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Shloka 37

Subhadrā-vilāpaḥ — Subhadrā’s Lament for Abhimanyu

Droṇa-parva 55

आविक्षितं मरुत्तं च मृतं सृज्जय शुश्रुम,श्रद्धधानो जिताँललोकान्‌ गत: पुण्यदुहो$क्षयान्‌ । सूंजय! अविक्षितके पुत्र राजा मरुत्त भी मर गये, ऐसा हमने सुना है। बृहस्पतिजीके साथ स्पर्धा रखनेके कारण उनके भाई संवर्तने जिन राजर्षि मरुत्तका यज्ञ कराया था, भाँति-भाँतिके यज्ञोंद्वारा भगवानका यजन करनेकी इच्छा होनेपर जिन्हें साक्षात्‌ भगवान्‌ शंकरने प्रचुर धनराशिके रूपमें हिमालयका एक सुवर्णमय शिखर प्रदान किया तथा प्रतिदिन यज्ञकार्यके अन्तमें जिनकी सभामें इन्द्र आदि देवता और बृहस्पति आदि समस्त प्रजापतिगण सभासदके रूपमें बैठा करते थे, जिनके यज्ञमण्डपकी सारी सामग्रियाँ सोनेकी बनी हुई थीं, जिनके यहाँ उन दिनों सब प्रकारका अन्न, मनकी इच्छाके अनुरूप और पवित्र रूपमें उपलब्ध होता था और सभी भोजनार्थी ब्राह्मण एवं द्विज जहाँ अपनी इच्छाके अनुसार दूध, दही, घी, मधु एवं सुन्दर भक्ष्य-भोज्य पदार्थ भोजन करते थे, जिनके सम्पूर्ण यज्ञोंमें प्रसन्नतासे भरे हुए वेदोंके पारंगत दिद्वान्‌ ब्राह्यगोंको अपनी रुचिके अनुसार वस्त्र एवं आभूषण प्राप्त होते थे, जिन अविक्षितकुमार (राजर्षि मरुत्त)-के घरमें मरुद॒गण रसोई परोसनेका काम करते थे और विश्वेदेवणण सभासद्‌ थे, जिन पराक्रमी नरेशके राज्यमें उत्तम वृष्टिके कारण खेतीकी उपज बहुत होती थी, जिन्होंने उत्तम विधिसे समर्पित किये हुए हविष्योंद्वारा देवताओंको तृप्त किया था, जो ब्रह्मचर्यपालन और वेदपाठ आदि सत्कर्मोंद्वारा तथा सब प्रकारके दानोंसे सदा ऋषियों, पितरों एवं सुखजीवी देवताओंको भी संतुष्ट करते थे तथा जिन्होंने इच्छानुसार ब्राह्मणोंको शय्या, आसन, सवारी और दुस्त्यज स्वर्णणशशि आदि वह सारा अपरिमित धन दान कर दिया था, देवराज इन्द्र जिनका सदा शुभ चिन्तन करते थे, वे श्रद्धालु नरेश मरुत्त अपनी प्रजाको नीरोग करके अपने सत्कर्मोंद्वारा जीते हुए पुण्यफलदायक अक्षय लोकोंमें चले गये

āvīkṣitaṁ maruttaṁ ca mṛtaṁ sṛñjaya śuśruma | śraddadhāno jitāṁl lokān gataḥ puṇyaduhokṣayān ||

Nārada said: “O Sṛñjaya, we have heard that both Āvīkṣita and King Marutta have passed away. That faithful king—having conquered (by merit) the worlds attainable through righteousness—has gone to inexhaustible realms that yield the fruits of virtue.”

आविक्षितम्Āvikṣita (name), (as object: about/that) Āvikṣita
आविक्षितम्:
Karma
TypeNoun
Rootआविक्षित (प्रातिपदिक)
FormMasculine, Accusative, Singular
मरुत्तम्Marutta (name), (as object: about/that) Marutta
मरुत्तम्:
Karma
TypeNoun
Rootमरुत्त (प्रातिपदिक)
FormMasculine, Accusative, Singular
and
:
TypeIndeclinable
Root
मृतम्dead
मृतम्:
Karma
TypeAdjective
Rootमृत (√मृ)
FormMasculine, Accusative, Singular
सृञ्जयO Sṛñjaya (address)
सृञ्जय:
TypeNoun
Rootसृञ्जय (प्रातिपदिक)
FormMasculine, Vocative, Singular
शुश्रुमwe have heard
शुश्रुम:
TypeVerb
Root√श्रु
FormPerfect (लिट्), First, Plural
श्रद्धधानःfaithful, full of faith
श्रद्धधानः:
Karta
TypeAdjective
Rootश्रद्धधान (√धा with श्रद्धा-, present participle)
FormMasculine, Nominative, Singular
जितान्won, conquered
जितान्:
Karma
TypeAdjective
Rootजित (√जि)
FormMasculine, Accusative, Plural
लोकान्worlds
लोकान्:
Karma
TypeNoun
Rootलोक (प्रातिपदिक)
FormMasculine, Accusative, Plural
गतःgone, having gone
गतः:
TypeVerb
Rootगत (√गम्)
FormMasculine, Nominative, Singular
पुण्य-दुहःyielding merit (lit. milking merit)
पुण्य-दुहः:
Karma
TypeAdjective
Rootपुण्यदुह् (प्रातिपदिक)
FormMasculine, Accusative, Plural
अक्षयान्imperishable, inexhaustible
अक्षयान्:
Karma
TypeAdjective
Rootअक्षय (प्रातिपदिक)
FormMasculine, Accusative, Plural

(नारद उवाच

N
Nārada
S
Sṛñjaya
Ā
Āvīkṣita
M
Marutta
L
lokāḥ (realms/worlds)
P
puṇya (merit)