Sūrya’s Counsel to Karṇa on Indra’s Intended Request
Kuṇḍala–Kavaca Discourse
उपसृत्याब्रुवं चार्यामभिगम्य रहोगताम् । सीते रामस्य दूतो5हं वानरो मारुतात्मज:,“उनके केश जटाके रूपमें परिणत हो गये थे। अंग-अंगमें मैल जम गयी थी। वे दीन, दुर्बल और तपस्विनी दिखायी देती थीं। कई भिन्न-भिन्न कारणोंसे उन्हें आर्या सीताके रूपमें पहचानकर मैं एकान्तमें उनके निकट गया और इस प्रकार बोला--'देवि सीते! मैं श्रीरामचन्द्रजीका दूत पवनपुत्र हनुमान् नामक वानर हूँ
upasṛtyābruvaṃ cāryām abhigamya rahogatām | sīte rāmasya dūto 'haṃ vānaro mārutātmajaḥ ||
Approaching the noble lady in her seclusion, I said: “O Sītā, I am Rāma’s messenger—a vānar named Hanumān, the son of the Wind.”
मार्कण्डेय उवाच