Jarītā-Śārṅgaka-saṃvādaḥ — The Dialogue of Jaritā and the Śārṅgaka Chicks
Fire-escape deliberation
/ (दाक्षिणात्य अधिक पाठके १६३ श्लोक मिलाकर कुल ९०३ श्लोक हैं) 27:22 हज हम ३. धनुर्वेदमें निम्नाँकित चार पाद बताये गये हैं--मन्त्रमुक्त, पाणिमुक्त, मुक्तामुक्त और अमुक्त। जैसा कि वचन है-- मन्त्रमुक्त पाणिमुक्तं मुक्तामुक्तं तथैव च । अमुक्तं च धनुर्वेदे चतुष्पाच्छस्त्रमीरितम् |। जिसका मन्त्रद्वारा केवल प्रयोग होता है, उपसंहार नहीं, उसे मन्त्रमुक्त कहते हैं। जिसे हाथमें लेकर धनुषद्वारा छोड़ा जाय, वह बाण आदि पाणिमुक्त कहा गया है। जिसके प्रयोग और उपसंहार दोनों हों, वह मुक्तामुक्त है। जो वस्तुत: छोड़ा नहीं जाता, जैसे मन्त्रद्वारा साधित (ध्वजा आदि) है, जिसको देखनेमात्रसे शत्रु भाग जाते हैं, वह अमुक्त कहलाता है। ये अथवा सूत्र, शिक्षा, प्रयोग तथा रहस्य--ये ही धनुर्वेदके चार पाद हैं। २. आदान, संधान, मोक्षण, निवर्तन, स्थान, मुष्टि, प्रयोग, प्रायश्चित्तत मण्डल तथा रहस्य--थनुर्वेदके ये दस अंग हैं। यथा-- आदानमथ संधानं मोक्षणं विनिवर्तनम् | स्थान मुष्टि: प्रयोगश्न प्रायश्चित्तानि मण्डलम् ।। रहस्यं चेति दशधा धनुर्वेदाड़मिष्यते । “तरकससे बाणको निकालना आदान है। उसे धनुषकी प्रत्यंचापर रखना संधान है, लक्ष्यपर छोड़ना मोक्षण कहा गया है। यदि बाण छोड़ देनेके बाद यह मालूम हो जाय कि हमारा विपक्षी निर्बल या शस्त्रहीन है, तो वीर पुरुष मन्त्रशक्तिसे उस बाणको लौटा लेते हैं। इस प्रकार छोड़े हुए अस्त्रको लौटा लेना विनिवर्तन कहलाता है। धनुष या उसकी प्रत्यंचाके धारण अथवा शरसंधानकालमें धनुष और प्रत्यंचाके मध्यदेशको स्थान कहा गया है। तीन या चार अंगुलियोंका सहयोग ही मुष्टि है। तर्जनी और मध्यमा अंगुलिके अथवा मध्यमा और अंगुष्ठके मध्यसे बाणका संधान करना प्रयोग कहलाता है। स्वतः या दूसरेसे प्राप्त होनेवाले ज्याघात (प्रत्यंचाके आधात) और बाणके आघातको रोकनेके लिये जो दस्तानों आदिका प्रयोग किया जाता है, उसका नाम प्रायश्वित्त है। चक्राकार घूमते हुए रथके साथ-साथ घूमनेवाले लक्ष्यका वेध मण्डल कहलाता है। शब्दके आधारपर लक्ष्य बींधना अथवा एक ही समय अनेक लक्ष्योंको बींध डालना, ये सब रहस्यके अन्तर्गत हैं।' 3. ब्रह्मासत्र आदिको दिव्य और खड्ग आदिको मानुष कहा गया है। (खाण्डवदाहपर्व) एकविशत्यधिकद्धिशततमो< ध्याय: युधिष्ठिरके राज्यकी विशेषता, कृष्ण और अर्जुनका खाण्डववनमें जाना तथा उन दोनोंके पास ब्राह्मणवेशधारी अग्निदेवका आगमन वैशम्पायन उवाच इन्द्रप्रस्थे वसन्तस्ते जघ्नुरन्यान् नराधिपान् | शासनादू् धृतराष्ट्रस्य राज्ञ: शान्तनवस्यथ च,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! राजा धृतराष्ट्र तथा शान्तनुनन्दन भीष्मकी आज्ञासे इन्द्रप्रस्थमें रहते हुए पाण्डवोंने अन्य बहुत-से राजाओंको, जो उनके शत्रु थे, मार दिया
vaiśampāyana uvāca | indraprasthe vasantas te jaghnur anyān narādhipān | śāsanād dhṛtarāṣṭrasya rājñaḥ śāntanavasya ca ||
Vaiśampāyana said: “O Janamejaya, while the Pāṇḍavas were residing at Indraprastha under the command of King Dhṛtarāṣṭra and of Śāntanu’s son Bhīṣma, they slew many other rulers—kings who stood as their enemies.”
वैशम्पायन उवाच
The verse frames the Pāṇḍavas’ expansion of power as occurring under recognized authority (Dhṛtarāṣṭra and Bhīṣma), highlighting the epic’s concern with legitimate command, political order, and the dharmic tension between conquest and rightful governance.
Vaiśampāyana reports to Janamejaya that the Pāṇḍavas, living in Indraprastha, defeated and killed many hostile kings, acting under the directive of Dhṛtarāṣṭra and Bhīṣma—setting the stage for the events leading toward the Khāṇḍava episode.