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Shloka 39

Adhyāya 45 — Duryodhana’s Distress, Śakuni’s Counsel, and the Summons for Dyūta

(ददृशुस्तं नृपतयो यज्ञस्य विधिमुत्तमम्‌ । उपेन्द्रबुद्धया विहितं सहदेवेन भारत ।। भरतनन्दन! राजाओंने सहदेवके द्वारा विष्णु-बुद्धिसे भगवान्‌ श्रीकृष्णकी प्रसन्नताके लिये किये जानेवाले उस यज्ञका उत्तम विधि-विधान देखा। ददृशुस्तोरणान्यत्र हेमतालमयानि च । दीप्तभास्करतुल्यानि प्रदीप्तानीव तेजसा । स यज्ञस्तोरणैस्तैश्ष ग्रहैद्यौरिव सम्बभौ ।। उस यज्ञमण्डपमें सुवर्णमय तालके बने हुए फाटक दिखायी देते थे, जो अपनी प्रभासे तेजस्वी सूर्यके समान देदीप्यमान हो रहे थे। उन तेजस्वी द्वारोंसे वह विशाल यज्ञमण्डप ग्रहोंसे आकाशकी भाँति प्रकाशित हो रहा था। शय्यासनविहारां श्व सुबहून्‌ वित्तसम्भूतान्‌ । घटान्‌ पात्री: कटाहानि कलशानि समन्ततः: । न ते किज्चिदसौवर्णमपश्यंस्तत्र पार्थिवा: ।। वहाँ शय्या, आसन और क्रीडाभवनोंकी संख्या बहुत थी। उनके निर्माणमें प्रचुर धन लगा था। चारों ओर घड़े, भाँति भाँतिके पात्र, कड़ाहे और कलश आदि सुवर्णनिर्मित सामान दृष्टिगोचर हो रहे थे। वहाँ राजाओंने कोई ऐसी वस्तु नहीं देखी, जो सोनेकी बनी हुई नहो। ओदनानां विकाराणि स्वादूनि विविधानि च । सुबहूनि च भक्ष्याणि पेयानि मधुराणि च । ददुर्द्धिजानां सततं राजप्रेष्या महाध्वरे ।। उस महान्‌ यज्ञमें राजसेवकगण ब्राह्मणोंके आगे सदा नाना प्रकारके स्वादिष्ट भात तथा चावलकी बनी हुई बहुत-सी दूसरी भोज्य वस्तुएँ परोसते रहते थे। वे उनके लिये मधुर पेय पदार्थ भी अर्पण करते थे। पूर्णे शतसहस्रे तु विप्राणां भुड्जतां तदा । स्थापिता तत्र संज्ञाभूच्छड्खो 5 ध्मायत नित्यश: ।। भोजन करनेवाले ब्राह्मणोंकी संख्या जब एक लाख पूरी हो जाती थी, तब वहाँ प्रतिदिन शंख बजाया जाता था। मुहुर्मुहु: प्रणादस्तु तस्य शड्खस्य भारत । उत्तमं शड्खशब्दं तं श्रुव्वा विस्मपमागता: ।। जनमेजय! दिनमें कई बार इस तरहकी शंख-ध्वनि होती थी। वह उत्तम शंखनाद सुनकर लोगोंको बड़ा विस्मय होता था। एवं प्रवृत्ते यज्ञे तु तुष्टपुष्टजनायुते । अन्नस्य बहवो राजन्नुत्सेधा: पर्वतोपमा: । दधिकुल्याश्न ददृशु: सर्पिषां च हृदाउ्जना: ।। इस प्रकार सहसों हृष्ट-पुष्ट मनुष्योंसे भरे हुए उस यज्ञका कार्य चलने लगा। राजन! उसमें अन्नके बहुत-से ऊँचे ढेर लगाये गये थे, जो पर्वतोंके समान जान पड़ते थे। लोगोंने देखा, वहाँ दहीकी नहरें बह रही थीं तथा घीके कितने ही कुण्ड भरे हुए थे। जम्बूद्वीपो हि सकलो नानाजनपदायुत: । राजन्नदृश्यतैकस्थो राज्ञस्तस्मिन्‌ महाक्रतौ ।। राजन! महाराज युधिष्ठिरके उस महान्‌ यज्ञमें नाना जनपदोंसे युक्त सारा जम्बूद्वीप ही एकत्र हुआ-सा दिखायी देता था। राजानः स्रग्विणस्तत्र सुमृष्टमणिकुण्डला: । विविधान्यन्नपानानि लेह्यानि विविधानि च । तेषां नृपोपभोग्यानि ब्राह्माणे भ्यो ददुः सम ते ।। वहाँ विशुद्ध मणिमय कुण्डल तथा हार धारण किये नरेश ब्राह्मणोंको राजाओंके उपभोगमें आनेयोग्य नाना प्रकारके अन्न-पान और भाँति-भाँतिकी चटनी परोसते थे। एतानि सततं भुक्‍्त्वा तस्मिन्‌ यज्ञे द्विजातय: । परां प्रीतिं ययु: सर्वे मोदमानास्तदा भृशम्‌ ।। उस यज्ञमें निरन्तर उपर्युक्त पदार्थ भोजन करके सब ब्राह्मण आनन्दमग्न हो बड़ी तृप्ति और प्रसन्नताका अनुभव करते थे। एवं समुदितं सर्व बहुगोधनधान्यवत्‌ | यज्ञवार्ट नृपा दृष्टवा विस्मयं परमं ययु: ।। इस प्रकार बहुत-सी गायों तथा धन-धान्यसे सम्पन्न उस समृद्धिशाली यज्ञमण्डपको देखकर सब राजाओंको बड़ा आश्चर्य होता था। ऋत्विजश्न यथाशास्त्रं राजसूयं महाक्रतुम्‌ । पाण्डवस्य यथाकालं जुहुवु: सर्ववाजका: ।। ऋत्विजूलोग शास्त्रीय विधिके अनुसार राजा युधिष्ठिरके उस राजसूय नामक महायज्ञका अनुष्ठान करते थे और समस्त याजक ठीक समयपर अग्निमें आहुतियाँ देते थे। व्यासधौम्यादय: सर्वे विधिवत्‌ षोडशर्त्विज: । स्वस्वकर्माणि चक्कुस्ते पाण्डवस्य महाक्रतौ ।। व्यास और धौम्य आदि जो सोलह ऋत्विज्‌ थे, वे युधिष्ठिरके उस महायज्ञमें विधिपूर्वक अपने-अपने निश्चित कार्योंका सम्पादन करते थे। नाषडड्डविदत्रासीत्‌ सदस्यो नाबहुश्रुतः । नाव्रतो नानुपाध्यायो नपापो नाक्षमो द्विज: ।। उस यज्ञमण्डपमें कोई भी सदस्य ऐसा नहीं था, जो वेदके छहों अंगोंका ज्ञाता, बहुश्रुत, व्रतशील, अध्यापक, पापरहित, क्षमाशील एवं सामर्थ्यशील न हो। न तत्र कृपण: कश्िद्‌ दरिद्रो न बभूव ह । क्षुधितो दुःखितो वापि प्राकृतो वापि मानुष: ।। उस यज्ञमें कोई भी मनुष्य दीन, दरिद्र, दुःखी, भूखा-प्यासा अथवा मूढ़ नहीं था। भोजन भोजनार्थिभ्यो दापयामास सर्वदा | सहदेवो महातेजा: सततं राजशासनात्‌ ।। महातेजस्वी सहदेव महाराज युधिष्ठिरकी आज्ञासे भोजनार्थियोंको सदा भोजन दिलाया करते थे। सस्तरे कुशलाश्चापि सर्वकर्माणि याजका: । दिवसे दिवसे चक्रुर्यथाशास्त्रार्थचक्षुष: ।। शास्त्रोक्त अर्थपर दृष्टि रखनेवाले यज्ञकुशल याजक प्रतिदिन सब कार्योंको विधिवत्‌ सम्पन्न करते थे। ब्राह्मणा वेदशास्त्रज्ञा: कथाश्षक्रुश्न सर्वदा । रेमिरे च कथान्ते तु सर्वे तस्मिन्‌ महाक्रतौ ।। वेद-शास्त्रोंके ज्ञाता ब्राह्मण वहाँ सदा कथा-प्रवचन किया करते थे। उस महायज्ञमें सब लोग कथाके अन्तमें बड़े सुखका अनुभव करते थे। देवैरन्यैश्न यक्षेश्ष उरगैर्दिव्यमानुषै: । विद्याधरगणै: कीर्ण: पाण्डवस्य महात्मन: ।। स राजसूय: शुशुभे धर्मराजस्य धीमत: । देवता, असुर, यक्ष, नाग, दिव्य मानव तथा विद्याधरगणोंसे भरा हुआ बुद्धिमान्‌ पाण्डुनन्दन महात्मा धर्मराजका वह राजसूययज्ञ बड़ी शोभा पाता था। गन्धर्वगणसंकीर्ण: शोभितो<प्सरसां गणै: ।। देवैर्मुनिगणैर्यक्षै्देवलोक इवापर: । स किम्पुरुषगीतैश्न किन्नरैरुपशोभित: ।। वह यज्ञमण्डप गन्धर्वों, अप्सरा-समूहों, देवताओं, मुनिगणों तथा यक्षोंसे सुशोभित हो दूसरे देवलोकके समान जान पड़ता था। किम्पुरुषोंके गीत तथा किन्नरगण उस स्थानकी शोभा बढ़ा रहे थे। नारदश्न जगौ तत्र तुम्बुरुश्न महाद्युति: । विश्वावसुश्रित्रसेनस्तथान्ये गीतकोविदा: । रमयन्ति सम तान्‌ सर्वान्‌ यज्ञकर्मान्तरेष्वथ ।। नारद, महातेजस्वी तुम्बुरु, विश्वावसु, चित्रसेन तथा दूसरे गीतकुशल गन्धर्व वहाँ गीत गाकर यज्ञकार्योंके बीच-बीचमें अवकाश मिलनेपर सब लोगोंका मनोरंजन करते थे। इतिहासपुराणानि आख्यानानि च सर्वश: । ऊचुर्व शब्दशास्त्रज्ञा नित्यं कर्मान्तरेष्वथ ।। यज्ञसम्बन्धी कर्मोंके बीचमें अवसर मिलनेपर व्याकरणशास्त्रके ज्ञाता विद्वान्‌ पुरुष इतिहास, पुराण तथा सब प्रकारके उपाख्यान सुनाया करते थे। भेयश्व मुरजाश्वैव मड्डुका गोमुखाश्न ये । शृज्भवंशाम्बुजाश्वैव श्रूयन्ते सम सहस्रश: ।। वहाँ सहस्रों भेरी, मृदंग, मड्डुक, गोमुख, शृंग, वंशी और शंखोंके शब्द सुनायी पड़ते थे। लोके<स्मिन्‌ सर्वविप्राश्च वैश्या: शूद्राश्न॒ सर्वश: । सर्वे म्लेच्छा: सर्ववर्णा: सादिमध्यान्तजास्तथा ।। नानादेशसमुद्धूतीननाजातिभिरागतै: । पर्याप्त इव लोको<यं युधिष्ठिरनिवेशने ।। इस जगत्‌में रहनेवाले समस्त ब्राह्मण, (क्षत्रिय,) वैश्य, शूद्र, सब प्रकारके म्लेच्छ तथा अग्रज, मध्यज और अन्त्यज आदि सभी वर्णोंके लोग उस यज्ञमें उपस्थित हुए थे। अनेक देशोंमें उत्पन्न विभिन्न जातिके लोगोंके शुभागमनसे युधिष्ठिरके उस राजभवनमें ऐसा जान पड़ता था कि यह समस्त लोक वहाँ उपस्थित हो गया है। भीष्मद्रोणादय: सर्वे कुरव: ससुयोधना: । वृष्णयश्व समग्राश्न पज्चालाश्चापि सर्वशः । यथाहँं सर्वकर्माणि चक्रुर्दासा इव क्रतौ ।। उस राजसूययज्ञमें भीष्म, ट्रोण और दुर्योधन आदि समस्त कौरव, सारे वृष्णिवंशी तथा सम्पूर्ण पांचाल भी सेवकोंकी भाँति यथायोग्य सभी कार्य अपने हाथों करते थे। एवं प्रवृत्तो यज्ञ: स धर्मराजस्य धीमत: । शुशुभे च महाबाहो सोमस्येव क्रतुर्यथा ।। महाबाहु जनमेजय! इस प्रकार बुद्धिमान्‌ युधिष्ठिरका वह यज्ञ चन्द्रमाके राजसूययज्ञकी भाँति शोभा पाता था। वस्त्राणि कम्बलांश्रैव प्रावारांश्नैव सर्वदा | निष्कहेमजभाण्डानि भूषणानि च सर्वश: । प्रददौ तत्र सततं धर्मराजो युधिष्िर: ।। धर्मराज युधिष्ठिर उस यज्ञमें हर समय वस्त्र, कम्बल, चादर, स्वर्णपदक, सोनेके बर्तन और सब प्रकारके आभूषणोंका दान करते रहते थे। यानि तत्र महीपेभ्यो लब्धं वा धनमुत्तमम्‌ । तानि रत्नानि सर्वाणि विप्राणां प्रददौ तदा ।। वहाँ राजाओंसे जो-जो रत्न अथवा उत्तम धन भेंटके रूपमें प्राप्त हुए, उन सबको युधिष्ठिरने ब्राह्मणोंकी सेवामें समर्पित कर दिया। कोटीसहसरं प्रददौ ब्राह्मणानां महात्मनाम्‌ | उन्होंने महात्मा ब्राह्मणोंको दक्षिणाके रूपमें सहस्नर कोटि स्वर्णमुद्राएँ प्रदान कीं। न करिष्यति त॑ लोके कक्षिदन्यो महीपति: ।। याजका: सर्वकामैश्न सततं ततृपुर्धने: । उन्होंने संसारमें वह कार्य किया जिसे दूसरा कोई राजा नहीं कर सकेगा। यज्ञ करानेवाले ब्राह्मण सम्पूर्ण मनोवांछित वस्तुएँ और प्रचुर धन पाकर सदाके लिये तृप्त हो गये। व्यासं धौम्यं च प्रयतो नारदं च महामतिम्‌ ।। सुमन्तुं जैमिनिं पैलं वैशम्पायनमेव च । याज्ञवल्क्यं कठं चैव कलापं च महौजसम्‌ । सर्वाश्च विप्रप्रवरान्‌ पूजयामास सत्कृतान्‌ ।। फिर राजा युधिष्ठिरने व्यास, धौम्य, महामति नारद, सुमन्तु, जैमिनि, पैल, वैशम्पायन, याज्ञवल्क्य, कठ तथा महातेजस्वी कलाप--इन सब श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका पूर्ण मनोयोगके साथ सत्कार एवं पूजन किया। युधिछिर उवाच युष्मत्प्रभावात्‌ प्राप्तोड्यं राजसूयो महाक्रतुः । जनार्दनप्रभावाच्च सम्पूर्णो मे मनोरथ: ।। युधिष्ठिर उनसे बोले--महर्षियो! आपलोगोंके प्रभावसे यह राजसूय महायज्ञ सांगोपांग सम्पन्न हुआ। भगवान्‌ श्रीकृष्णके प्रतापसे मेरा सारा मनोरथ पूर्ण हो गया। वैशम्पायन उवाच अथ यज्ञ समाप्यान्ते पूजयामास माधवम्‌ | बलदेवं च देवेशं भीष्माद्यांश्व॒ कुरूत्तमान्‌ ।।) वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! इस प्रकार यज्ञसमाप्तिके समय राजा युधिष्छिरने अन्तमें लक्ष्मीपति भगवान्‌ श्रीकृष्ण, देवेश्वर बलदेव तथा कुरुश्रेष्ठ भीष्म आदिका पूजन किया। समापयामास च त॑ राजसूयं महाक्रतुम्‌ | तं तु यज्ञ महाबाहुरासमाप्तेर्जनार्दन: । ररक्ष भगवाउ्छौरि: शारज्नचक्रगदाधर:,तदनन्तर उस राजसूय महायज्ञको विधिपूर्वक समाप्त किया। शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले महाबाहु भगवान्‌ श्रीकृष्णने आरम्भसे लेकर अन्ततक उस यज्ञकी रक्षा की

