Pratyakṣa–Āgama–Ācāra: Doubt, Proof, and the Practice of Dharma (प्रत्यक्ष–आगम–आचारविचारः)
(भूत्वा पूर्व गृहस्थस्तु पुत्रानृण्यमवाप्य च । कलत्रकार्य संतृप्प कारणात् संत्यजेद् गृहम् ।। मनुष्य पहले गृहस्थ होकर पुत्रोंके उत्पादन-द्वारा पितरोंक ऋणसे उऋण हो पत्नीसे सम्पन्न होनेवाले कार्यकी पूर्ति करके धर्मसम्पादनके लिये गृहका परित्याग कर दे ।। अवस्थाप्य मनो धृत्या व्यवसायपुरस्सर: । निर्दनडो वा सदारो वा वनवासाय सव्रजेत् ।। मनको धैर्यपूर्वक स्थिर करके मनुष्य दृढ़ निश्चयके साथ निर्द्धनद्ध (एकाकी) होकर अथवा स्त्रीको साथ रखकर वनवासके लिये प्रस्थान करे ।। देशा: परमपुण्या ये नदीवनसमन्विता: । अबोधमुक्ता: प्रायेण तीर्थायतनसंयुता: ।। तत्र गत्वा विधि ज्ञात्वा दीक्षां कुर्याद् यथाक्रमम् । दीक्षित्वैकमना भूत्वा परिचर्या समाचरेत् ।। नदी और वनसे युक्त जो परम पुण्यमय प्रदेश हैं, वे प्रायः अज्ञानसे मुक्त और तीथर्थों तथा देवस्थानोंसे सुशोभित हैं। उनमें जाकर विधिका ज्ञान प्राप्त करके क्रमश: ऋषिधर्मकी दीक्षा ग्रहण करे और दीक्षित होनेके पश्चात् एकचित्त हो परिचर्या आरम्भ करे ।। कल्योत्थानं च शौचं च सर्वदेवप्रणामनम् । शकृदालेपन काये त्यक्तदोषप्रमादता ।। सायम्प्रातश्नाभिषेकं चाग्निहोत्रं यथाविधि । काले शौचं च कार्य च जटावल्कलधारणम् ।। सततं वनचर्या च समित्कुसुमकारणात् । नीवाराग्रयणं काले शाकमूलोपचायनम् ।। सदायतनशौचं च तस्य धर्माय चेष्यते । सबेरे उठना, शौचाचारका पालन करना, सब देवताओंको मस्तक झुकाना, शरीरमें गायका गोबर लगाकर नहाना, दोष और प्रमादका त्याग करना, सायंकाल और प्रात:ःकाल स्नान एवं विधिवत् अग्निहोत्र करना, ठीक समयपर शौचाचारका पालन करना, सिरपर जटा और कटियप्रदेशमें वल्कल धारण करना, समिधा और पुष्पका संग्रह करनेके लिये सदा वनमें विचरना, समयपर नीवारसे आग्रयण कर्म (नवशस्येष्टि यज्ञका सम्पादन) करना, साग और मूलका संकलन करना तथा सदा अपने घरको शुद्ध रखना--आदि कार्य वानप्रस्थ मुनिके लिये अभीष्ट है। इनसे उसके धर्मकी सिद्धि होती है ।। अतिथीनामाभिमुख्यं तत्परत्वं च सर्वदा ।। पाद्यासनाभ्यां सम्पूज्य तथाहारनिमन्त्रणम् । अग्राम्यपचनं काले पितृदेवार्चनं॑ तथा ।। पश्चादतिथिसत्कारस्तस्य धर्मा: सनातना: । पहले अतिथियोंके सम्मुख जाय, फिर सदा उनकी सेवामें तत्पर रहे। पाद्य और आसन आदिके द्वारा उनकी पूजा करके उन्हें भोजनके लिये बुलावे। समयपर ऐसी वस्तुओंसे रसोई बनावे, जो गाँवमें पैदा न हुई हों। उस रसोईके द्वारा पहले देवताओं और पितरोंका पूजन करे। तत्पश्चात् अतिथिको सत्कारपूर्वक भोजन करावे। ऐसा करनेवाले वानप्रस्थको सनातन धर्मकी सिद्धि प्राप्त होती है ।। शिष्टैर्थर्मासने चैव धर्मार्थसहिता: कथा: ।। प्रतिश्रयविभागश्व भूमिशय्या शिलासु वा । धर्मासनपर बैठे हुए शिष्ट पुरुषोंद्वारा उसे धर्मार्थयुक्त कथाएँ सुननी चाहिये। उसे अपने लिये पृथक् आश्रम बना लेना चाहिये। वह पृथ्वी अथवा प्रस्तरकी शय्यापर सोये ।। व्रतोपवासयोगकश्न क्षमा चेन्द्रियनिग्रह: ।। दिवारात्र यथायोगं शौचं धर्मस्य चिन्तनम् ।) वानप्रस्थ मुनि व्रत और उपवासमें तत्पर रहे, दूसरोंपर क्षमाका भाव रखे, अपनी इन्द्रियोंको वशमें करे। दिन-रात यथासम्भव शौचाचारका पालन करके धर्मका चिन्तन करे ।। त्रिकालमभिषेकं च पितृदेवार्चनं तथा । अग्निहोत्रपरिस्पन्द इष्टिहोमविधिस्तथा
bhūtvā pūrvaṁ gṛhasthas tu putrān ṛṇyam avāpya ca | kalatrakārya-saṁtṛptaḥ kāraṇāt saṁtyajed gṛham ||
avasthāpya mano dhṛtyā vyavasāya-purassaraḥ | nirdhano vā sadāro vā vanavāsāya sa vrajet ||
Śrī Maheśvara said: Having first lived as a householder, a man should discharge the ancestral debt by begetting sons and should complete the obligations that arise through a wife and household life. Then, for the sake of accomplishing dharma, he should renounce the home. Steadying his mind with firmness and led by resolute purpose, he should set out for forest-dwelling—either without possessions and alone, or accompanied by his wife—entering the disciplined life of the vānaprastha as a deliberate ethical transition from worldly duties to spiritual practice.
श्रीमहेश्वर उवाच
One should follow a staged ethical life: fulfill householder obligations—especially duties to ancestors through progeny and responsibilities connected with marriage—then, with firm resolve, transition to forest-dwelling for the focused pursuit of dharma and spiritual discipline.
Śrī Maheśvara instructs on the proper progression of the āśrama system, describing when and how a person should leave household life and depart for the forest, either alone and unencumbered or together with his wife, guided by steadiness of mind and determination.