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Shloka 12

Yuddha-yajña-vyākhyāna (The Battle as Sacrifice): Ambarīṣa–Indra Saṃvāda

शक्र उवाच यदनेन कृतं कर्म प्रत्यक्ष ते महीपते ।। पुरा पालयत: सम्यक्‌ पृथिवीं धर्मतो नृप । इन्द्रने कहा--पृथ्वीनाथ! नरेश्वर! पूर्वकालमें जब आप धर्मके अनुसार भलीभाँति इस पृथ्वीका पालन कर रहे थे, उस समय सुदेवने जो पराक्रम किया था, उसे आपने प्रत्यक्ष देखा था ।। शत्रवो निर्जिता: सर्वे ये तवाहितकारिण: ।। संयमो वियमश्चैव सुयमश्न महाबल: । राक्षसा दुर्जया लोके त्रयस्ते युद्धदुर्मदा: । पुत्रास्ते शतशुड्गस्य राक्षसस्य महीपते ।। महीपाल! उन दिनों आपके तीन शत्रु थे--संयम, वियम और महाबली सुयम। वे सब- के-सब आपका अहित करनेवाले थे। वे शतशूंग नामक राक्षसके पुत्र थे। लोकोंमें किसीके लिये भी उन तीनों रणदुर्मद राक्षसरोंपर विजय पाना कठिन था। सुदेवने उन सबको परास्त कर दिया था ।। अथ तस्मिन्‌ शुभे काले तव यज्ञ वितन्वत: । अश्वमेधं महायागं देवानां हितकाम्यया । तस्य ते खलु विधघ्नार्थ आगता राक्षसास्त्रय: ।। एक समय जब आप देवताओंके हितकी इच्छासे शुभ मुहूर्तमें अश्वमेध नामक महायज्ञका अनुष्ठान कर रहे थे, उन्हीं दिनों आपके उस यज्ञमें विघ्न डालनेके लिये वे तीनों राक्षस वहाँ आ पहुँचे ।। कोटीशतपरीवारां राक्षसानां महाचमूम्‌ | परिगृह्य तत: सर्वा: प्रजा बन्दीकृतास्तव ।। विह्वलाश्ष प्रजा: सर्वा: सर्वे च तव सैनिका: । उन्होंने सौ करोड़ राक्षसोंकी विशाल सेना साथ लेकर आक्रमण किया और आपकी समस्त प्रजाओंको पकड़कर बंदी बना लिया। उस समय आपकी समस्त प्रजा और सारे सैनिक व्याकुल हो उठे थे ।। निराकृतस्त्वया चासीत्‌ सुदेव: सैन्यनायक: । तत्रामात्यवच: श्र॒ुत्वा निरस्त: सर्वकर्मसु ।। उन दिनों सेनापतिके विरुद्ध मन्त्रीकी बात सुनकर आपने सेनापति सुदेवको अधिकारसे वंचित करके सब कार्योसे अलग कर दिया था ।। श्रुत्वा तेषां वचो भूय: सोपधं वसुधाधिप । सर्वसैन्यसमायुक्त: सुदेव: प्रेरितस्त्वया ।। राक्षसानां वधार्थाय दुर्जयानां नराधिप । पृथ्वीनाथ! नरेश्वर! फिर उन्हीं मन्त्रियोंकी कपटपूर्ण बात सुनकर आपने उन दुर्जय राक्षसोंके वधके लिये सेनासहित सुदेवको युद्धमें जानेकी आज्ञा दे दी ।। नाजित्वा राक्षसीं सेनां पुनरागमनं तव ।। बन्दीमोक्षमकृत्वा च न चागमनमिष्यते । और जाते समय यह कहा--'राक्षसोंकी सेनाको पराजित करके उनके कैदमें पड़ी हुई प्रजा और सैनिकोंका उद्धार किये बिना तुम यहाँ लौटकर मत आना” ।। सुदेवस्तद्वचः श्र॒त्वा प्रसथ्थानमकरोन्नूप ।। सम्प्राप्तश्न स तं॑ देशं यत्र बन्दीकृता: प्रजा: । पश्यति सम महाघोरां राक्षसानां महाचमूम्‌ ।। नरेश्वरर! आपकी वह बात सुनकर सुदेवने तुरंत ही प्रस्थान किया और वह उस स्थानपर गया, जहाँ आपकी प्रजा बंदी बना ली गयी थी। उसने वहाँ राक्षसोंकी महाभयंकर विशाल सेना देखी ।। दृष्टवा संचिन्तयामास सुदेवो वाहिनीपति: । नेयं शक्‍्या चमूर्जेतुमपि सेन्द्रेः सुरासुरैः ।। नाम्बरीष: कलामेकामेषां क्षपयितु क्षम: । दिव्यास्त्रबलभूयिष्ठ: किमहं पुनरीदृश:ः ।। उसे देखकर सेनापति सुदेवने सोचा कि यह विशाल वाहिनी तो इन्द्र आदि देवताओं तथा असुरोंसे भी नहीं जीती जा सकती। महाराज अम्बरीष दिव्य अस्त्र एवं दिव्य बलसे सम्पन्न हैं, परंतु वे इस सेनाके सोलहवें भागका भी संहार करनेमें समर्थ नहीं हैं। जब उनकी यह दशा है, तब मेरे-जैसा साधारण सैनिक इस सेनापर कैसे विजय पा सकता है? ।। ततः सेनां पुनः सर्वा प्रेषयामास पार्थिव । यत्र त्वं सहितः सर्वर्मन्त्रिभि: सोपधैर्न॒प ।। राजन्‌! यह सोचकर सुदेवने फिर सारी सेनाको वहीं वापस भेज दिया, जहाँ आप उन समस्त कपटी मन्त्रियोंके साथ विराजमान थे ।। ततो रुद्रं महादेवं प्रपन्नो जगत: प्रतिम्‌ । श्मशाननिलयं देवं तुष्टाव वृषभध्वजम्‌ ।। तदनन्तर सुदेवने श्मशानवासी महादेव जगदीश्वर