सुदुष्करं कर्म करोति वीर: कर्तु यथा नाहसि त्वं कदाचित् | रथादवप्लुत्य गदां परामृशं- स्तया निहन्त्यश्वरथद्विपान् रणे,जो यथासमय शत्रुओंको पीड़ा देते हुए युद्धस्थलमें उन समस्त शौर्यसम्पन्न भूपतियों, प्रधान-प्रधान रथियों, श्रेष्ठ गजराजों, प्रमुख अश्वारोहियों, असंख्य वीरों, सहस्रसे भी अधिक हाथियों, दस हजार काम्बोजदेशीय अश्वों तथा पर्वतीय वीरोंका वध करके जैसे मृगोंको मारकर सिंह दहाड़ रहा हो, उसी प्रकार भयंकर सिंहनाद करते हैं, जो वीर भीमसेन हाथमें गदा ले रथसे कूदकर उसके द्वारा रणभूमिमें हाथी, घोड़ों एवं रथोंका संहार करते हैं तथा ऐसा अत्यन्त दुष्कर पराक्रम प्रकट कर रहे हैं जैसा कि तू कभी नहीं कर सकता, जिनका पराक्रम इन्द्रके समान है, जो उत्तम खड़्ग, चक्र और धनुषके द्वारा हाथी, घोड़ों, पैदल- योद्धाओं तथा अन्यान्य शत्रुओंको दग्ध किये देते हैं और जो पैरोंसे कुचलकर दोनों हाथोंसे वैरियोंका विनाश करते हैं, वे महाबली, कुबेर और यमराजके समान पराक्रमी एवं शत्रुओंकी सेनाका बलपूर्वक संहार करनेमें समर्थ भीमसेन ही मेरी निन्दा करनेके अधिकारी हैं। तू मेरी निन्दा नहीं कर सकता; क्योंकि तू अपने पराक्रमसे नहीं, हितैषी सुहृदोंद्वारा सदा सुरक्षित होता है
arjuna uvāca | suduṣkaraṁ karma karoti vīraḥ kartuṁ yathā nāhasi tvaṁ kadācit | rathād avaplutya gadāṁ parāmṛśaṁ stayā nihanty aśva-ratha-dvipān raṇe |
Arjuna said: “That hero performs a deed exceedingly hard to accomplish—such as you are never capable of doing. Leaping down from his chariot, seizing his mace, he strikes down horses, chariots, and elephants in the battle. Only Bhīmasena—whose might is like Indra’s, who crushes foes and breaks the enemy host by sheer force—has the standing to censure me. You cannot censure me, for you are preserved not by your own valor but always by well-wishing friends.”
अजुन उवाच