Ayodhya KandaPrakarana 2621 Verses

Prakarana 26

राजधर्म-त्याग-भक्ति की देहरी: यह सोपान ‘घर’ (अयोध्या/लोक-व्यवस्था) से ‘वन’ (वैराग्य/आत्मसमर्पण) की ओर संक्रमण है। यहाँ मुक्ति-सीढ़ी का मुख्य पायदान यह है कि ईश्वर-इच्छा (राम-रजाइ) के आगे निजी अधिकार, शोक, और राजनीति का आग्रह गल कर ‘सेवा-धर्म’ बनता है। निषाद-किरात-भिल्ल जैसे ‘सीमान्त’ जन भी प्रेम-भक्ति द्वारा उसी सोपान पर चढ़ते हैं—भक्ति का लोकतंत्रीकरण।

El centro de sabor (rasa) del Ayodhyā Kāṇḍa oscila entre la compasión y la paz; pero esta compasión no es desesperanza, sino compasión encendida por el dharma. En el pasaje presente, sobre el suelo del karuṇa-rasa se ve brotar el germen del bhakti-rasa: los kol, kirāt y bhil —moradores del bosque— ofrecen frutos, raíces y tiernos brotes, y sostienen el ideal de la dāsya-bhakti (devoción servicial); y la forma “kṛpālu” (misericordiosa) de Rāma disuelve toda distancia social. Luego el relato entra en la política de la asamblea: la congoja de Bharata (pérdida de sueño y apetito) y la palabra normativa del guru y los munis elevan la “Rāma-rajāī” (la voluntad de Rāma) como principio supremo. La resolución de renuncia de Bharata —considerar el destierro al bosque como su propio beneficio— es decisiva en la teología del Kāṇḍa: la forma más alta del rāja-dharma es la oblación del “yo”. Así, en este peldaño (sopāna) el Ayodhyā Kāṇḍa hace de la no-apego (anāsakti) y de la obediencia al mandato (ājñā-pālan) una escalera imprescindible hacia la liberación.

Verses

Verse 510 (चौपाई)

कोल किरात भिल्ल बनबासी। मधु सुचि सुंदर स्वादु सुधा सी।। भरि भरि परन पुटीं रचि रुरी। कंद मूल फल अंकुर जूरी।। सबहि देहिं करि बिनय प्रनामा। कहि कहि स्वाद भेद गुन नामा।। देहिं लोग बहु मोल न लेहीं। फेरत राम दोहाई देहीं।। कहहिं सनेह मगन मृदु बानी। मानत साधु पेम पहिचानी।। तुम्ह सुकृती हम नीच निषादा। पावा दरसनु राम प्रसादा।। हमहि अगम अति दरसु तुम्हारा। जस मरु धरनि देवधुनि धारा।। राम कृपाल निषाद नेवाजा। परिजन प्रजउ चहिअ जस राजा।।

Verse 511 (दोहा/सोरठा)

यह जिंयँ जानि सँकोचु तजि करिअ छोहु लखि नेहु। हमहि कृतारथ करन लगि फल तृन अंकुर लेहु।।250।।

Verse 512 (चौपाई)

तुम्ह प्रिय पाहुने बन पगु धारे। सेवा जोगु न भाग हमारे।। देब काह हम तुम्हहि गोसाँई। ईधनु पात किरात मिताई।। यह हमारि अति बड़ि सेवकाई। लेहि न बासन बसन चोराई।। हम जड़ जीव जीव गन घाती। कुटिल कुचाली कुमति कुजाती।। पाप करत निसि बासर जाहीं। नहिं पट कटि नहि पेट अघाहीं।। सपोनेहुँ धरम बुद्धि कस काऊ। यह रघुनंदन दरस प्रभाऊ।। जब तें प्रभु पद पदुम निहारे। मिटे दुसह दुख दोष हमारे।। बचन सुनत पुरजन अनुरागे। तिन्ह के भाग सराहन लागे।।

Verse 513 (छंद)

लागे सराहन भाग सब अनुराग बचन सुनावहीं। बोलनि मिलनि सिय राम चरन सनेहु लखि सुखु पावहीं।। नर नारि निदरहिं नेहु निज सुनि कोल भिल्लनि की गिरा। तुलसी कृपा रघुबंसमनि की लोह लै लौका तिरा।।