रुद्रदेवकी शरण ली और उन भगवान्‌ वृषभध्वजका स्तवन किया ।। स्तुत्वा शस्त्र समादाय स्वशिरश्छेत्तुमुद्यत: । कारुण्याद्‌ देवदेवेन गृहीतस्तस्य दक्षिण: ।। सपाणि: सह शस्त्रेण दृष्टवा चेदमुवाच ह । स्तुति करके वह खड़्ग हाथमें लेकर अपना सिर काटनेको उद्यत हो गया। तब देवाधिदेव महादेवने करुणावश सुदेवका वह खड़्गसहित दाहिना हाथ पकड़ लिया और उसकी ओर स्नेहपूर्वक देखकर इस प्रकार कहा ।। रुद्र उवगाच किमिदं साहसं पुत्र कर्तुकामो वदस्व मे । रुद्र बोले--पुत्र! तुम ऐसा साहस क्यों करना चाहते हो? मुझसे कहो ।। इन्द्र रवाच स उवाच महादेवं शिरसा त्ववनीं गतः ।। भगवन्‌ वाहिनीमेनां राक्षसानां सुरेश्वर । अशक्तोऊहं रणे जेतुं तस्मात्‌ त्यक्ष्यामि जीवितम्‌ ।। गतिर्भव महादेव ममार्तस्य जगत्पते । नागन्तव्यमजित्वा च मामाह जगतीपति: ।। अम्बरीषो महादेव क्षारित: सचिवै: सह । तमुवाच महादेव: सुदेव॑ पतितं क्षितौ । अधोमुखं महात्मानं सत्त्वानां हितकाम्यया ।। धनुर्वेदे समाहूय सगुणं सहविग्रहम्‌ । रथनागाश्व॒कलिल दिव्यास्त्रसमलंकृतम्‌ ।। रथं च सुमहाभागं येन तत्‌ त्रिपुरं हतम्‌ । धनु: पिनाकं खडगं च रौद्रमस्त्रं च शड्कर: ।। निजघानासुरान्‌ सर्वान्‌ येन देवस्त्रयम्बक: । उवाच च महादेव: सुदेवं वाहिनीपतिम्‌ ।। इन्द्र कहते हैं--राजन्‌! तब सुदेवने महादेवजीको पृथ्वीपर मस्तक रखकर प्रणाम किया और इस प्रकार कहा--'भगवन! सुरेश्वर! मैं इस राक्षस सेनाको युद्धमें नहीं जीत सकता; इसलिये इस जीवनको त्याग देना चाहता हूँ। महादेव! जगत्पते! आप मुझ आर्तको शरण दें। मन्त्रियोंसहित महाराज अम्बरीष मुझपर कुपित हुए बैठे हैं। उन्होंने स्पष्टरूपसे आज्ञा दी है कि इस सेनाको पराजित किये बिना तुम लौटकर न आना।' तब महादेवजीने पृथ्वीपर नीचे मुख किये पड़े हुए महामना सुदेवसे समस्त प्राणियोंके हितकी कामनासे कुछ कहनेकी इच्छा की। पहले उन्होंने गुण और शरीरसहित धनुर्वेदको बुलाकर रथ, हाथी और घोड़ोंसे भरी हुई सेनाका आवाहन किया, जो दिव्य अस्त्र-शस्त्रोंसे विभूषित थी। इसके बाद उन्होंने उस महान्‌ भाग्यशाली रथको भी वहाँ उपस्थित कर दिया, जिससे उन्होंने त्रिपुरका नाश किया था। फिर पिनाक नामक धनुष, अपना खड्ग तथा अस्त्र भी भगवान्‌ शंकरने दे दिया, जिसके द्वारा उन भगवान्‌ त्रिलोचनने समस्त असुरोंका संहार किया था। तदनन्तर महादेवजीने सेनापति सुदेवसे इस प्रकार कहा ।। रुद्र उ्वाच रथादस्मात्‌ सुदेव त्वं दुर्जयस्तु सुरासुरै: । मायया मोहितो भूमौ न पद कर्तुमरहसि ।। अत्रस्थस्त्रिदशान्‌ सर्वान्‌ जेष्यसे सर्वदानवान्‌ | राक्षसाश्न पिशाचाश्व न शक्ता द्रष्टमीदृशम्‌ ।। रथ॑ सूर्यसहस््राभं किमु योद्धं त्वया सह | रुद्र बोले--सुदेव! तुम इस रथके कारण देवताओं और असुरोंके लिये भी दुर्जय हो गये हो, परंतु किसी मायासे मोहित होकर अपना पैर पृथ्वीपर न रख देना। इसपर बैठे रहोगे तो समस्त देवताओं और दानवोंको जीत लोगे। यह रथ सहस्रों सूर्योके समान तेजस्वी है। राक्षत और पिशाच ऐसे तेजस्वी रथकी ओर देख भी नहीं सकते; फिर तुम्हारे साथ युद्ध करनेकी तो बात ही क्या है? ।। इन्द्र उवाच स जित्वा राक्षसान्‌ सर्वान्‌ कृत्वा बन्दीविमोक्षणम्‌ | घातयित्वा च तान्‌ सर्वान्‌ बाहुयुद्धेत्वयं हतः । वियमं प्राप्प भूपाल वियमश्न निपातित: ।।) इन्द्र कहते हैं--राजन्‌! तत्पश्चात्‌ सुदेवने उस रथके द्वारा समस्त राक्षसोंको जीतकर बंदी प्रजाओंको बन्धनसे छुड़ा दिया और समस्त शत्रुओंका संहार करके वियमके साथ बाहुयुद्ध करते समय स्वयं भी मारा गया, साथ ही इसने उस युद्धमें वियमको भी मार डाला ।। इन्द्र उवाच एतस्य विततस्तात सुदेवस्य बभूव ह । संग्रामयज्ञ: सुमहान्‌ यश्चान्यो युद्धयते नर:,इन्द्र बोले--तात! इस सुदेवने बड़े विस्तारके साथ महान्‌ रणयज्ञ सम्पन्न किया था। दूसरा भी जो मनुष्य युद्ध करता है, उसके द्वारा इसी तरह संग्राम-यज्ञ सम्पादित होता है

