Ayodhya KandaPrakarana 1621 Verses

Prakarana 16

यह सोपान ‘विरह-योग’ का द्वार है: गृह-धर्म (राजधर्म/कुलधर्म) और वन-धर्म (त्याग/वैराग्य) के संधि-क्षण पर साधक का चित्त ‘आसक्ति’ से ‘समर्पण’ की सीढ़ी चढ़ता है। अयोध्या काण्ड में राम का वनगमन केवल ऐतिहासिक घटना नहीं, बल्कि ‘इच्छा-त्याग’ का आध्यात्मिक अभ्यास है—जहाँ प्रिय-वियोग में भी नाम-स्मरण, धैर्य, विवेक और धर्म-स्थिति मोक्षमार्ग की सीढ़ियाँ बनते हैं।

The principal rasa of the Ayodhyā Kāṇḍa is karuṇa, yet it is not mere grief (śoka)—it is compassion purified by the light of Dharma. In this section (Dohā 150–159), the axis of karuṇa turns around three centers: (1) Rāma’s conduct within maryādā—reassuring the Kevat, sending messages for father, guru, and the community of mothers; (2) Ayodhyā’s collective mourning—Daśaratha’s passing, the queens’ lament, the city’s tumult; (3) the ominous suspicion rising within Bharata and the inauspicious signs upon his entry into the city. Here Tulsī shows “patience and discernment” (dhīraja–viveka) as spiritual medicine: the minister’s counsel, Kauśalyā’s boat-metaphor (Daśaratha as helmsman of the ship of Ayodhyā), and finally the sound of the Divine Name—“Rām, Rām”—which becomes a rung toward mokṣa even in death. Thus the Ayodhyā Kāṇḍa teaches the mind that even in separation, bhakti leads toward steady wisdom (sthita-prajñatā).

Verses

Verse 306 (चौपाई)

पुनि पुनि पूँछत मंत्रहि राऊ। प्रियतम सुअन सँदेस सुनाऊ।। करहि सखा सोइ बेगि उपाऊ। रामु लखनु सिय नयन देखाऊ।। सचिव धीर धरि कह मुदु बानी। महाराज तुम्ह पंडित ग्यानी।। बीर सुधीर धुरंधर देवा। साधु समाजु सदा तुम्ह सेवा।। जनम मरन सब दुख भोगा। हानि लाभ प्रिय मिलन बियोगा।। काल करम बस हौहिं गोसाईं। बरबस राति दिवस की नाईं।। सुख हरषहिं जड़ दुख बिलखाहीं। दोउ सम धीर धरहिं मन माहीं।। धीरज धरहु बिबेकु बिचारी। छाड़िअ सोच सकल हितकारी।।

Verse 307 (दोहा/सोरठा)

प्रथम बासु तमसा भयउ दूसर सुरसरि तीर। न्हाई रहे जलपानु करि सिय समेत दोउ बीर।।150।।

Verse 308 (चौपाई)

केवट कीन्हि बहुत सेवकाई। सो जामिनि सिंगरौर गवाँई।। होत प्रात बट छीरु मगावा। जटा मुकुट निज सीस बनावा।। राम सखाँ तब नाव मगाई। प्रिया चढ़ाइ चढ़े रघुराई।। लखन बान धनु धरे बनाई। आपु चढ़े प्रभु आयसु पाई।। बिकल बिलोकि मोहि रघुबीरा। बोले मधुर बचन धरि धीरा।। तात प्रनामु तात सन कहेहु। बार बार पद पंकज गहेहू।। करबि पायँ परि बिनय बहोरी। तात करिअ जनि चिंता मोरी।। बन मग मंगल कुसल हमारें। कृपा अनुग्रह पुन्य तुम्हारें।।

Verse 309 (छंद)

तुम्हरे अनुग्रह तात कानन जात सब सुखु पाइहौं। प्रतिपालि आयसु कुसल देखन पाय पुनि फिरि आइहौं।। जननीं सकल परितोषि परि परि पायँ करि बिनती घनी। तुलसी करेहु सोइ जतनु जेहिं कुसली रहहिं कोसल धनी।।

Verse 310 (दोहा/सोरठा)

गुर सन कहब सँदेसु बार बार पद पदुम गहि। करब सोइ उपदेसु जेहिं न सोच मोहि अवधपति।।151।।

