अध्याय २९ — वासुदेव–संजय संवादः
Karma, Varṇa-Dharma, and the Ethics of Governance
[दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ५९ “लोक हैं।] - इस प्रकार यद्यपि गृहस्थाश्रममें रहने और संन्यास लेनेका भी शास्त्रद्वारा ही विधान किया गया है, तथापि अन्य आश्रमोंमें प्राप्त होनेवाले ज्ञानकी उपलब्धि तो गृहस्थाश्रममें भी हो सकती है, परंतु गृहस्थ-साध्य यज्ञादि पुण्यकर्म आश्रमान्तरोंमें नहीं हो सकते; अत: सम्पूर्ण धर्मोकी सिद्धिका स्थान गृहस्थाश्रम ही है। त्रिशो5ध्याय: संजयकी विदाई तथा युधिषिरका संदेश संजय उवाच आमन्त्रये त्वां नरदेवदेव गच्छाम्यहं पाण्डव स्वस्ति तेडस्तु । कच्चिन्न वाचा वृजिनं हि किंचि- दुच्चारितं मे ममनसो5भिषज्भात्,संजयने कहा--नरदेवदेव पाण्डुनन्दन! आपका कल्याण हो। अब मैं आपसे विदा लेता और हस्तिनापुरको जाता हूँ। कहीं ऐसा तो नहीं हुआ कि मैंने मानसिक आवेगके कारण वाणीद्वारा कोई ऐसी बात कह दी हो, जिससे आपको कष्ट हुआ हो? इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सञ्जययानपर्वणि युधिष्ठिरसंदेशे त्रिंशो 5ध्याय: ।। ३० || इस प्रकार श्रीमह्याभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत संजययानपर्वमें युधिष्ठिरसंदेशविषयक तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ३० ॥। [दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ५० “लोक हैं।] ऑपन--#हू< बछ। है २ >> एकत्रिशो<5 ध्याय: युधिष्ठटिरका मुख्य-मुख्य कुरुवंशियोंके प्रति संदेश युधिछिर उवाच उत सनन््तमसन्तं वा बाल॑ वृद्ध च संजय । उताबलं बलीयांसं धाता प्रकुरुते वशे
sañjaya uvāca |
āmantṛye tvāṁ naradeva-deva gacchāmy ahaṁ pāṇḍava svasti te 'stu |
kaccin na vācā vṛjinaṁ hi kiñcid uccāritaṁ me mama manaso 'bhiṣaṅgāt ||
Sañjaya said: “O god among kings, O Pāṇḍava, may well-being be yours. I now take leave of you and depart for Hastināpura. Tell me—have I, driven by a sudden surge of feeling in my mind, spoken any word that was in the least hurtful or improper, causing you distress?”
संजय उवाच