सौगन्धिकपुष्पप्रसङ्गः — The Saugaṇdhika Lotus and Bhīma’s Approach to Hanūmān
दिव्यपुष्पसमाकीर्णा मन:प्रीतिविवर्धिनीम् । वीक्षमाणा महात्मानो विशालां बदरीमनु,पूर्वोक्त विशाल बदरीवृक्षके समीप उत्तम तीर्थोंसे सुशोभित शीतल जलवाली भागीरथी गंगा बह रही थी, उसमें सुन्दर कमल खिले हुए थे। उसके घाट मणियों और मूँगोंसे आबद्ध थे। अनेक प्रकारके वृक्ष उसके तटप्रान्तकी शोभा बढ़ा रहे थे। वह दिव्य पुष्पोंसे आच्छादित हो हृदयके हर्षोल्लासकी वृद्धि कर रही थी। उसका दर्शन करके महात्मा पाण्डवोंने उस अत्यन्त दुर्गम देवर्षिसेवित प्रदेशमें भागीरथीके पवित्र जलमें स्थित हो परम पवित्रताके साथ देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंका तर्पण किया। इस प्रकार प्रतिदिन तर्पण और जप आदि करते हुए वे पुरुषश्रेष्ठ कुरुकुल-शिरोमणि वीर पाण्डव वहाँ ब्राह्मणोंके साथ रहने लगे। देवताओंके समान कान्तिमान् नरश्रेष्ठ पाण्डव वहाँ द्रौपदीकी विचित्र क्रीड़ाएँ देखते हुए सुखपूर्वक रमण करने लगे
divyapuṣpasamākīrṇā manaḥ-prītivivardhinīm | vīkṣamāṇā mahātmāno viśālāṃ badarīmanu ||
Ghaṭotkaca said: “Beholding that vast Badarī region—strewn with heavenly blossoms and increasing the heart’s delight—the great-souled ones looked on in wonder.” Here the tale stresses how sacred landscapes and disciplined daily rites (tarpaṇa and japa) steady the mind, deepen gratitude to gods, sages, and ancestors, and uphold the Pāṇḍavas’ dharmic resolve in exile.
घटोत्कच उवाच