ब्राह्मणस्य पूर्वतरा वृत्तिः — The Earlier Ideal Conduct of a Brahmana
River-of-Saṃsāra Metaphor
ये तथा और भी बहुत-सी कठोर बातें सुनाकर इन्द्रने बलिका तिरस्कार किया। विरोचनकुमार बलिने वे सारी बातें बड़े आनन्दसे सुन लीं और मनमें तनिक भी घबराहट न लाकर उन्हें इस प्रकार उत्तर दिया ।। बलिरुवाच निगृहीते मयि भृशं शक्र कि कत्थितेन ते । वज़मुद्यम्य तिष्ठन्तं पश्यामि त्वां पुरंदर,बलिने कहा--इन्द्र! जब मैं शत्रुओं अथवा कालके द्वारा भलीभाँति बन्दी बना लिया गया हूँ, तब मेरे सामने इस प्रकार बढ़-बढ़कर बातें बनानेसे तुम्हें क्या लाभ होगा? पुरंदर! मैं देखता हूँ, आज तुम वज्र उठाये मेरे सामने खड़े हो
balir uvāca | nigṛhīte mayi bhṛśaṃ śakra kiṃ katthitena te | vajram udyamya tiṣṭhantaṃ paśyāmi tvāṃ purandara ||
Bali said: “O Śakra, when I have already been firmly seized and restrained, what do you gain by boasting so loudly before me? O Purandara, I see you standing here with your thunderbolt raised.”
भीष्म उवाच