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Shloka 273

अध्याय १४८ — कर्णप्रभावः, धृष्टद्युम्नस्य विरथता, तथा घटोत्कच-आह्वानम्

Chapter 148: Karṇa’s Pressure, Dhṛṣṭadyumna Unhorsed, and the Summoning of Ghaṭotkaca

आक्रीडमिव रुद्रस्य पुराभ्यर्दयत: पशून्‌ । भूपाल! अर्जुनका वह महान्‌ युद्ध मृत्युका क्रीडास्थल बना हुआ था, जो श्त्रोंके आधघातसे ही सुन्दर लगता था। वहाँ बहुत-सी ऐसी लाशें पड़ी थीं, जिनके मस्तक कट गये थे और भुजाएँ काट दी गयी थीं। बहुत-सी ऐसी भुजाएँ दृष्टिगोचर होती थीं, जिनके हाथ नष्ट हो गये थे और बहुत-से हाथ भी अंगुलियोंसे शून्य थे। कितने ही मदोन्मत्त हाथी धराशायी हो गये थे। जिनकी सूँड़के अग्रभाग और दाँत काट डाले गये थे। बहुतेरे घोड़ोंकी गर्दनें उड़ा दी गयी थीं और रथोंके टुकड़े-टुकड़े कर दिये गये थे। किन्हींकी आँतें कट गयी थीं, किन्हींके पाँव काट डाले गये थे तथा कुछ दूसरे लोगोंकी संधियाँ (अंगोंके जोड़) खण्डित हो गयी थीं। कुछ लोग निनश्वेष्ट हो गये थे और कुछ पड़े-पड़े छटपटा रहे थे। इनकी संख्या सैकड़ों तथा सहस्रों थी। हमने देखा कि वह युद्धस्थल कायरोंके लिये भयवर्धक हो रहा है। मानो पूर्व (प्रयल) कालमें पशुओं (जीवों) को पीड़ा देनेवाले रुद्रदेवका क्रीडास्थल हो

आक्रीडम्playground, sport-ground
आक्रीडम्:
Karma
TypeNoun
Rootआक्रीड (प्रातिपदिक)
FormNeuter, Accusative, Singular
इवlike, as if
इव:
TypeIndeclinable
Rootइव
रुद्रस्यof Rudra
रुद्रस्य:
TypeNoun
Rootरुद्र (प्रातिपदिक)
FormMasculine, Genitive, Singular
पुराformerly, in earlier times
पुरा:
TypeIndeclinable
Rootपुरा
अभ्यर्दयतःof (him) tormenting/afflicting
अभ्यर्दयतः:
TypeAdjective
Rootअभि-√अर्द् (अर्दन) / अभ्यर्दयत् (कृदन्त-प्रातिपदिक)
FormMasculine, Genitive, Singular, Present active participle (शतृ/शतृन्त), from causative/denominative usage in epic style
पशून्animals, creatures
पशून्:
Karma
TypeNoun
Rootपशु (प्रातिपदिक)
FormMasculine, Accusative, Plural

संजय उवाच