कर्मविद्या-भेदः
Karma–Vidyā Distinction: Paths of Bondage and Release
2८5 9 शीला > इन सप्तर्षियोंके नाम इस प्रकार हैं-- मरीचिरद्रिराश्षात्रि: पुलस्त्य: पुलह: क्रतु: | वसिष्ठ इति सप्तैते मानसा निर्मिता हि ते ।। (महा० शान्ति० ३४०६९) मरीचि, अंगिरा, अत्रि, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वसिष्ठ--ये सातों महर्षि तुम्हारे (ब्रह्माजीके) द्वारा ही अपने मनसे रचे हुए हैं। - स्वाध्याय, गार्हस्थ्य, संध्यावन्दनादि, कृच्छुचान्द्रायणादि, यज्ञ, पूर्तकर्म, योग, दान, गुरुशुश्रूषा और समाधि--ये दस क्रमयोग हैं। त्रयस्त्रिशर्दाधिकद्धिशततमो< ध्याय: ब्राह्मप्रलय एवं महाप्रलयका वर्णन व्यास उवाच प्रत्याहारं तु वक्ष्यामि शर्वर्यादौ गतेडहनि । यथेदं कुरुतेध्यात्मं सुसूक्ष्मं विश्वमीश्वर:,व्यासजी कहते हैं--बेटा! अब मैं यह बता रहा हूँ कि ब्रह्माजीका दिन बीतनेपर उनकी रात्रि आरम्भ होनेके पहले ही किस प्रकार इस सृष्टिका लय होता है तथा लोकेश्वर ब्रह्माजी स्थूल जगत्को अत्यन्त सूक्ष्म करके इसे कैसे अपने भीतर लीन कर लेते हैं?
vyāsa uvāca | pratyāhāraṃ tu vakṣyāmi śarvaryādau gate 'hani | yathā idaṃ kurute 'dhyātmaṃ susūkṣmaṃ viśvam īśvaraḥ ||
Vyāsa said: “Now I shall explain withdrawal (pratyāhāra): when Brahmā’s day has passed and the onset of his night begins, how the Lord of the worlds draws this entire universe inward—making the gross creation exceedingly subtle—and dissolves it into himself.”
व्यास उवाच