Bala and Dharma in Kṣatriya Governance (बल-धर्म सम्बन्धः)
विभक्तपुरराष्ट्रस्य निर्द्रव्यनिचयस्य च । असम्भावितमित्रस्य भिन्नामात्यस्य सर्वश:,युधिष्ठिरने पूछा--भरतनन्दन! जिसकी सेना और धन-सम्पत्ति क्षीण हो गयी है, जो आलसी है, बन्धु-बान्धवोंपर अधिक दया रखनेके कारण उनके नाशकी आशंकासे जो उन्हें साथ लेकर शत्रुके साथ युद्ध नहीं कर सकता, जो मन्त्री आदिके चरित्रपर संदेह रखता है अथवा जिसका चरित्र स्वयं भी शंकास्पद है, जिसकी मन्त्रणा गुप्त नहीं रह सकी है, उसे दूसरे लोगोंने सुन लिया है, जिसके नगर और राष्ट्रको कई भागोंमें बाँटकर शत्रुओंने अपने अधीन कर लिया है, इसीलिये जिसके पास द्रव्यका भी संग्रह नहीं रह गया है, द्रव्याभावके कारण ही समादर न पानेसे जिसके मित्र साथ छोड़ चुके हैं, मन्त्री भी शत्रुओंद्वारा फोड़ लिये गये हैं, जिसपर शत्रुदलका आक्रमण हो गया हो, जो दुर्बल होकर बलवान शत्रुके द्वारा पीड़ित हो और विपत्तिमें पड़कर जिसका चित्त घबरा उठा हो, उसके लिये कौन-सा कार्य शेष रह जाता है?--उसे इस संकटसे मुक्त होनेके लिये क्या करना चाहिये?
vibhaktapurarāṣṭrasya nirdravyanicayasya ca | asambhāvitamitrasya bhinnāmātyasya sarvaśaḥ ||
Yudhiṣṭhira said: “O best of the Bharatas, when a king’s cities and realm have been broken up and partitioned, when his treasury and accumulated wealth are exhausted, when he is no longer respected and thus cannot count on friends, and when his ministers have been entirely split and won over—what course of action still remains for such a ruler, assailed by enemies and shaken by calamity? What should he do to be freed from this crisis?”
युधिछिर उवाच