Verse 311 (चौपाई)

पुरजन परिजन सकल निहोरी। तात सुनाएहु बिनती मोरी।। सोइ सब भाँति मोर हितकारी। जातें रह नरनाहु सुखारी।। कहब सँदेसु भरत के आएँ। नीति न तजिअ राजपदु पाएँ।। पालेहु प्रजहि करम मन बानी। सेएहु मातु सकल सम जानी।। ओर निबाहेहु भायप भाई। करि पितु मातु सुजन सेवकाई।। तात भाँति तेहि राखब राऊ। सोच मोर जेहिं करै न काऊ।। लखन कहे कछु बचन कठोरा। बरजि राम पुनि मोहि निहोरा।। बार बार निज सपथ देवाई। कहबि न तात लखन लरिकाई।।

Verse 312 (दोहा/सोरठा)

कहि प्रनाम कछु कहन लिय सिय भइ सिथिल सनेह। थकित बचन लोचन सजल पुलक पल्लवित देह।।152।।

Verse 313 (चौपाई)

तेहि अवसर रघुबर रूख पाई। केवट पारहि नाव चलाई।। रघुकुलतिलक चले एहि भाँती। देखउँ ठाढ़ कुलिस धरि छाती।। मैं आपन किमि कहौं कलेसू। जिअत फिरेउँ लेइ राम सँदेसू।। अस कहि सचिव बचन रहि गयऊ। हानि गलानि सोच बस भयऊ।। सुत बचन सुनतहिं नरनाहू। परेउ धरनि उर दारुन दाहू।। तलफत बिषम मोह मन मापा। माजा मनहुँ मीन कहुँ ब्यापा।। करि बिलाप सब रोवहिं रानी। महा बिपति किमि जाइ बखानी।। सुनि बिलाप दुखहू दुखु लागा। धीरजहू कर धीरजु भागा।।

Verse 314 (दोहा/सोरठा)

भयउ कोलाहलु अवध अति सुनि नृप राउर सोरु। बिपुल बिहग बन परेउ निसि मानहुँ कुलिस कठोरु।।153।।

Verse 315 (चौपाई)

प्रान कंठगत भयउ भुआलू। मनि बिहीन जनु ब्याकुल ब्यालू।। इद्रीं सकल बिकल भइँ भारी। जनु सर सरसिज बनु बिनु बारी।। कौसल्याँ नृपु दीख मलाना। रबिकुल रबि अँथयउ जियँ जाना। उर धरि धीर राम महतारी। बोली बचन समय अनुसारी।। नाथ समुझि मन करिअ बिचारू। राम बियोग पयोधि अपारू।। करनधार तुम्ह अवध जहाजू। चढ़ेउ सकल प्रिय पथिक समाजू।। धीरजु धरिअ त पाइअ पारू। नाहिं त बूड़िहि सबु परिवारू।। जौं जियँ धरिअ बिनय पिय मोरी। रामु लखनु सिय मिलहिं बहोरी।।

Verse 316 (दोहा/सोरठा)

प्रिया बचन मृदु सुनत नृपु चितयउ आँखि उघारि। तलफत मीन मलीन जनु सींचत सीतल बारि।।154।।

Verse 317 (चौपाई)

धरि धीरजु उठी बैठ भुआलू। कहु सुमंत्र कहँ राम कृपालू।। कहाँ लखनु कहँ रामु सनेही। कहँ प्रिय पुत्रबधू बैदेही।। बिलपत राउ बिकल बहु भाँती। भइ जुग सरिस सिराति न राती।। तापस अंध साप सुधि आई। कौसल्यहि सब कथा सुनाई।। भयउ बिकल बरनत इतिहासा। राम रहित धिग जीवन आसा।। सो तनु राखि करब मैं काहा। जेंहि न प्रेम पनु मोर निबाहा।। हा रघुनंदन प्रान पिरीते। तुम्ह बिनु जिअत बहुत दिन बीते।। हा जानकी लखन हा रघुबर। हा पितु हित चित चातक जलधर।

Verse 318 (दोहा/सोरठा)

राम राम कहि राम कहि राम राम कहि राम। तनु परिहरि रघुबर बिरहँ राउ गयउ सुरधाम।।155।।

