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Shloka 16

अक्षहृदय-विद्या-प्रदानम्

Transmission of Akṣa-hṛdaya; Kali’s Exit and the Bibhītaka Refuge

यथा न नृपतिर्भीम: प्रतिपद्येत मे मतम्‌ तथा त्वया प्रकर्तव्यं मम चेत्‌ प्रियमिच्छसि,“माँ! पिताजीको यह बात कदापि मालूम न होनी चाहिये। मैं तुम्हारे ही सामने विप्रवर सुदेवको इस कार्यमें लगाऊँगी। तुम ऐसी चेष्टा करो, जिससे पिताजीको मेरा विचार ज्ञात न हो। यदि तुम मेरा प्रिय करना चाहती हो तो तुम्हें इसके लिये सचेष्ट रहना होगा

“If you wish to do what is dear to me, then you must act so that my father, the king, does not perceive my intent.”

बृहदश्च उवाच