इमं पापमतिं क्षुद्रमत्यन्तं पाण्डवान् प्रति । कर्णमद्य नरश्रेष्ठ जह्या: सुनिशितै: शरै:,“कमलनयन नरश्रेष्ठ अर्जुन! मनुष्योंमें श्रेष्ठ गुरु द्रोणाचार्यका सम्मान करते हुए तुम्हारे हृदयमें यदि अश्वत्थामाके प्रति दया है अथवा आचार्योचित गौरवके कारण कृपाचार्यके प्रति कृपाभाव है, यदि माता कुन्तीके अत्यन्त पूजनीय बन्धु-बान्धवोंके प्रति आदरका भाव रखते हुए तुम कृतवर्मापर आक्रमण करके उसे यमलोक भेजना नहीं चाहते तथा माता माद्रीके भाई, मद्रदेशीय जनताके अधिपति, राजा शल्यको भी तुम दयावश मारनेकी इच्छा नहीं रखते तो न सही, किंतु पाण्डवोंके प्रति सदा पापबुद्धि रखनेवाले इस अत्यन्त नीच कर्णको तो आज अपने पैने बाणोंसे मार ही डालो
sañjaya uvāca | imaṃ pāpamatim kṣudram atyantaṃ pāṇḍavān prati | karṇam adya naraśreṣṭha jahyāḥ suniśitaiḥ śaraiḥ ||
Sañjaya said: “O best of men, today cut down Karṇa with your razor-sharp arrows—this petty-minded man of sinful intent, utterly hostile toward the Pāṇḍavas.”
संजय उवाच