इन्द्रस्य दुःखप्राप्तिः—त्रिशिरोवधः, वृत्रोत्पत्तिः, जृम्भिकाजननम्
Indra’s Distress: Slaying of Triśiras, Birth of Vṛtra, and the Origin of Yawning
यतिष्यामो वशे कर्तु व्यपनेतुं च ते भयम् । देव! जो तपोनिधि विश्वरूप अपने दोनों नेत्रोंसे सबको दग्ध करते हुए-से विराज रहे हैं, उन्हें प्रलोभनमें डालनेके लिये हम सब अप्सराएँ एक साथ जा रही हैं। वहाँ उन्हें वशमें करने तथा आपके भयको दूर हटानेके लिये हम पूर्ण प्रयत्न करेंगी ।। १४ ह ।। शल्य उवाच इन्द्रेण तास्त्वनुज्ञाता जम्मुस्त्रेशिरसो5न्तिकम् । तत्र ता विविधैभविलों भयन्त्यो वराड़्नना:,इन्द्रियाणि वशे कृत्वा पूर्वसागरसंनिभ: । शल्य बोले--राजन्! इन्द्रकी आज्ञा पाकर वे सब अप्सराएँ त्रिशिराके समीप गयीं। वहाँ उन सुन्दरियोंने भाँति-भाँतिके हाव-भावोंद्वारा उन्हें लुभानेका प्रयत्न किया तथा प्रतिदिन विश्वरूपको अपने अंगोंके सौन्दर्यका दर्शन कराया। तथापि वे महातपस्वी महर्षि उन सबको देखते हुए हर्ष आदि विकारोंको नहीं प्राप्त हुए; अपितु वे इन्द्रियोंको वशमें करके पूर्वसागरके समान शान्तभावसे बैठे रहे
śalya uvāca | indreṇa tāstv anu jñātā jagmustriśiraso 'ntikam | tatra tā vividhair bhāvair lubhayantyo varāṅganāḥ | indriyāṇi vaśe kṛtvā pūrvasāgarasaṃnibhaḥ ||
Śalya said: “O King, permitted by Indra, those apsarases went to Triśiras. There the beautiful women tried to entice him with many kinds of gestures and expressions. Yet that great ascetic, having brought his senses under control, remained calm and unmoved—like the tranquil eastern ocean.”
शल्य उवाच