यह सोपान ‘विरह-धर्म’ का द्वार है: राजधर्म, पुत्रधर्म, और भक्तिधर्म का एक साथ परीक्षण। अयोध्या काण्ड में राम का वनगमन केवल राजनीतिक घटना नहीं, ‘अनासक्ति’ और ‘आज्ञापालन’ की साधना है—जहाँ सुख (राज्य) त्यागकर ‘राम-नाम-स्मरण’ और ‘मर्यादा’ को मोक्ष-मार्ग की सीढ़ी बनाया जाता है। इस अंश में वन-जीवन की मधुरता (सीता का संतोष) और अयोध्या की वेदना (सुमंत्र-दशरथ का शोक) साथ रखकर तुलसी ‘राग’ को ‘वैराग्य’ में रूपांतरित करते हैं।
The dominant rasa of this section is karuṇā, yet this compassion is not mere dejection (viṣād); it is the ripening of bhakti (bhakti-paripāka). In the first movement, Sītā’s joy in the forest (a blend of śṛṅgāra and śānta) is revealed: the beloved’s companionship, roots and fruits, the leaf-hut—these make the wilderness dear, “equal to a thousand Ayodhyās.” Here Tulasī does not forbid sense-enjoyment through negative preaching; he replaces it with a higher attachment—love for the Lord’s feet (Rāma-caraṇa-anurāga). Then the gaze turns: Sumantra’s return, the horses’ anguish of separation, the city’s hush, and Daśaratha’s breaking—karuṇā-rasa reaches its crest. This is decisive in the staircase of the narrative: Rāma’s form as Maryādā-Puruṣottama becomes complete only when the pain of His renunciation descends into society (Ayodhyā) as moral awakening. Thus “viraha” becomes a tapas—cutting the mind away from worldly delight and steadying it in nāma-smaraṇa.
Verse 286 (चौपाई)
राम संग सिय रहति सुखारी। पुर परिजन गृह सुरति बिसारी।। छिनु छिनु पिय बिधु बदनु निहारी। प्रमुदित मनहुँ चकोरकुमारी।। नाह नेहु नित बढ़त बिलोकी। हरषित रहति दिवस जिमि कोकी।। सिय मनु राम चरन अनुरागा। अवध सहस सम बनु प्रिय लागा।। परनकुटी प्रिय प्रियतम संगा। प्रिय परिवारु कुरंग बिहंगा।। सासु ससुर सम मुनितिय मुनिबर। असनु अमिअ सम कंद मूल फर।। नाथ साथ साँथरी सुहाई। मयन सयन सय सम सुखदाई।। लोकप होहिं बिलोकत जासू। तेहि कि मोहि सक बिषय बिलासू।।
Verse 287 (दोहा/सोरठा)
-सुमिरत रामहि तजहिं जन तृन सम बिषय बिलासु। रामप्रिया जग जननि सिय कछु न आचरजु तासु।।140।।
Verse 288 (चौपाई)
सीय लखन जेहि बिधि सुखु लहहीं। सोइ रघुनाथ करहि सोइ कहहीं।। कहहिं पुरातन कथा कहानी। सुनहिं लखनु सिय अति सुखु मानी। जब जब रामु अवध सुधि करहीं। तब तब बारि बिलोचन भरहीं।। सुमिरि मातु पितु परिजन भाई। भरत सनेहु सीलु सेवकाई।। कृपासिंधु प्रभु होहिं दुखारी। धीरजु धरहिं कुसमउ बिचारी।। लखि सिय लखनु बिकल होइ जाहीं। जिमि पुरुषहि अनुसर परिछाहीं।। प्रिया बंधु गति लखि रघुनंदनु। धीर कृपाल भगत उर चंदनु।। लगे कहन कछु कथा पुनीता। सुनि सुखु लहहिं लखनु अरु सीता।।
