ऑपनआक्रा बछ। ज्स:ः:, - मुट्ठी बँधे हुए हाथके मापको रत्नि कहते हैं। त्रिसप्ततितमो< ध्याय: भीष्म और द्रोणके पराक्रमका वर्णन करते हुए अर्जुनके बलकी प्रशंसा करके श्रीकृष्णका कर्ण और दुर्योधनके अन्यायकी याद दिलाकर अर्जुनको कर्णवधके लिये उत्तेजित करना संजय उवाच ततः पुनरमेयात्मा केशवोड्ंर्जुनमब्रवीत् । कृतसंकल्पमायान्तं वधे कर्णस्य भारत
sañjaya uvāca | tataḥ punar ameyātmā keśavo 'rjunam abravīt | kṛtasaṅkalpam āyāntaṃ vadhe karṇasya bhārata ||
Sañjaya said: Then again Keshava, whose spirit is immeasurable, spoke to Arjuna, O Bharata, seeing him approach with firm resolve for the slaying of Karna.
संजय उवाच