Sabhā-praveśa, Dāna, and the Courtly Convergence (सभा-प्रवेशः दानं च)
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके १६ श्लोक मिलाकर कुल ३८३ “लोक हैं) भीकम (2 अमान चतुथों5 ध्याय: मयद्वारा निर्मित सभाभवनमें धर्मराज युधिष्ठटिरका प्रवेश तथा सभामें स्थित महर्षियों और राजाओं आदिका वर्णन (वैशग्पायन उवाच तां तु कृत्वा सभां श्रेष्ठां मयश्लार्जुनमब्रवीत् । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! उस श्रेष्ठ सभाभवनका निर्माण करके मयासुरने अर्जुनसे कहा। मय उवाच एषा सभा सव्यसाचिन् ध्वजो ह्वात्र भविष्यति ।। मयासुर बोला--सव्यसाचिन्! यह है आपकी सभा, इसमें एक ध्वजा होगी। भूतानां च महावीर्यों ध्वजाग्रे किड़करो गण: । तव विस्फारघोषेण मेघवन्निनदिष्यति ।। उसके अग्रभागमें भूतोंका महापराक्रमी किंकर नामक गण निवास करेगा। जिस समय तुम्हारे धनुषकी टंकारध्वनि होगी, उस समय उस ध्वनिके साथ ये भूत भी मेघोंके समान गर्जना करेंगे। अयं हि सूर्यसंकाशो ज्वलनस्य रथोत्तम: | इमे च दिविजा: श्वेता वीर्यवन्तो हयोत्तमा: ।। मायामय: कृतो होष ध्वजो वानरलक्षण: । असज्जमानो वृक्षेषु धूमकेतुरिवोच्छित: ।। यह जो सूर्यके समान तेजस्वी अग्निदेवका उत्तम रथ है और ये जो श्वेत वर्णवाले दिव्य एवं बलवान अश्वरत्न हैं तथा यह जो वानरचिह्नसे उपलक्षित ध्वज है, इन सबका निर्माण मायासे ही हुआ है। यह ध्वज वृक्षोंमें कहीं अटकता नहीं है तथा अग्निकी लपटोंके समान सदा ऊपरकी ओर ही उठा रहता है। बहुवर्ण हि लक्ष्येत ध्वजं वानरलक्षणम् । ध्वजोत्कटं हाुनवमं युद्धे द्रक्ष्यसि विष्ठितम् ।। आपका यह वानरचिह्वित ध्वज अनेक रंगका दिखायी देता है। आप युद्धमें इस उत्कट एवं स्थिर ध्वजको कभी झुकता नहीं देखेंगे। इत्युक्त्वा5डलिड्ग्य बीभत्सुं विसृष्ट: प्रययौ मय: ।) ऐसा कहकर मयासुरने अर्जुनको हृदयसे लगा लिया और उनसे विदा लेकर (अभीष्ट स्थानको) चला गया। वैशम्पायन उवाच ततः प्रवेशनं तस्यां चक्रे राजा युधिष्ठिर: । अयुतं भोजयित्वा तु ब्राह्मणानां नराधिप:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने घी और मधु मिलायी हुई खीर, खिचड़ी, जीवन्तिकाके साग, सब प्रकारके हविष्य, भाँति-भाँतिके भक्ष्य तथा फल, ईख आदि नाना प्रकारके चोष्य और बहुत अधिक पेय (शर्बत) आदि सामग्रियों-द्वारा दस हजार ब्राह्मणोंको भोजन कराकर उस सभा-भवनमें प्रवेश किया
vaiśampāyana uvāca | tataḥ praveśanaṃ tasyāṃ cakre rājā yudhiṣṭhiraḥ | ayutaṃ bhojayitvā tu brāhmaṇānāṃ narādhipaḥ ||
Vaiśampāyana said: Thereafter King Yudhiṣṭhira entered that assembly-hall. But first, the lord of men fed ten thousand brāhmaṇas with many provisions—rice pudding (pāyasa) mixed with ghee and honey, kṛsara (a khichṛī-like dish), greens of jīvantī, every kind of ritual food (haviṣya), diverse foods and fruits, sugarcane and other chewables, and abundant drinks—then he entered the newly built hall.
वैशम्पायन उवाच
Royal authority is ethically grounded: before enjoying grandeur (entering the splendid sabhā), Yudhiṣṭhira performs dāna and atithi-satkara—feeding brāhmaṇas—signaling that prosperity and power should be preceded by service, generosity, and respect for sacred learning.
After the completion of the assembly-hall, Yudhiṣṭhira prepares to enter it. The verse highlights that he first feeds ten thousand brāhmaṇas, and only then proceeds into the sabhā, marking the event as both political and ritual-moral.