इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापववके अन्तर्गत अनुद्यूतपर्वमें पाण्डवोंकी प्रतिज्ञासे सम्बन् रखनेवाला सतहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ।/ ७७ ॥ अपना छा | अ-क्राछ अष्टसप्ततितमो< ध्याय: युधिष्ठिरका धृतराष्ट्र आदिसे विदा लेना, 63205 कक न्तीको अपने यहाँ रखनेका प्रस्ताव और पाण्डवोंको रहनेका उपदेश देना युधिछिर उवाच आमन्त्रयामि भरतांस्तथा वृद्धं पितामहम् । राजानं सोमदत्तं च महाराजं च बाह्विकम्,युधिष्ठिर बोले--मैं भरतवंशके समस्त गुरुजनोंसे वनमें जानेकी आज्ञा चाहता हूँ। बड़े-बूढ़े पितामह भीष्म, राजा सोमदत्त, महाराज बाह्लिक, गुरुवर द्रोण और कृपाचार्य, अश्वृत्थामा, अन्यान्य नृपतिगण, विदुर, राजा धृतराष्ट्र, उनके सभी पुत्र, युयुत्सु, संजय तथा दूसरे सब सदस्योंसे पूछकर सबकी आज्ञा लेकर वनमें जाता हूँ, फिर लौटकर आप लोगोंका दर्शन करूँगा
Yudhiṣṭhira uvāca: āmantrayāmi bharatāṁs tathā vṛddhaṁ pitāmaham | rājānaṁ Somadattaṁ ca mahārājaṁ ca Bāhlīkam ||
Yudhiṣṭhira said: “I seek leave of the elders of the Bharata line, and of the aged grandsire as well—of King Somadatta and of the great king Bāhlīka.” After the calamity of the dice, he casts his departure not as flight but as a dharmic act: formally asking permission of revered authorities, honoring hierarchy, and upholding social order even amid humiliation and exile.
युधिछिर उवाच