dadṛśus taṁ nṛpatayo yajñasya vidhim uttamam | upendrabuddhyā vihitaṁ sahadevena bhārata ||

Vaiśampāyana said: O Bhārata, the assembled kings beheld the excellent and proper procedure of the sacrifice—arranged by Sahadeva with the reverent understanding that Kṛṣṇa was Upendra (Viṣṇu himself), and performed for the satisfaction of the Lord. The scene underscores that royal power and public ritual attain legitimacy when guided by dharmic order, competent stewardship, and devotion directed toward the divine rather than toward mere display.

ददृशुःthey saw
ददृशुः:
TypeVerb
Rootदृश्
FormPerfect (Liṭ), 3, Plural, Parasmaipada
तम्that (him/it)
तम्:
Karma
TypePronoun
Rootतद्
FormMasculine/Neuter, Accusative, Singular
नृपतयःkings
नृपतयः:
Karta
TypeNoun
Rootनृपति
FormMasculine, Nominative, Plural
यज्ञस्यof the sacrifice
यज्ञस्य:
TypeNoun
Rootयज्ञ
FormMasculine, Genitive, Singular
विधिम्procedure/rite
विधिम्:
Karma
TypeNoun
Rootविधि
FormMasculine, Accusative, Singular
उत्तमम्excellent
उत्तमम्:
TypeAdjective
Rootउत्तम
FormMasculine, Accusative, Singular
उपेन्द्र-बुद्ध्याwith the thought (that he was) Upendra/Vishnu
उपेन्द्र-बुद्ध्या:
Karana
TypeNoun
Rootउपेन्द्रबुद्धि
FormFeminine, Instrumental, Singular
विहितम्arranged/ordained
विहितम्:
TypeVerb
Rootवि-धा
Formkta, Masculine, Accusative, Singular
सहदेवेनby Sahadeva
सहदेवेन:
Karana
TypeNoun
Rootसहदेव
FormMasculine, Instrumental, Singular
भारतO Bharata
भारत:
TypeNoun
Rootभारत
FormMasculine, Vocative, Singular

वैशम्पायन उवाच

V
Vaiśampāyana
S
Sahadeva
K
Kṛṣṇa
U
Upendra (Viṣṇu)
N
nṛpati (kings)
Y
yajña (sacrifice/ritual)