Kubera’s Fivefold Nīti and Protection of the Pāṇḍavas (वैश्रवणोपदेशः)
महाभ्रघनसंकाशं सलिलोपहितं शुभम् । मणिकाज्चनरूप्यस्य शिलानां च समुच्चयम्,वे सभी पाण्डव नाना प्रकारके वृक्षोंसे हरे-भरे पर्वतीय शिखरोंपर डेरा डालते हुए चौथे दिन श्वेत (हिमालय) पर्वतपर जा पहुँचे, जो महामेघके समान शोभा पाता था। वह सुन्दर शैल शीतल सलिलराशिसे सम्पन्न था और मणि सुवर्ण, रजत तथा शिलाखण्डोंका समुदायरूप था। हिमालयका वह रमणीय प्रदेश अनेकानेक कन्दराओं और निर्डरोंसे सुशोभित शिलाखण्डोंके कारण दुर्गग तथा लताओं और वृक्षोंसे व्याप्त था। पाण्डव वृषपर्वाके बताये हुए मार्गका आश्रय ले नाना प्रकारके वृक्षोंका अवलोकन करते हुए अपने अभीष्ट स्थानकी ओर अग्रसर हो रहे थे
vaiśampāyana uvāca | mahābhraghanasaṅkāśaṃ salilopahitaṃ śubham | maṇikāñcanarūpyasya śilānāṃ ca samuccayam ||
Vaiśampāyana said: They reached a splendid mountain region, vast and cloud-like in appearance, graced with cool waters. It was beautiful and rich—an accumulation of gems, gold, silver, and great masses of stone.
वैशम्पायन उवाच