Verse 319 (चौपाई)

जिअन मरन फलु दसरथ पावा। अंड अनेक अमल जसु छावा।। जिअत राम बिधु बदनु निहारा। राम बिरह करि मरनु सँवारा।। सोक बिकल सब रोवहिं रानी। रूपु सील बलु तेजु बखानी।। करहिं बिलाप अनेक प्रकारा। परहीं भूमितल बारहिं बारा।। बिलपहिं बिकल दास अरु दासी। घर घर रुदनु करहिं पुरबासी।। अँथयउ आजु भानुकुल भानू। धरम अवधि गुन रूप निधानू।। गारीं सकल कैकइहि देहीं। नयन बिहीन कीन्ह जग जेहीं।। एहि बिधि बिलपत रैनि बिहानी। आए सकल महामुनि ग्यानी।।

Verse 320 (दोहा/सोरठा)

तब बसिष्ठ मुनि समय सम कहि अनेक इतिहास। सोक नेवारेउ सबहि कर निज बिग्यान प्रकास।।156।।

Verse 321 (चौपाई)

तेल नाँव भरि नृप तनु राखा। दूत बोलाइ बहुरि अस भाषा।। धावहु बेगि भरत पहिं जाहू। नृप सुधि कतहुँ कहहु जनि काहू।। एतनेइ कहेहु भरत सन जाई। गुर बोलाई पठयउ दोउ भाई।। सुनि मुनि आयसु धावन धाए। चले बेग बर बाजि लजाए।। अनरथु अवध अरंभेउ जब तें। कुसगुन होहिं भरत कहुँ तब तें।। देखहिं राति भयानक सपना। जागि करहिं कटु कोटि कलपना।। बिप्र जेवाँइ देहिं दिन दाना। सिव अभिषेक करहिं बिधि नाना।। मागहिं हृदयँ महेस मनाई। कुसल मातु पितु परिजन भाई।।

Verse 322 (दोहा/सोरठा)

एहि बिधि सोचत भरत मन धावन पहुँचे आइ। गुर अनुसासन श्रवन सुनि चले गनेसु मनाइ।।157।।

Verse 323 (चौपाई)

चले समीर बेग हय हाँके। नाघत सरित सैल बन बाँके।। हृदयँ सोचु बड़ कछु न सोहाई। अस जानहिं जियँ जाउँ उड़ाई।। एक निमेष बरस सम जाई। एहि बिधि भरत नगर निअराई।। असगुन होहिं नगर पैठारा। रटहिं कुभाँति कुखेत करारा।। खर सिआर बोलहिं प्रतिकूला। सुनि सुनि होइ भरत मन सूला।। श्रीहत सर सरिता बन बागा। नगरु बिसेषि भयावनु लागा।। खग मृग हय गय जाहिं न जोए। राम बियोग कुरोग बिगोए।। नगर नारि नर निपट दुखारी। मनहुँ सबन्हि सब संपति हारी।।

Verse 324 (दोहा/सोरठा)

पुरजन मिलिहिं न कहहिं कछु गवँहिं जोहारहिं जाहिं। भरत कुसल पूँछि न सकहिं भय बिषाद मन माहिं।।158।।

Verse 325 (चौपाई)

हाट बाट नहिं जाइ निहारी। जनु पुर दहँ दिसि लागि दवारी।। आवत सुत सुनि कैकयनंदिनि। हरषी रबिकुल जलरुह चंदिनि।। सजि आरती मुदित उठि धाई। द्वारेहिं भेंटि भवन लेइ आई।। भरत दुखित परिवारु निहारा। मानहुँ तुहिन बनज बनु मारा।। कैकेई हरषित एहि भाँति। मनहुँ मुदित दव लाइ किराती।। सुतहि ससोच देखि मनु मारें। पूँछति नैहर कुसल हमारें।। सकल कुसल कहि भरत सुनाई। पूँछी निज कुल कुसल भलाई।। कहु कहँ तात कहाँ सब माता। कहँ सिय राम लखन प्रिय भ्राता।।

Verse 326 (दोहा/सोरठा)

सुनि सुत बचन सनेहमय कपट नीर भरि नैन। भरत श्रवन मन सूल सम पापिनि बोली बैन।।159।।

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