अवधेन वध: प्रोक्तो यद् गुरुस्त्वमिति प्रभु: । तद् ब्रूहि त्वं यन्मयोक्तं धर्मराजस्य धर्मवित्,उस श्रुतिका भाव यह है--“गुरुको तू कह देना उसे बिना मारे ही मार डालना है।” तुम धर्मज्ञ हो तो भी जैसा मैंने बताया है, उसके अनुसार धर्मराजके लिये “तू” शब्दका प्रयोग करो
Vāyu said: “The purport of that śruti is this: ‘To address one’s teacher as “tvam” is to slay him without slaying.’ Therefore, though you know dharma, do as I have said—use the word ‘tvam’ toward Dharmarāja.”
वायुदेव उवाच