Uccaiḥśravas and the Counsel to Churn the Ocean (उच्चैःश्रवसः प्रादुर्भावः — समुद्रमन्थन-परामर्शः)
व्रतैश्न विविधैर््रह्मन् स्वाध्यायैश्वानूणो5भवत् | देवांक्ष॒ तर्पयामास यज्ञैविविधदक्षिणै:,ब्रह्मन! भाँति-भाँतिके व्रतों और स्वाध्यायोंका अनुष्ठान करके वे सब प्रकारके ऋणोंसे उऋण हो गये। अनेक प्रकारकी दक्षिणावाले यज्ञोंका अनुष्ठान करके उन्होंने देवताओं, ब्रह्मचर्यव्रतके पालनसे ऋषियों और संतानकी उत्पत्तिद्वारा पितरोंको तृप्त किया। कठोर व्रतका पालन करनेवाले जरत्कारु मुनि पितरोंकी चिन्ताका भारी भार उतारकर अपने उन पितामहोंके साथ स्वर्गलोकको चले गये। आस्तीक-जैसे पुत्र तथा परम धर्मकी प्राप्ति करके मुनिवर जरत्कारने दीर्घकालके पश्चात् स्वर्गलोककी यात्रा की। भूगुकुलशिरोमणे! इस प्रकार मैंने आस्तीकके उपाख्यानका यथावत् वर्णन किया है। बताइये, अब और क्या कहा जाय?
śaunaka uvāca | vrataiś ca vividhair brahman svādhyāyaiś cānṛṇo 'bhavat | devāṃś ca tarpayāmāsa yajñair vividha-dakṣiṇaiḥ ||
Śaunaka said: “O Brāhmaṇa, by undertaking many kinds of vows and by the discipline of Vedic study (svādhyāya), he became free from all obligations. And by sacrifices endowed with varied gifts (dakṣiṇās), he satisfied the gods.”
शौनक उवाच