Adhyāya 284: Tapas as a Corrective to Household Attachment
Parāśara’s Instruction
मया पाशुपतं दक्ष शुभमुत्पादितं पुरा । तस्य चीर्णस्य तत् सम्यक् फलं भवति पुष्कलम् | तच्चास्तु ते महाभाग त्यज्यतां मानसो ज्वर:,“दक्ष! मैंने पूर्वकालमें एक शुभकारक पाशुपत नामक व्रतको प्रकट किया था, जो अपूर्व है। साधन और सिद्धि सभी अवस्थाओंमें सब प्रकारसे कल्याणकारी, सर्वतोमुखी (सभी वर्णों और आश्रमोंके अनुकूल) तथा मोक्षका साधक होनेके कारण अविनाशी है। वर्षोतक पुण्यकर्म करने और यम-नियम नामक दस साधनोंको अभ्यासमें लानेसे उसकी उपलब्धि होती है। वह गूढ़ है। मूर्ख मनुष्य उसकी निन्दा करते हैं। वह समस्त वर्णधर्म और आश्रम-धर्मके अनुकूल, सम और किसी-किसी अंशमें विपरीत भी है। जिन्हें सिद्धान्तका ज्ञान है उन्होंने इसे अपनानेका पूर्ण निश्चय कर लिया है। यह व्रत सभी आश्रमोंसे बढ़कर है। इसके अनुष्ठानसे उत्तम एवं प्रचुर फलकी प्राप्ति होती है। महाभाग! उस पाशुपत व्रतके अनुष्ठानका फल तुम्हें प्राप्त हो। अब तुम अपनी मानसिक चिन्ताका परित्याग कर दो”
mayā pāśupataṁ dakṣa śubham utpāditaṁ purā | tasya cīrṇasya tat samyak phalaṁ bhavati puṣkalam | taccāstu te mahābhāga tyajyatāṁ mānaso jvaraḥ ||
Bhīṣma said: “O Dakṣa, long ago I brought forth an auspicious observance called the Pāśupata vow. When it is properly undertaken and lived out, its fruit becomes abundant and complete. May that very fruit come to you, O noble one; cast off the fever of anxiety in your mind.”
भीष्म उवाच