गोमहात्म्य-प्रश्नोत्तरम्
Saudāsa–Vasiṣṭha on the Purifying Power of Cows
ऑपन--#ह< बक। हक २ >> चतु:सप्ततितमो< ध्याय: दूसरोंकी गायको चुराकर देने या बेचनेसे दोष, गोहत्याके भयंकर परिणाम तथा गोदान एवं सुवर्ण-दक्षिणाका माहात्म्य इन्द्र उवाच जानन् यो गामपहरेद् विक्रीयाच्चार्थकारणात् | एतदू विज्ञातुमिच्छामि क्व नु तस्य गतिर्भवेत्,इन्द्रने पूछा--पितामह! यदि कोई जान-बूझकर दूसरेकी गौका अपहरण करे और धनके लोभसे उसे बेच डाले, उसकी परलोकमें कया गति होती है? यह मैं जानना चाहता हूँ इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि चतु:सप्ततितमो<ध्याय: ।। ७४ |। इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें चौहतत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ७४ ॥ (दाक्षिणात्य अधिक पाठका ह “लोक मिलाकर कुल १५३६ “लोक हैं) #द-2८5 >> धन * पञ्चसप्ततितमोब ध्याय: व्रत, नियम, दम, सत्य, ब्रह्म॒चर्य, माता-पिता, गुरु आदिकी सेवाकी महत्ता युधिछ्िर उवाच विस्नरम्भितो5हं भवता धर्मान् प्रवदता विभो | प्रवक्ष्यामि तु संदेहं तन्मे ब्रूहि पितामह
indra uvāca | jānan yo gām apahared vikrīyāccārthakāraṇāt | etad eva vijñātum icchāmi kva nu tasya gatir bhavet ||
Indra said: “O Grandsire, if someone knowingly steals another person’s cow and, driven by the motive of gain, even sells it—what destination does such a person attain after death? This is what I wish to understand.”
इन्द्र उवाच