह्मणार्थ युध्येत प्राणानपि परित्यजेत्‌ ।।) राजा माननीय पुरुषोंका सम्मान और निन्दनीय मनुष्योंकी निनन्‍दा करे। वह गौओं तथा ब्राह्मणोंके लिये युद्ध करे। उनकी रक्षाके लिये आवश्यकता हो तो प्राणोंको भी निछावर कर पत्नी रजस्वला या च नाभिगच्छेन्न चाह्ययेत्‌,अपनी पत्नी भी रजस्वला हो तो उसके पास न जाय और न उसे ही अपने पास बुलाये। जब चौथे दिन वह स्नान कर ले, तब रातमें बुद्धिमान्‌ पुरुष उसके पास जाय। पाँचवें दिन गर्भाधान करनेसे कन्याकी उत्पत्ति होती है और छठे दिन पुत्रकी अर्थात्‌ समरात्रिमें गर्भाधानसे पुत्रका और विषमरात्रिमें गर्भाधान होनेसे कन्‍्याका जन्म होता है

ભીષ્મે કહ્યું—હે નરેશ્વર! તારે નિત્ય મહાત્માઓના ચરિત્રનું શ્રવણ કરવું જોઈએ. જે માનનીય હોય તેમનું માન કર અને જે નિંદનીય હોય તેમનું નિંદન કર. ગાયો અને બ્રાહ્મણોના હિત માટે યુદ્ધ કર—આવશ્યક પડે તો પ્રાણ પણ ત્યજી દે. રજસ્વલા પત્ની પાસે ન જવું, ન તેને પોતાના પાસે બોલાવવી; ચોથા દિવસે સ્નાન કર્યા પછી વિવેકી પુરુષ રાત્રે તેની પાસે જઈ શકે. પાંચમા દિવસે ગર્ભાધાનથી કન્યા અને છઠ્ઠા દિવસે પુત્ર થાય છે; તેમજ સમરાત્રિમાં ગર્ભાધાનથી પુત્ર અને વિષમરાત્રિમાં કન્યા કહેવાય છે.

Verse 150

स्‍्नातां चतुर्थे दिवसे रात्रौ गच्छेद्‌ विचक्षण: । पज्चमे दिवसे नारी षछ्ठे-हनि पुमान्‌ भवेत्‌,अपनी पत्नी भी रजस्वला हो तो उसके पास न जाय और न उसे ही अपने पास बुलाये। जब चौथे दिन वह स्नान कर ले, तब रातमें बुद्धिमान्‌ पुरुष उसके पास जाय। पाँचवें दिन गर्भाधान करनेसे कन्याकी उत्पत्ति होती है और छठे दिन पुत्रकी अर्थात्‌ समरात्रिमें गर्भाधानसे पुत्रका और विषमरात्रिमें गर्भाधान होनेसे कन्‍्याका जन्म होता है

ચોથા દિવસે સ્નાન કર્યા પછી વિવેકી પુરુષ રાત્રે તેની પાસે જાય. પાંચમા દિવસે ગર્ભાધાનથી કન્યા અને છઠ્ઠા દિવસે પુત્ર થાય છે; તેમજ સમરાત્રિમાં ગર્ભાધાનથી પુત્ર અને વિષમરાત્રિમાં કન્યા કહેવાય છે.

Verse 151

एतेन विधिना पत्नीमुपगच्छेत पण्डित: । ज्ञातिसम्बन्धिमित्राणि पूजनीयानि सर्वश:,इसी विधिसे विद्वान्‌ पुरुष पत्नीके साथ समागम करे। भाई-बन्धु, सम्बन्धी और मित्र --इन सबका सब प्रकारसे आदर करना चाहिये

આ વિધાન મુજબ પંડિત પુરુષે પત્ની સાથે દાંપત્યસંયોગ કરવો જોઈએ. અને જ્ઞાતિ, સંબંધીઓ તથા મિત્રો—આ સૌનું સર્વ રીતે પૂજન-સન્માન કરવું જોઈએ.

