भीमसेनस्य आत्मबलप्रशंसा — Bhīmasena’s Assertion of Strength
Udyoga Parva, Adhyāya 74
संतेजयंस्तदा वाम्भिर्मातरिश्वेव पावकम् | उवाच भीममासीनं कृपयाभिपरिप्लुतम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--भीमसेनके मुखसे यह अभूतपूर्व मृदुतापूर्ण वचन सुनकर महाबाहु भगवान् श्रीकृष्ण हँसने-से लगे। जैसे पर्वतमें लघुता आ जाय और अम्निमें शीतलता प्रकट हो जाय, उसी प्रकार उनमें यह नम्रताका प्रादुर्भाव हुआ था। यह सोचकर शार्ड्धनुष धारण करनेवाले रामानुज श्रीकृष्ण अपने पास बैठे हुए वृकोदर भीमसेनको, जो उस समय दयासे द्रवित हो रहे थे, अपने वचनोंद्वारा उसी प्रकार उत्तेजित करते हुए बोले, मानो वायु अग्निको उद्दीप्त कर रही हो
saṃtejayaṃs tadā vāmbhir mātariśveva pāvakam | uvāca bhīmam āsīnaṃ kṛpayābhipariplutam ||
Vaiśampāyana said: Then, as the Wind-god kindles fire with gusts, he roused Bhīma with words—Bhīma who sat nearby, overwhelmed and flooded with compassion.
वैशम्पायन उवाच