Karṇa’s Counsel on Śrī
Fortune) and the Proposed Display before the Exiled Pāṇḍavas (कर्णवचनम् / श्रीप्रदर्शन-प्रस्तावः
तस्य तं निनदं श्रुत्वा न्यपतन् बहुधा जना: । भीताश्रोद्विग्नमनसस्तमेव शरणं ययु:,अपरिमित आत्मबलसे सम्पन्न और अदभुत पराक्रमी स्कन्द पर्वतके शिखरपर उदयकालमें अंशुमाली सूर्यकी भाँति शोभा पा रहे थे। फिर वे उस पर्वतकी चोटीपर बैठ गये और अपने अनेक मुखोंद्वारा सम्पूर्ण दिशाओंकी ओर देखने लगे। भाँति-भाँतिकी वस्तुओंको देखकर वे अमेयात्मा स्कन्द पुनः: बालोचित कोलाहल करने लगे। उनकी इस गर्जनाको सुनकर बहुत-से प्राणी पृथ्वीपर गिर गये। फिर भयभीत और उद्विग्नचित्त होकर उन सबने उन्हींकी शरण ली
tasya taṁ ninadaṁ śrutvā nyapatan bahudhā janāḥ | bhītāś ca udvignamanasas tam eva śaraṇaṁ yayuḥ ||
Hearing that thunderous roar, many people fell down in various ways. Frightened and with minds shaken by anxiety, they went to him alone for refuge.
मार्कण्डेय उवाच