Verse 289 (दोहा/सोरठा)
रामु लखन सीता सहित सोहत परन निकेत। जिमि बासव बस अमरपुर सची जयंत समेत।।141।।
Verse 290 (चौपाई)
जोगवहिं प्रभु सिय लखनहिं कैसें। पलक बिलोचन गोलक जैसें।। सेवहिं लखनु सीय रघुबीरहि। जिमि अबिबेकी पुरुष सरीरहि।। एहि बिधि प्रभु बन बसहिं सुखारी। खग मृग सुर तापस हितकारी।। कहेउँ राम बन गवनु सुहावा। सुनहु सुमंत्र अवध जिमि आवा।। फिरेउ निषादु प्रभुहि पहुँचाई। सचिव सहित रथ देखेसि आई।। मंत्री बिकल बिलोकि निषादू। कहि न जाइ जस भयउ बिषादू।। राम राम सिय लखन पुकारी। परेउ धरनितल ब्याकुल भारी।। देखि दखिन दिसि हय हिहिनाहीं। जनु बिनु पंख बिहग अकुलाहीं।।
Verse 291 (दोहा/सोरठा)
नहिं तृन चरहिं पिअहिं जलु मोचहिं लोचन बारि। ब्याकुल भए निषाद सब रघुबर बाजि निहारि।।142।।
Verse 292 (चौपाई)
धरि धीरज तब कहइ निषादू। अब सुमंत्र परिहरहु बिषादू।। तुम्ह पंडित परमारथ ग्याता। धरहु धीर लखि बिमुख बिधाता बिबिध कथा कहि कहि मृदु बानी। रथ बैठारेउ बरबस आनी।। सोक सिथिल रथ सकइ न हाँकी। रघुबर बिरह पीर उर बाँकी।। चरफराहिं मग चलहिं न घोरे। बन मृग मनहुँ आनि रथ जोरे।। अढ़ुकि परहिं फिरि हेरहिं पीछें। राम बियोगि बिकल दुख तीछें।। जो कह रामु लखनु बैदेही। हिंकरि हिंकरि हित हेरहिं तेही।। बाजि बिरह गति कहि किमि जाती। बिनु मनि फनिक बिकल जेहि भाँती।।
Verse 293 (दोहा/सोरठा)
भयउ निषाद बिषादबस देखत सचिव तुरंग। बोलि सुसेवक चारि तब दिए सारथी संग।।143।।
Verse 294 (चौपाई)
गुह सारथिहि फिरेउ पहुँचाई। बिरहु बिषादु बरनि नहिं जाई।। चले अवध लेइ रथहि निषादा। होहि छनहिं छन मगन बिषादा।। सोच सुमंत्र बिकल दुख दीना। धिग जीवन रघुबीर बिहीना।। रहिहि न अंतहुँ अधम सरीरू। जसु न लहेउ बिछुरत रघुबीरू।। भए अजस अघ भाजन प्राना। कवन हेतु नहिं करत पयाना।। अहह मंद मनु अवसर चूका। अजहुँ न हृदय होत दुइ टूका।। मीजि हाथ सिरु धुनि पछिताई। मनहँ कृपन धन रासि गवाँई।। बिरिद बाँधि बर बीरु कहाई। चलेउ समर जनु सुभट पराई।।
Verse 295 (दोहा/सोरठा)
बिप्र बिबेकी बेदबिद संमत साधु सुजाति। जिमि धोखें मदपान कर सचिव सोच तेहि भाँति।।144।।
Verse 296 (चौपाई)
जिमि कुलीन तिय साधु सयानी। पतिदेवता करम मन बानी।। रहै करम बस परिहरि नाहू। सचिव हृदयँ तिमि दारुन दाहु।। लोचन सजल डीठि भइ थोरी। सुनइ न श्रवन बिकल मति भोरी।। सूखहिं अधर लागि मुहँ लाटी। जिउ न जाइ उर अवधि कपाटी।। बिबरन भयउ न जाइ निहारी। मारेसि मनहुँ पिता महतारी।। हानि गलानि बिपुल मन ब्यापी। जमपुर पंथ सोच जिमि पापी।। बचनु न आव हृदयँ पछिताई। अवध काह मैं देखब जाई।। राम रहित रथ देखिहि जोई। सकुचिहि मोहि बिलोकत सोई।।
Verse 297 (दोहा/सोरठा)
