अध्याय ८० — मध्यंदिन-रणवृत्तान्तः
Yudhiṣṭhira–Śrutāyu encounter; Cekitāna–Gautama clash; Abhimanyu pressure; Arjuna’s redeployment
(गदया भीमसेनेन ताडिता वारणोत्तमा: । भिन्नकुम्भा महाकाया भिन्नपृष्ठास्तथैव च ।। भिन्नगात्रा: सहारोहा: शेरते पर्वता इव । भीमसेनकी गदाके आघातसे बड़े-बड़े विशालकाय गजराजोंके कुम्भस्थल फट गये, पृष्ठभाग विदीर्ण हो गये तथा उनका एक-एक अंग छिन्न-भिन्न हो गया और उसी अवस्थामें वे सवारोंसहित धराशायी हो गये, मानो पर्वत ढह गये हों। रथाश्ष भग्नास्तिलश: सयोधा: शतशो रणे ।। अश्राक्ष सादिनश्वैव पदातै: सह भारत । भारत! उन्होंने उस रणक्षेत्रमें सैकड़ों रथोंको उनके सवारोंसहित तिल-तिल करके तोड़ डाला। घोड़ों, घुड़सवारों तथा पैदलोंकी भी धज्जियाँ उड़ा दीं। तत्राद्भुतमपश्याम भीमसेनस्य विक्रमम् ।। यदेक: समरे राजन् बहुभि: समयोधयत्् । अन्तकाले प्रजा: सर्वा दण्डपाणिरिवान्तक: ।।) राजन्! उस युद्धमें हमलोगोंने भीमसेनका अद्भुत पराक्रम देखा, जैसे प्रलयकालमें यमराज हाथमें दण्ड लिये समस्त प्रजाका संहार करते हैं, उसी प्रकार वे अकेले आपके बहुसंख्यक योद्धाओंके साथ युद्ध कर रहे थे। भीमसेने प्रविष्टे तु धृष्टद्युम्नोडपि पार्षत: । द्रोणमुत्सूज्य तरसा प्रययौ यत्र सौबल:,भीमसेनके कौरवसेनामें प्रवेश करनेपर ट्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न भी द्रोणाचार्यको छोड़कर बड़े वेगसे उस स्थानपर गये, जहाँ शकुनि युद्ध कर रहा था
sañjaya uvāca |
gadayā bhīmasenena tāḍitā vāraṇottamāḥ |
bhinnakumbhā mahākāyā bhinnapṛṣṭhās tathaiva ca ||
bhinnagātrāḥ sahārohāḥ śerate parvatā iva ||
Sañjaya said: Struck by Bhīmasena’s mace, the finest of elephants—huge-bodied—had their temples split and their backs torn open. With their limbs shattered, they lay on the battlefield together with their riders, collapsing like mountains. He shattered hundreds of chariots with their warriors, and likewise crushed horses, horsemen, and foot soldiers. O King, we beheld Bhīmasena’s astonishing valor: alone he fought against many of your warriors, like Yama with staff in hand at the end of time. And when Bhīmasena broke into the Kaurava host, Dhṛṣṭadyumna, son of Drupada, leaving Droṇa, sped swiftly to where Saubala (Śakuni) was fighting.
संजय उवाच