Śiva-stavarāja: Upamanyu’s Preface and Initiation of the Śarva-Nāma Enumeration
Anuśāsana-parva 17
सर्वभूतात्मभूतस्य हरस्यामिततेजस: । अष्टोत्तरसहस्रं तु नाम्नां शर्वस्य मे शूणु । यच्छुत्वा मनुजव्याप्र सर्वान् कामानवाप्स्यसि,जो वेदोंके भी वेद, उत्तम वस्तुओंमें भी परम उत्तम, तेजके भी तेज, तपके भी तप, शान्त पुरुषोंमें भी परम शान्त, कान्तिकी भी कान्ति, जितेन्द्रियोंमें भी परम जितेन्द्रिय, बुद्धिमानोंकी भी बुद्धि, देवताओंके भी देवता, ऋषियोंके भी ऋषि, यज्ञोंके भी यज्ञ, कल्याणोंके भी कल्याण, रुद्रोंके भी रुद्र, प्रभावशाली ईश्वरोंकी भी प्रभा (ऐश्वर्य), योगियोंके भी योगी तथा कारणोंके भी कारण हैं। जिनसे सम्पूर्ण लोक उत्पन्न होते और फिर उन्हींमें विलीन हो जाते हैं, जो सम्पूर्ण भूतोंके आत्मा हैं, उन्हीं अमित तेजस्वी भगवान् शिवके एक हजार आठ नामोंका वर्णन मुझसे सुनिये। पुरुषसिंह! इसका श्रवणमात्र करके आप अपनी सम्पूर्ण कामनाओंको प्राप्त कर लेंगे
sarvabhūtātmabhūtasya harasyāmitatejasaḥ | aṣṭottarasahasraṃ tu nāmnāṃ śarvasya me śṛṇu | yac chrutvā manujavyāghra sarvān kāmān avāpsyasi ||
Vāyu said: “Listen from me, O tiger among men, to the thousand-and-eight names of Śarva—Hara of immeasurable splendor, who has become the very Self of all beings. By merely hearing them, you will attain all your desired aims.”
वायुदेव उवाच