śakra uvāca yad anena kṛtaṃ karma pratyakṣa te mahīpate | purā pālayataḥ samyak pṛthivīṃ dharmato nṛpa ||

Indra said: “O lord of the earth, O king—when in former times you were rightly governing the world in accordance with dharma, you yourself witnessed directly the deed that Sudeva performed.”

शक्रःŚakra (Indra)
शक्रः:
Karta
TypeNoun
Rootशक्र
FormMasculine, Nominative, Singular
उवाचsaid
उवाच:
TypeVerb
Rootवच्
FormPerfect, Third, Singular, Parasmaipada
यत्that which
यत्:
Karma
TypePronoun
Rootयद्
FormNeuter, Nominative/Accusative, Singular
अनेनby him/with this (one)
अनेन:
Karana
TypePronoun
Rootइदम्
FormMasculine/Neuter, Instrumental, Singular
कृतम्done, performed
कृतम्:
TypeAdjective
Rootकृ
FormPast Passive Participle (क्त), Neuter, Nominative/Accusative, Singular
कर्मdeed, act
कर्म:
Karma
TypeNoun
Rootकर्मन्
FormNeuter, Nominative/Accusative, Singular
प्रत्यक्षम्directly, before (one’s) eyes
प्रत्यक्षम्:
TypeAdjective
Rootप्रत्यक्ष
FormNeuter, Nominative/Accusative, Singular
तेof you/your
ते:
TypePronoun
Rootयुष्मद्
FormGenitive, Singular
महीपतेO lord of the earth (king)
महीपते:
TypeNoun
Rootमहीपति
FormMasculine, Vocative, Singular
पुराformerly, earlier
पुरा:
Adhikarana
TypeIndeclinable
Rootपुरा
पालयतःwhile (you were) protecting/ruling
पालयतः:
TypeVerb
Rootपालय् (पाल्)
FormPresent Active Participle (शतृ), Masculine, Genitive, Singular
सम्यक्properly, well
सम्यक्:
TypeIndeclinable
Rootसम्यक्
पृथिवीम्the earth
पृथिवीम्:
Karma
TypeNoun
Rootपृथिवी
FormFeminine, Accusative, Singular
धर्मतःaccording to dharma/righteously
धर्मतः:
TypeIndeclinable
Rootधर्म
Formतसिल् (ablatival adverb)
नृपO king
नृप:
TypeNoun
Rootनृप
FormMasculine, Vocative, Singular

इन्द्र उवाच

I
Indra (Śakra)
K
King (Mahīpati/Nṛpa; addressee, identified in the surrounding narrative as Ambarīṣa)
E
Earth/Kingdom (Pṛthivī)
D
Dharma