पाण्डवानां पाञ्चालगमनम्
The Pāṇḍavas’ Journey toward Pāñcāla and News of the Svayaṃvara
क्रोशमानं भयोद्धिग्नं त्रातारं नाध्यगच्छत । इस प्रकार नन्दिनी गायने उनकी सारी सेनाको दूर भगा दिया। विश्वामित्रकी वह सेना तीन योजनतक खदेड़ी गयी। वह सेना भयसे व्याकुल होकर चीखती- चिल्लाती रही; किंतु कोई भी संरक्षक उसे नहीं मिला || ४३ ह ।। (विश्वामित्रस्ततो दृष्टवा क्रोधाविष्ट: स रोदसी । ववर्ष शरवर्षाणि वसिष्ठे मुनिसत्तमे ।। घोररूपांश्व नाराचान् क्षुरान् भल्लान् महामुनि: । विश्वामित्रप्रयुक्तांस्तान् वैणवेन व्यमोचयत् ।। वसिष्ठस्य तदा दृष्टवा कर्मकौशलमाहदवे ।। विश्वामित्रो5पि कोपेन भूय: शत्रुनिपातन: । दिव्यास्त्रवर्ष तस्मै तु प्राहिणोन्मुनये रुषा ।। आग्नेयं वारुणं चैन्द्रं याम्यं वायव्यमेव च । विससर्ज महाभागे वसिष्ठे ब्रह्मण: सुते ।। अस्त्राणि सर्वतो ज्वालां विसृजन्ति प्रपेदिरे । युगान्तसमये घोरा: पतड़स्येव रश्मय: ।। वसिष्ठो5पि महातेजा ब्रद्याशत्तिप्रयुक्तया । यष्ट्या निवारयामास सर्वाण्यस्त्राणि स स्मयन् ।। ततस्ते भस्मसाद्धूता: पतन्ति सम महीतले । अपोहा दिव्यान्यस्त्राणि वसिष्ठो वाक्यमब्रवीत् ।। यह देखकर विश्वामित्र क्रोधसे व्याप्त हो मुनि-श्रेष्ठ वसिष्ठको लक्षित करके पृथिवी और आकाशमें बाणोंकी वर्षा करने लगे; परंतु महामुनि वसिष्ठने विश्वामित्रके चलाये हुए भयंकर नाराच, क्षुर और भल्ल नामक बाणोंका केवल बाँसकी छड़ीसे निवारण कर दिया। युद्धमें वसिष्ठ मुनिका वह कार्य-कौशल देखकर शत्रुओंको मार गिरानेवाले विश्वामित्र भी पुन: कुपित हो महर्षि वसिष्ठपर रोषपूर्वक दिव्यास्त्रोंकी वर्षा करने लगे। उन्होंने ब्रह्माजीके पुत्र महाभाग वसिष्ठपर आग्नेयास्त्र, वारुणास्त्र, ऐन्द्रास्त्र, याम्यास्त्र और वायव्यास्त्रका प्रयोग किया। वे सब अस्त्र प्रलयकालके सूर्यकी प्रचण्ड किरणोंके समान सब ओरसे आगकी लपटें छोड़ते हुए महर्षिपर टूट पड़े; परंतु महातेजस्वी वसिष्ठने मुसकराते हुए ब्राह्मबलसे प्रेरित हुई छड़ीके द्वारा इन सब अस्त्रोंको पीछे लौटा दिया। फिर तो वे सभी अस्त्र भस्मीभूत होकर पृथ्वीपर गिर पड़े। इस प्रकार उन दिव्यास्त्रोंका निवारण करके वसिष्ठजीने विश्वामित्रसे यह बात कही। वसिष्ठ उवाच निर्जितो5सि महाराज दुरात्मन् गाधिनन्दन । यदि ते<स्ति परं शौर्य तद् दर्शय मयि स्थिते ।। वसिष्ठजी बोले--महाराज दुरात्मा गाधिनन्दन! अब तू परास्त हो चुका है। यदि तुझमें और भी उत्तम पराक्रम है तो मेरे ऊपर दिखा। मैं तेरे सामने डटकर खड़ा हूँ। गन्धर्व उवाच विश्वामित्रस्तथा चोक्तो वसिष्ठेन नराधिप । नोवाच किंचिद् व्रीडाढ्यो विद्रावितमहाबल: ।।) गन्धर्व कहता है--राजन! विश्वामित्रकी वह विशाल सेना खदेड़ी जा चुकी थी। वसिष्ठ के द्वारा पूर्वोक्तरूपसे ललकारे जानेपर वे लज्जित होकर कुछ भी उत्तर न दे सके। दृष्टवा तन्महदाश्चर्य ब्रह्मतेजोभवे तदा,ब्रद्मतजका यह अत्यन्त आश्चर्यजनक चमत्कार देखकर विश्वामित्र क्षत्रियत्वसे खिन्न एवं उदासीन हो यह बात बोले--'“क्षत्रिय-बल तो नाममात्रका ही बल है, उसे धिक्कार है। ब्रह्मतेजजनित बल ही वास्तविक बल है!
krośamānaṁ bhayoddhignaṁ trātāraṁ nādhyagacchata |
Crying out in panic and shaken by fear, they could find no protector.
गन्धर्व उवाच
Worldly strength and numbers can collapse instantly when driven by fear; true refuge is not guaranteed by power or status. The episode contrasts kṣātra-bala (martial force) with brahma-tejas (spiritual potency), warning against arrogance and highlighting the superior efficacy of disciplined spiritual power.
After Nandinī and Vasiṣṭha’s power rout Viśvāmitra’s forces, the fleeing soldiers cry out in terror but find no one to protect them. The verse captures the moment of panic and abandonment during the retreat, setting up Viśvāmitra’s shame and his recognition of brahma-tejas.