कालवच्चरते वीर: पड्चालानां रथव्रजे । तमप्यासाद्य समरे मित्रार्थे मित्रवत्सल,“मित्रवत्सल! जो वीर द्रोणाचार्य प्रतेदिन अकेले ही सम्पूर्ण पांचालोॉंका विनाश करते हुए पांचालोंकी रथसेनामें कालके समान विचरते थे, अस्त्रोंकी आगसे प्रज्वलित होते थे, सम्पूर्ण धनुर्धरोंके गुरु थे और समरांगणमें शत्रुसेनाको दग्ध किये देते थे, अपने बल और पराक्रमसे दुर्धर्ष उन द्रोणाचार्यको भी संग्राममें सामने पाकर वे पांचाल अपने मित्र पाण्डवोंके लिये सदा डटकर युद्ध करते रहे। शत्रुदमन अर्जुन! पांचाल सैनिक युद्धमें सदा शत्रुओंको जीतनेके लिये उद्यत रहते हैं। वे सूतपुत्र कर्णसे भयभीत हो कभी युद्धसे मुँह नहीं मोड़ सकते
sañjaya uvāca |
kālavac carate vīraḥ pāñcālānāṃ rathavraje |
tam apy āsādya samare mitrārthe mitravatsalaḥ ||
Sañjaya said: Like Death itself that hero moved through the chariot-host of the Pāñcālas. Even when they met him face to face in battle, the friend-loving warrior stood firm for the sake of his allies—holding fast to friendship amid the slaughter.
संजय उवाच