Sarasvatī–Tārkṣya Saṃvāda: Agnihotra-vidhi, Dāna-phala, and Mokṣa-prasaṅga (सरस्वती–तार्क्ष्यसंवादः)
स्वर्ग परं पुण्यकृतो निवासं क्रमेण सम्प्राप्स्यथ कर्मभि: स्वै: । मा भूद् विशड्का तव कौरवेन्द्र दृष्टवा55त्मन: क्लेशमिमं सुखाहम्,तुम सभी शूर-वीर तथा तपस्या, इन्द्रियसंयम और उत्तम आचार-व्यवहारमें सदा ही तत्पर रहनेवाले हो। अतः (इस संसारमें बड़े-बड़े महत्त्वपूर्ण कार्य करके) देवताओं, ऋषियों और समस्त पितरोंको उत्तम विधिसे तृप्त करोगे। तत्पश्चात् अपने सत्कर्मोंके फलस्वरूप तुम सब लोग क्रमसे पुण्यात्माओंके निवास स्थान परम स्वर्गलोकको चले जाओगे। इसीलिये कौरवराज! तुम (अपने वर्तमान कष्टको देखकर) मनमें किसी प्रकारकी शंकाको स्थान न दो। यह क्लेश तो तुम्हारे भावी सुखका ही सूचक है
svargaṁ paraṁ puṇyakṛto nivāsaṁ krameṇa samprāpsyatha karmabhiḥ svaiḥ | mā bhūd viśaṅkā tava kauravendra dṛṣṭvātmanaḥ kleśam imaṁ sukhāhām ||
Mārkaṇḍeya said: “By your own deeds you will, step by step, attain the supreme heaven—the dwelling of the righteous. Therefore, O king of the Kurus, let no doubt arise in your mind on seeing this present hardship. This suffering is a sign that foretells your future happiness.”
मार्कण्डेय उवाच