Verse 152

यष्टव्यं च यथाशक्ति यज्ैविविधदक्षिणै: । अत ऊर्ध्वमरण्यं च सेवितव्यं नराधिप,अपनी शक्तिके अनुसार भाँति-भाँतिकी दक्षिणावाले यज्ञोंका अनुष्ठान करना चाहिये। नरेश्वर! तदनन्तर गार्हस्थ्यकी अवधि समाप्त हो जानेपर वानप्रस्थके नियमोंका पालन करते हुए वनमें निवास करना चाहिये

ભીષ્મે કહ્યું—યથાશક્તિ વિવિધ પ્રકારની દક્ષિણાઓ સાથે યજ્ઞો કરવાના. ત્યારબાદ, હે નરાધિપ! ગૃહસ્થાશ્રમનો સમય પૂર્ણ થાય ત્યારે વાનપ્રસ્થધર્મ અનુસાર અરણ્યનો આશ્રય લઈને નિવાસ કરવો જોઈએ.

Verse 153

एष ते लक्षणोद्देश आयुष्याणां प्रकीर्तित: । शेषस्त्रैविद्यवृद्धेभ्य: प्रत्याहायों युधिछ्चिर,युधिष्ठिर! इस प्रकार मैंने तुमसे आयुकी वृद्धि करनेवाले नियमोंका संक्षेपसे वर्णन किया है। जो नियम बाकी रह गये हैं, उन्हें तुम तीनों वेदोंके ज्ञानमें बढ़े-चढ़े ब्राह्मणोंसे पूछकर जान लेना

યુધિષ્ઠિર! આ રીતે મેં તને આયુષ્ય વધારનાર લક્ષણો અને નિયમો સંક્ષેપમાં કહ્યા. જે કંઈ બાકી રહ્યું છે, તે તું ત્રણેય વેદોના જ્ઞાનમાં પ્રવીણ બ્રાહ્મણોને પૂછીને જાણી લે.

Verse 154

आचारो भूतिजनन आचार: कीर्तिवर्धन: । आचाराद्‌ वर्धते ह्यायुराचारो हन्त्यलक्षणम्‌,सदाचार ही कल्याणका जनक और सदाचार ही कीर्तिको बढ़ानेवाला है। सदाचारसे आयुकी वृद्धि होती है और सदाचार ही बुरे लक्षणोंका नाश करता है

સદાચાર કલ્યાણનો જનક છે અને સદાચાર જ કીર્તિ વધારનાર છે. સદાચારથી નિશ્ચયે આયુષ્ય વધે છે અને સદાચાર જ અશુભ લક્ષણો તથા દુર્વૃત્તિઓનો નાશ કરે છે.

Verse 155

आगगमानां हि सर्वेषामाचार: श्रेष्ठ उच्यते । आचारप्रभवो धर्मों धर्मादायुर्विवर्धते,सम्पूर्ण आगमोंमें सदाचार ही श्रेष्ठ बतलाया जाता है। सदाचारसे धर्मकी उत्पत्ति होती है और धर्मसे आयु बढ़ती है

સમસ્ત આગમો અને શાસ્ત્રપરંપરાઓમાં સદાચારને જ શ્રેષ્ઠ કહેવાયો છે. સદાચારથી ધર્મ ઉત્પન્ન થાય છે અને ધર્મથી આયુષ્ય વધે છે.

Verse 156

एतद्‌ यशस्यमायुष्य॑ स्वर्ग्य स्वस्त्ययनं महत्‌ | अनुकम्प्य सर्ववर्णान्‌ ब्रह्मणा समुदाह्॒तम्‌,पूर्वकालमें सब वर्णोके लोगोंपर दया करके ब्रह्माजीने यह सदाचार धर्मका उपदेश दिया था। यह यश, आयु और स्वर्गकी प्राप्ति करानेवाला तथा कल्याणका परम आधार है

પૂર્વકાળમાં બ્રહ્માજીએ સર્વ વર્ણોના લોકો પર દયા કરીને સદાચાર-ધર્મનો આ ઉપદેશ ઉચ્ચાર્યો હતો. આ યશ, આયુષ્ય અને સ્વર્ગપ્રાપ્તિ કરાવનાર તથા કલ્યાણનો મહાન આધાર છે.

Verse 1183

न भूज्जीत च मेधावी तथायुर्विन्दते महत्‌ । राजन! बुद्धिमान्‌ पुरुष सायंकालमें गोधूलिकी वेलामें न तो सोये, न विद्या पढ़े और न भोजन ही करे। ऐसा करनेसे वह बड़ी आयुको प्राप्त होता है

રાજન! બુદ્ધિમાન પુરુષ સાંજની ગોધૂળિ વેળાએ ન તો સૂવે, ન વિદ્યાભ્યાસ કરે અને ન ભોજન કરે. આવો સંયમ રાખવાથી તે દીર્ઘ આયુષ્ય પામે છે.

