इस प्रकार श्रीमहाभारत कर्णपर्वमें वृषसेनका वधविषयक पचासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ८५ ॥ नशा (0) आज अन+- षडशीतितमो<्ध्याय: कर्णके साथ युद्ध करनेके विषयमें श्रीकृष्ण और पा की बातचीत तथा अर्जुनका कर्णके सामने उपस्थित संजय उवाच तमायान्तमभिप्रेक्ष्य वेलोद्वृत्तमिवार्णवम् । गर्जन्तं सुमहाकायं दुर्निवारं सुरैरपि,संजय कहते हैं--राजन्! सीमाको लाँधकर आगे बढ़ते हुए महासागरके सदृश विशालकाय कर्ण गर्जना करता हुआ आगे बढ़ा। वह देवताओंके लिये भी दुर्जय था। उसे आते देख दशार्हकुलनन्दन पुरुषश्रेष्ठ भगवान् श्रीकृष्णने हँसकर अर्जुनसे कहा--'पार्थ! जिसके सारथि शल्य हैं और रथमें श्वेत घोड़े जुते हैं, वही यह कर्ण रथसहित इधर आ रहा है महामना पाण्डुकुमार अर्जुनके ऐसा कहनेपर भगवान् श्रीकृष्णने विजयसूचक आशीर्वादके द्वारा उनका आदर करके उस समय मनके समान वेगशाली घोड़ोंको तीव्रवेगसे आगे बढ़ाया। पाण्डुपुत्र अर्जुनका वह मनोजव रथ एक ही क्षणमें कर्णके रथके सामने जाकर खड़ा हो गया ।। इति श्रीमहाभारते कर्णपर्वणि कर्णार्जुनद्वैरथे वासुदेववाक्ये षडशीतितमो<ध्याय: ।। ८६ ।। इस प्रकार श्रीमह्याभारत कर्णपर्वमें कर्ण और अजुनिके द्वैरथयुद्धके प्रसंगें भगवान् श्रीकृष्णका वाक्यविषयक छियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ८६ ॥/ ऑप--+ह-< बक। ] अि्शशाएड<ह सप्ताशीतितमोब ध्याय: कर्ण और अर्जुनका द्वैरथयुद्धमें समागम, उनकी जय- पराजयके सम्बन्धमें सब प्राणियोंका संशय, ब्रह्मा और महादेवजीद्वारा अर्जुनकी विजय-घोषणा तथा कर्णकी शल्यसे और अर्जुनकी श्रीकृष्णसे वार्ता संजय उवाच वृषसेनं हतं दृष्टवा शोकामर्षसमन्वित: । पुत्रशोकोद्धवं वारि नेत्राभ्यां समवासृजत्
sañjaya uvāca |
tam āyāntam abhiprekṣya velodvṛttam ivārṇavam |
garjantaṁ sumahākāyaṁ durnivāraṁ surair api ||
Sañjaya said: “O King, seeing him advancing—like the ocean swelling beyond its shoreline—Karna, of immense stature, came forward roaring. He was a force that even the gods would find hard to restrain.”
संजय उवाच
The verse underscores the ethical gravity of war: sheer might and fearsome presence do not by themselves establish righteousness. By portraying Karna as ‘irresistible even to the gods,’ the text intensifies the question central to dharma-yuddha—how power, duty, and destiny interact when great warriors clash.
Sañjaya reports to Dhṛtarāṣṭra that Karna is advancing toward the decisive encounter, roaring and appearing like the ocean overflowing its bounds. This is a dramatic prelude that signals the imminent confrontation and raises suspense about the outcome.