Droṇānīka-praveśa: Arjuna’s respectful appeal to Droṇa and renewed advance toward Jayadratha (द्रोणानीकप्रवेशः)
अन्न मे ददत: श्रद्धा धर्मे मे रमतां मन: । अविष्नं चास्तु मे नित्यं धर्मकार्येषु पावक,इससे प्रसन्न होकर अग्निदेवने उन्हें वर देनेकी इच्छा प्रकट की। (अग्निदेवकी आज्ञासे) गयने उनसे यह वरदान माँगा--“मैं तप, ब्रह्मचर्य, व्रत, नियम और गुरुजनोंकी कृपासे वेदोंका ज्ञान प्राप्त करना चाहता हूँ। दूसरोंको कष्ट पहुँचाये बिना अपने धर्मके अनुसार चलकर अक्षय धन पाना चाहता हूँ। ब्राह्मणोंको दान देता रहूँ और इस कार्यमें प्रतिदिन मेरी अधिकाधिक श्रद्धा बढ़ती रहे। अपने ही वर्णकी पतिव्रता कन्याओंसे मेरा विवाह हो और उन्हींके गर्भसे मेरे पुत्र उत्पन्न हों। अन्नदानमें मेरी श्रद्धा बढ़े तथा धर्ममें ही मेरा मन लगा रहे। अग्निदेव! मेरे धर्मसम्बन्धी कार्योमें कभी कोई विघ्न न आवे”
anna me dadataḥ śraddhā dharme me ramatāṁ manaḥ | aviṣṇaṁ cāstu me nityaṁ dharmakāryeṣu pāvaka ||
“May my faith increase as I give food in charity; may my mind delight in dharma. And, O Pāvaka (Agni), may there always be no obstacle for me in works of righteousness.”
नारद उवाच