-धाइ पूँछिहहिं मोहि जब बिकल नगर नर नारि। उतरु देब मैं सबहि तब हृदयँ बज्रु बैठारि।।145।।
Verse 298 (चौपाई)
पुछिहहिं दीन दुखित सब माता। कहब काह मैं तिन्हहि बिधाता।। पूछिहि जबहिं लखन महतारी। कहिहउँ कवन सँदेस सुखारी।। राम जननि जब आइहि धाई। सुमिरि बच्छु जिमि धेनु लवाई।। पूँछत उतरु देब मैं तेही। गे बनु राम लखनु बैदेही।। जोइ पूँछिहि तेहि ऊतरु देबा।जाइ अवध अब यहु सुखु लेबा।। पूँछिहि जबहिं राउ दुख दीना। जिवनु जासु रघुनाथ अधीना।। देहउँ उतरु कौनु मुहु लाई। आयउँ कुसल कुअँर पहुँचाई।। सुनत लखन सिय राम सँदेसू। तृन जिमि तनु परिहरिहि नरेसू।।
Verse 299 (दोहा/सोरठा)
-ह्रदउ न बिदरेउ पंक जिमि बिछुरत प्रीतमु नीरु।। जानत हौं मोहि दीन्ह बिधि यहु जातना सरीरु।।146।।
Verse 300 (चौपाई)
एहि बिधि करत पंथ पछितावा। तमसा तीर तुरत रथु आवा।। बिदा किए करि बिनय निषादा। फिरे पायँ परि बिकल बिषादा।। पैठत नगर सचिव सकुचाई। जनु मारेसि गुर बाँभन गाई।। बैठि बिटप तर दिवसु गवाँवा। साँझ समय तब अवसरु पावा।। अवध प्रबेसु कीन्ह अँधिआरें। पैठ भवन रथु राखि दुआरें।। जिन्ह जिन्ह समाचार सुनि पाए। भूप द्वार रथु देखन आए।। रथु पहिचानि बिकल लखि घोरे। गरहिं गात जिमि आतप ओरे।। नगर नारि नर ब्याकुल कैंसें। निघटत नीर मीनगन जैंसें।।
Verse 301 (दोहा/सोरठा)
-सचिव आगमनु सुनत सबु बिकल भयउ रनिवासु। भवन भयंकरु लाग तेहि मानहुँ प्रेत निवासु।।147।।
Verse 302 (चौपाई)
अति आरति सब पूँछहिं रानी। उतरु न आव बिकल भइ बानी।। सुनइ न श्रवन नयन नहिं सूझा। कहहु कहाँ नृप तेहि तेहि बूझा।। दासिन्ह दीख सचिव बिकलाई। कौसल्या गृहँ गईं लवाई।। जाइ सुमंत्र दीख कस राजा। अमिअ रहित जनु चंदु बिराजा।। आसन सयन बिभूषन हीना। परेउ भूमितल निपट मलीना।। लेइ उसासु सोच एहि भाँती। सुरपुर तें जनु खँसेउ जजाती।। लेत सोच भरि छिनु छिनु छाती। जनु जरि पंख परेउ संपाती।। राम राम कह राम सनेही। पुनि कह राम लखन बैदेही।।
Verse 303 (दोहा/सोरठा)
देखि सचिवँ जय जीव कहि कीन्हेउ दंड प्रनामु। सुनत उठेउ ब्याकुल नृपति कहु सुमंत्र कहँ रामु।।148।।
Verse 304 (चौपाई)
भूप सुमंत्रु लीन्ह उर लाई। बूड़त कछु अधार जनु पाई।। सहित सनेह निकट बैठारी। पूँछत राउ नयन भरि बारी।। राम कुसल कहु सखा सनेही। कहँ रघुनाथु लखनु बैदेही।। आने फेरि कि बनहि सिधाए। सुनत सचिव लोचन जल छाए।। सोक बिकल पुनि पूँछ नरेसू। कहु सिय राम लखन संदेसू।। राम रूप गुन सील सुभाऊ। सुमिरि सुमिरि उर सोचत राऊ।। राउ सुनाइ दीन्ह बनबासू। सुनि मन भयउ न हरषु हराँसू।। सो सुत बिछुरत गए न प्राना। को पापी बड़ मोहि समाना।।
Verse 305 (दोहा/सोरठा)
सखा रामु सिय लखनु जहँ तहाँ मोहि पहुँचाउ। नाहिं त चाहत चलन अब प्रान कहउँ सतिभाउ।।149।।
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