ऋते महारथात् कर्ण कुन्तीपुत्राद् धनंजयात् । भगवान् श्रीकृष्ण बोले--सात्यके! दुःशासन, कर्ण, शकुनि और जयद्रथ--ये दुर्योधनको आगे रखकर सदा गुप्त मन्त्रणा करते और कर्णको यह सलाह देते थे कि 'रणभूमिमें अनन्त पराक्रम प्रकट करनेवाले, विजयी वीरोंमें श्रेष्ठ महाधनुर्धर कर्ण! तुम कुन्तीपुत्र महारथी अर्जुनको छोड़कर दूसरे किसीपर इस शक्तिको न छोड़ना ।। ३५-३६ ६ || स हि तेषामतियशा देवानामिव वासव:
ṛte mahārathāt karṇa kuntīputrād dhanañjayāt | sa hi teṣām atiyaśā devānām iva vāsavaḥ ||
Vāyu said: “Except for Karṇa, the great chariot-warrior, and Dhanañjaya (Arjuna), the son of Kuntī—there is none comparable. For among them his fame is surpassing, like Vāsava (Indra) among the gods.”
श्रीवायुदेव उवाच