धर्मस्य बहुद्वारत्वम् — Nārada’s Audience with Indra (Śānti-parva 340)
किंचिच्चन्द्राद् विशुद्धात्मा किंचिच्चन्द्राद् विशेषवान् | कृशानुवर्ण: किंचिच्च किंचिद्धिष्ण्याकृति: प्रभु:,उनका वह स्वरूप कुछ चन्द्रमासे भी अधिक निर्मल और कुछ चन्द्रमासे भी विलक्षण था। कुछ अग्निके समान देदीप्यमान और कुछ नक्षत्रोंक समान जाज्वल्यमान था
भीष्म उवाच