सौप्तिकपर्व — धृष्टद्युम्नसारथिवृत्तान्तः
Report of the Night Raid and Yudhiṣṭhira’s Lament
संग्रामचन्द्रोदयवेगवेलं द्रोणार्णवं ज्यातलनेमिघोषम् । ये तेरुरुच्चावचशस्त्रनौभि- स्ते राजपुत्रा निहता: प्रमादात्,“ट्रोणाचार्य महासागरके समान थे, रथ ही पानीका कुण्ड था, बाणोंकी वर्षा ही लहरोंके समान ऊपर उठती थी, रत्नमय आभूषण ही उस द्रोणरूपी समुद्रके रत्न थे, रथके घोड़े ही समुद्री घोड़ोंके समान जान पड़ते थे, शक्ति और ऋष्टि मत्स्यके समान तथा ध्वज नाग एवं मगरके तुल्य थे, धनुष ही भँवर तथा बड़े-बड़े बाण ही फेन थे, संग्राम ही चन्द्रोदय बनकर उस समुद्रके वेगको चरम सीमातक पहुँचा देता था, प्रत्यंचा और पहियोंकी ध्वनि ही उस महासागरकी गर्जना थी; ऐसे टद्रोणरूपी सागरको जो छोटे-बड़े नाना प्रकारके शस्त्रोंकी नौका बनाकर पार गये, वे ही राजकुमार असावधानीसे मार डाले गये
saṅgrāmacandrodayavegavelaṃ droṇārṇavaṃ jyātalanemighoṣam | ye terur uccāvacāśastranāubhis te rājaputrā nihatāḥ pramādāt ||
Sūta said: The battle, like a moonrise, swelled the surging tide of that ocean-like Droṇa—whose roar was the sound of bowstrings and chariot-wheels. Those royal princes who had once crossed that ‘Droṇa-sea’ by making boats of diverse weapons, high and low, were later slain through heedlessness.
सूत उवाच