Subhadrā-vilāpaḥ — Subhadrā’s Lament for Abhimanyu
Droṇa-parva 55
आविक्षितं मरुत्तं च मृतं सृज्जय शुश्रुम,श्रद्धधानो जिताँललोकान् गत: पुण्यदुहो$क्षयान् । सूंजय! अविक्षितके पुत्र राजा मरुत्त भी मर गये, ऐसा हमने सुना है। बृहस्पतिजीके साथ स्पर्धा रखनेके कारण उनके भाई संवर्तने जिन राजर्षि मरुत्तका यज्ञ कराया था, भाँति-भाँतिके यज्ञोंद्वारा भगवानका यजन करनेकी इच्छा होनेपर जिन्हें साक्षात् भगवान् शंकरने प्रचुर धनराशिके रूपमें हिमालयका एक सुवर्णमय शिखर प्रदान किया तथा प्रतिदिन यज्ञकार्यके अन्तमें जिनकी सभामें इन्द्र आदि देवता और बृहस्पति आदि समस्त प्रजापतिगण सभासदके रूपमें बैठा करते थे, जिनके यज्ञमण्डपकी सारी सामग्रियाँ सोनेकी बनी हुई थीं, जिनके यहाँ उन दिनों सब प्रकारका अन्न, मनकी इच्छाके अनुरूप और पवित्र रूपमें उपलब्ध होता था और सभी भोजनार्थी ब्राह्मण एवं द्विज जहाँ अपनी इच्छाके अनुसार दूध, दही, घी, मधु एवं सुन्दर भक्ष्य-भोज्य पदार्थ भोजन करते थे, जिनके सम्पूर्ण यज्ञोंमें प्रसन्नतासे भरे हुए वेदोंके पारंगत दिद्वान् ब्राह्यगोंको अपनी रुचिके अनुसार वस्त्र एवं आभूषण प्राप्त होते थे, जिन अविक्षितकुमार (राजर्षि मरुत्त)-के घरमें मरुद॒गण रसोई परोसनेका काम करते थे और विश्वेदेवणण सभासद् थे, जिन पराक्रमी नरेशके राज्यमें उत्तम वृष्टिके कारण खेतीकी उपज बहुत होती थी, जिन्होंने उत्तम विधिसे समर्पित किये हुए हविष्योंद्वारा देवताओंको तृप्त किया था, जो ब्रह्मचर्यपालन और वेदपाठ आदि सत्कर्मोंद्वारा तथा सब प्रकारके दानोंसे सदा ऋषियों, पितरों एवं सुखजीवी देवताओंको भी संतुष्ट करते थे तथा जिन्होंने इच्छानुसार ब्राह्मणोंको शय्या, आसन, सवारी और दुस्त्यज स्वर्णणशशि आदि वह सारा अपरिमित धन दान कर दिया था, देवराज इन्द्र जिनका सदा शुभ चिन्तन करते थे, वे श्रद्धालु नरेश मरुत्त अपनी प्रजाको नीरोग करके अपने सत्कर्मोंद्वारा जीते हुए पुण्यफलदायक अक्षय लोकोंमें चले गये
āvīkṣitaṁ maruttaṁ ca mṛtaṁ sṛñjaya śuśruma | śraddadhāno jitāṁl lokān gataḥ puṇyaduhokṣayān ||
Nārada said: “O Sṛñjaya, we have heard that both Āvīkṣita and King Marutta have passed away. That faithful king—having conquered (by merit) the worlds attainable through righteousness—has gone to inexhaustible realms that yield the fruits of virtue.”
(नारद उवाच