नागैः सह ब्राह्मणस्य अतिथिधर्म-व्रतसंवादः | The Brahmin’s Vow and the Nāgas’ Hospitality Appeal
नास्य भक्तात् प्रियतरो लोके कश्नन विद्यते । ततः स्वयं दर्शितवान् स्वमात्मानं द्विजोत्तम,नारद! वे भगवान् पुरुषोत्तम अव्यक्त प्रकृतिके मूल कारण हैं। उनका दर्शन मिलना अत्यन्त कठिन है। द्विजश्रेष्ठ! हम दोनों तुमसे सच कहते हैं कि भगवान्को इस जगतमें भक्तसे बढ़कर दूसरा कोई प्रिय नहीं है। इसलिये उन्होंने स्वयं ही तुम्हें अपने स्वरूपका दर्शन कराया है
nāsya bhaktāt priyataro loke kaścana vidyate | tataḥ svayaṃ darśitavān svam ātmānaṃ dvijottama nārada |
“In this world, no one is dearer to Him than His devotee. Therefore, O best of twice-born, He Himself has revealed His own Self to you, Nārada.”
नारद उवाच