Śrī–Indra–Bali Saṃvāda: The Departure and Fourfold Placement of Lakṣmī
पञ्चज्ञ: पञज्चकृत्पज्चगुण: पञजचशिख: स्मृतः । पुरुषावस्थमव्यक्तं परमार्थ न्यवेदयत्,एक समय आसूुरि मुनि अपने आश्रममें बैठे हुए थे। इसी समय कपिलमतावलम्बी मुनियोंका महान् समुदाय वहाँ आया और प्रत्येक पुरुषके भीतर स्थित, अव्यक्त एवं परमार्थतत्त्वके विषयमें उनसे कुछ कहनेका अनुरोध करने लगा। उन्हींमें पंचशिख भी थे, जो पाँच स्रोतों (इन्द्रियों) वाले मनके व्यापार (ऊहापोह) में कुशल थे, पंचरात्र आगमके विशेषज्ञ थे, पाँच कोशोंके ज्ञाता और तद्विषयक पाँच प्रकारकी उपासनाओंके जानकार थे। शाम, दम, उपरति, तितिक्षा और समाधान--इन पाँच गुणोंसे भी युक्त थे। उन पाँचों कोशोंसे भिन्न होनेके कारण उनके शिखास्थानीय जो ब्रह्म है, वह पंचशिख कहा गया है। उसके ज्ञाता होनेसे ऋषिको भी “पंचशिख' माना गया है
bhīṣma uvāca | pañcajñaḥ pañcakṛt pañcaguṇaḥ pañcaśikhaḥ smṛtaḥ | puruṣāvastham avyaktam paramārthaṃ nyavedayat |
Bhishma said: He is remembered as Pañcaśikha—one who knows the five, acts through the five, and is endowed with five qualities. He expounded the supreme truth: the unmanifest principle abiding within the state of the person (puruṣa).
भीष्म उवाच