Śoka-śamana: Kṛṣṇa’s Consolation and Nārada’s Exempla to Sṛñjaya
Chapter 29
अविमुक्ता मरिष्यामस्तत्र का परिदेवना । 'सृंजय! मैं, तुम और ये समस्त प्रजावर्गके लोग कोई भी सुख और दु:खोंके बन्धनसे मुक्त नहीं हुए हैं तथा एक दिन हम सब लोग मरेंगे भी। फिर इसके लिय शोक क्या करना है?,यृंजय उवाच शृणोमि ते नारद वाचमेनां विचित्रार्था स्रजमिव पुण्यगन्धाम् । राजर्षीणां पुण्यकृतां महात्मनां कीर्त्या युक्तानां शोकनिर्णाशनार्थाम् सृंजयने कहा--नारद! पवित्र गन्धवाली मालाके समान विचित्र अर्थसे भरी हुई आपकी इस वाणीको मैं सुन रहा हूँ। पुण्यात्मा महामनस्वी और कीर्तिशाली राजर्षियोंके चरित्रसे युक्त आपका यह वचन सम्पूर्ण शोकोंका विनाश करनेवाला है
avimuktā mariṣyāmas tatra kā paridevanā |
Vāyu said: “We are not freed from the bonds of pleasure and pain; we too will die. In that case, what room is there for lamentation?”
वायुदेव उवाच