Verse 514 (दोहा/सोरठा)

बिहरहिं बन चहु ओर प्रतिदिन प्रमुदित लोग सब। जल ज्यों दादुर मोर भए पीन पावस प्रथम।।251।।

Verse 515 (चौपाई)

पुर जन नारि मगन अति प्रीती। बासर जाहिं पलक सम बीती।। सीय सासु प्रति बेष बनाई। सादर करइ सरिस सेवकाई।। लखा न मरमु राम बिनु काहूँ। माया सब सिय माया माहूँ।। सीयँ सासु सेवा बस कीन्हीं। तिन्ह लहि सुख सिख आसिष दीन्हीं।। लखि सिय सहित सरल दोउ भाई। कुटिल रानि पछितानि अघाई।। अवनि जमहि जाचति कैकेई। महि न बीचु बिधि मीचु न देई।। लोकहुँ बेद बिदित कबि कहहीं। राम बिमुख थलु नरक न लहहीं।। यहु संसउ सब के मन माहीं। राम गवनु बिधि अवध कि नाहीं।।

Verse 516 (दोहा/सोरठा)

निसि न नीद नहिं भूख दिन भरतु बिकल सुचि सोच। नीच कीच बिच मगन जस मीनहि सलिल सँकोच।।252।।

Verse 517 (चौपाई)

कीन्ही मातु मिस काल कुचाली। ईति भीति जस पाकत साली।। केहि बिधि होइ राम अभिषेकू। मोहि अवकलत उपाउ न एकू।। अवसि फिरहिं गुर आयसु मानी। मुनि पुनि कहब राम रुचि जानी।। मातु कहेहुँ बहुरहिं रघुराऊ। राम जननि हठ करबि कि काऊ।। मोहि अनुचर कर केतिक बाता। तेहि महँ कुसमउ बाम बिधाता।। जौं हठ करउँ त निपट कुकरमू। हरगिरि तें गुरु सेवक धरमू।। एकउ जुगुति न मन ठहरानी। सोचत भरतहि रैनि बिहानी।। प्रात नहाइ प्रभुहि सिर नाई। बैठत पठए रिषयँ बोलाई।।

Verse 518 (दोहा/सोरठा)

गुर पद कमल प्रनामु करि बैठे आयसु पाइ। बिप्र महाजन सचिव सब जुरे सभासद आइ।।253।।

Verse 519 (चौपाई)

बोले मुनिबरु समय समाना। सुनहु सभासद भरत सुजाना।। धरम धुरीन भानुकुल भानू। राजा रामु स्वबस भगवानू।। सत्यसंध पालक श्रुति सेतू। राम जनमु जग मंगल हेतू।। गुर पितु मातु बचन अनुसारी। खल दलु दलन देव हितकारी।। नीति प्रीति परमारथ स्वारथु। कोउ न राम सम जान जथारथु।। बिधि हरि हरु ससि रबि दिसिपाला। माया जीव करम कुलि काला।। अहिप महिप जहँ लगि प्रभुताई। जोग सिद्धि निगमागम गाई।। करि बिचार जिंयँ देखहु नीकें। राम रजाइ सीस सबही कें।।

Verse 520 (दोहा/सोरठा)

राखें राम रजाइ रुख हम सब कर हित होइ। समुझि सयाने करहु अब सब मिलि संमत सोइ।।254।।

Verse 521 (चौपाई)

सब कहुँ सुखद राम अभिषेकू। मंगल मोद मूल मग एकू।। केहि बिधि अवध चलहिं रघुराऊ। कहहु समुझि सोइ करिअ उपाऊ।। सब सादर सुनि मुनिबर बानी। नय परमारथ स्वारथ सानी।। उतरु न आव लोग भए भोरे। तब सिरु नाइ भरत कर जोरे।। भानुबंस भए भूप घनेरे। अधिक एक तें एक बड़ेरे।। जनमु हेतु सब कहँ पितु माता। करम सुभासुभ देइ बिधाता।। दलि दुख सजइ सकल कल्याना। अस असीस राउरि जगु जाना।। सो गोसाइँ बिधि गति जेहिं छेंकी। सकइ को टारि टेक जो टेकी।।

Verse 522 (दोहा/सोरठा)

