तद् वै कर्तास्मि कौरव्य वचनात् तव नान्यथा । “ये सब लोग दिव्यास्त्रोंकी नहीं जानते और मैं जानता हूँ, इसलिये मुझे उन्हीं अस्त्रोंद्वारा इन सबको मारना पड़ेगा। कुरुनन्दन! तुम शुभ या अशुभ जो कुछ भी कराना उचित समझो, वह तुम्हारे कहनेसे करूँगा; उसके विपरीत कुछ नहीं करूँगा
संजय उवाच