यवक्रीत-वधः
The Slaying of Yavakrīta at Raibhya’s Hermitage
६:72...7 #::3..7 () मा अल - इस अन्नको ब्रह्मौदन कहते हैं, जैसा कि श्रुतिका कथन है--'साध्येभ्यो देवेभ्यो ब्रह्मौदनमपचत्” इति। षट्त्रिशर्दाधकशततमो< ध्याय: यवक्रीतका रैभ्यमुनिकी पुत्रवधूके साथ व्यभिचार और रैभ्यमुनिके क्रोधसे उत्पन्न राक्षसके द्वारा उसकी मृत्यु लोगश उवाच चड्क्रम्पमाण: स तदा यवक्रीरकुतो भय: । जगाम माधवे मासि रैभ्याश्रमपदं प्रति,लोमशजी कहते हैं--युधिष्ठिर! उन दिनों यवक्रीत सर्वथा भयशून्य होकर चारों ओर चक्कर लगाता था। एक दिन वैशाखमासमें वह रैभ्यमुनिके आश्रममें गया
Lomaśa uvāca — caṅkramamāṇaḥ sa tadā Yavakrīto ’kuto-bhayaḥ | jagāma Mādhave māsi Raibhyāśrama-padaṃ prati ||
Lomaśa said: “At that time Yavakrīta, utterly fearless, wandered about restlessly. Then, in the month of Mādhava (Vaiśākha), he went toward the hermitage-abode of the sage Raibhya.”
लोगश उवाच