बूझिअ मोहि उपाउ अब सो सब मोर अभागु। सुनि सनेहमय बचन गुर उर उमगा अनुरागु।।255।।

Verse 523 (चौपाई)

तात बात फुरि राम कृपाहीं। राम बिमुख सिधि सपनेहुँ नाहीं।। सकुचउँ तात कहत एक बाता। अरध तजहिं बुध सरबस जाता।। तुम्ह कानन गवनहु दोउ भाई। फेरिअहिं लखन सीय रघुराई।। सुनि सुबचन हरषे दोउ भ्राता। भे प्रमोद परिपूरन गाता।। मन प्रसन्न तन तेजु बिराजा। जनु जिय राउ रामु भए राजा।। बहुत लाभ लोगन्ह लघु हानी। सम दुख सुख सब रोवहिं रानी।। कहहिं भरतु मुनि कहा सो कीन्हे। फलु जग जीवन्ह अभिमत दीन्हे।। कानन करउँ जनम भरि बासू। एहिं तें अधिक न मोर सुपासू।।

Verse 524 (दोहा/सोरठा)

अँतरजामी रामु सिय तुम्ह सरबग्य सुजान। जो फुर कहहु त नाथ निज कीजिअ बचनु प्रवान।।256।।

Verse 525 (चौपाई)

भरत बचन सुनि देखि सनेहू। सभा सहित मुनि भए बिदेहू।। भरत महा महिमा जलरासी। मुनि मति ठाढ़ि तीर अबला सी।। गा चह पार जतनु हियँ हेरा। पावति नाव न बोहितु बेरा।। औरु करिहि को भरत बड़ाई। सरसी सीपि कि सिंधु समाई।। भरतु मुनिहि मन भीतर भाए। सहित समाज राम पहिं आए।। प्रभु प्रनामु करि दीन्ह सुआसनु। बैठे सब सुनि मुनि अनुसासनु।। बोले मुनिबरु बचन बिचारी। देस काल अवसर अनुहारी।। सुनहु राम सरबग्य सुजाना। धरम नीति गुन ग्यान निधाना।।

Verse 526 (दोहा/सोरठा)

सब के उर अंतर बसहु जानहु भाउ कुभाउ। पुरजन जननी भरत हित होइ सो कहिअ उपाउ।।257।।

Verse 527 (चौपाई)

आरत कहहिं बिचारि न काऊ। सूझ जूआरिहि आपन दाऊ।। सुनि मुनि बचन कहत रघुराऊ। नाथ तुम्हारेहि हाथ उपाऊ।। सब कर हित रुख राउरि राखें। आयसु किएँ मुदित फुर भाषें।। प्रथम जो आयसु मो कहुँ होई। माथें मानि करौ सिख सोई।। पुनि जेहि कहँ जस कहब गोसाईं। सो सब भाँति घटिहि सेवकाईं।। कह मुनि राम सत्य तुम्ह भाषा। भरत सनेहँ बिचारु न राखा।। तेहि तें कहउँ बहोरि बहोरी। भरत भगति बस भइ मति मोरी।। मोरें जान भरत रुचि राखि। जो कीजिअ सो सुभ सिव साखी।।

Verse 528 (दोहा/सोरठा)

भरत बिनय सादर सुनिअ करिअ बिचारु बहोरि। करब साधुमत लोकमत नृपनय निगम निचोरि।।258।।

Verse 529 (चौपाई)

गुरु अनुराग भरत पर देखी। राम ह्दयँ आनंदु बिसेषी।। भरतहि धरम धुरंधर जानी। निज सेवक तन मानस बानी।। बोले गुर आयस अनुकूला। बचन मंजु मृदु मंगलमूला।। नाथ सपथ पितु चरन दोहाई। भयउ न भुअन भरत सम भाई।। जे गुर पद अंबुज अनुरागी। ते लोकहुँ बेदहुँ बड़भागी।। राउर जा पर अस अनुरागू। को कहि सकइ भरत कर भागू।। लखि लघु बंधु बुद्धि सकुचाई। करत बदन पर भरत बड़ाई।। भरतु कहहीं सोइ किएँ भलाई। अस कहि राम रहे अरगाई।।

Verse 530 (दोहा/सोरठा)

तब मुनि बोले भरत सन सब सँकोचु तजि तात। कृपासिंधु प्रिय बंधु सन कहहु हृदय कै बात।।259।।

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