Verse 1196

पानीयस्य क्रिया नक्तं न कार्या भूतिमिच्छता । अपना कल्याण चाहनेवाले पुरुषको रातमें श्राद्धकर्म नहीं करना चाहिये। भोजन करके केशोंका संस्कार (क्षौरकर्म) भी नहीं करना चाहिये तथा रातमें जलसे स्नान करना भी उचित नहीं है

ભીષ્મે કહ્યું—જે કલ્યાણ અને સમૃદ્ધિ ઇચ્છે, તેણે રાત્રે પાણી સંબંધિત ક્રિયા ન કરવી. રાત્રે શ્રાદ્ધકર્મ ન કરવું; ભોજન કર્યા પછી કેશસંસ્કાર (ક્ષૌરકર્મ) ન કરવો; અને રાત્રે જળથી સ્નાન કરવું પણ યોગ્ય નથી.

Verse 1216

द्विजच्छेदं न कुर्वीत भुक्त्वा न च समाचरेत्‌ । रातमें न स्वयं डटकर भोजन करे और न दूसरेको ही डटकर भोजन करावे। भोजन करके दौड़े नहीं। ब्राह्मणोंका वध कभी न करे

ભીષ્મે કહ્યું—દ્વિજનો (વિશેષ કરીને બ્રાહ્મણનો) વધ ક્યારેય ન કરવો. ભોજન કર્યા પછી અયોગ્ય વર્તન ન કરવું. રાત્રે ન તો પોતે જોરજબરીથી ભોજન કરવું, ન બીજાને તેમ કરાવવું. ભોજન કરીને દોડવું નહીં. સર્વોપરી બ્રાહ્મણવધ ક્યારેય ન કરવો.

Verse 1226

वयःस्थां च महाप्राज्ञ: कन्यामावोदुम्ति । जो श्रेष्ठ कुलमें उत्पन्न हुई हो, उत्तम लक्षणोंसे प्रशंसित हो तथा विवाहके योग्य अवस्थाको प्राप्त हो गयी हो, ऐसी सुलक्षणा कन्याके साथ श्रेष्ठ बुद्धिमान्‌ पुरुष विवाह करे

ભીષ્મનો ઉપદેશ—જે પુરુષ મહાબુદ્ધિમાન હોય, તેણે લગ્નયોગ્ય વયને પ્રાપ્ત થયેલી, શ્રેષ્ઠ કુળમાં જન્મેલી, ઉત્તમ ગુણો અને શુભ લક્ષણોથી પ્રશંસિત એવી સુલક્ષણા કન્યાને ધર્માનુસાર વિવાહ કરવો જોઈએ.

Verse 1243

पुत्रा निवेश्याश्व कुलाद्‌ भृत्या लभ्याश्व भारत । भरतनन्दन! यदि कन्या उत्पन्न करे तो बुद्धिमान्‌ एवं कुलीन वरके साथ उसका ब्याह कर दे। पुत्रका विवाह भी उत्तम कुलकी कन्याके साथ करे और भृत्य भी उत्तम कुलके मनुष्योंको ही बनावे

ભીષ્મે કહ્યું—હે ભારત! પુત્રોને યોગ્ય રીતે સ્થિર કર અને સારા કુળોમાંથી વિશ્વાસુ ભૃત્યો મેળવો. હે ભરતનંદન! જો કન્યા જન્મે તો તેને બુદ્ધિમાન અને કુલીન વર સાથે વિવાહ કરાવી દો. પુત્રનો વિવાહ પણ ઉત્તમ કુળની કન્યા સાથે કરો અને ભૃત્ય તરીકે પણ ઉત્તમ કુળના મનુષ્યોને જ નિમો.

Frequently Asked Questions

How to balance authority and humility within family hierarchy: seniors must protect and provide without abusing power, while juniors must respect elders without enabling wrongdoing or destabilizing the household.

Corrective or critical speech should be delivered with parihāra (mitigation/avoidance), recognizing that harsh confrontation can create breaches that rivals and envious actors exploit.

No explicit phalaśruti appears in the provided verses; the chapter’s framing implies pragmatic ‘fruit’ as social stability, preserved reputation (kīrti), and dharmic legitimacy within lineage and governance.