Vāraṇāvata-praveśa and Jatugṛha-saṃdeha
Entry into Vāraṇāvata and Suspicion of the Lac-House
अनुज्येष्ठं तु ते तत्र युधिष्िरपुरोगमा: । (रणमध्ये स्थित॑ द्रोणमभिवाद्य नरर्षभा: । पूजां चक्कुर्यथान्यायं द्रोणस्थ च कृपस्य च ।। नरश्रेष्ठ युधिष्ठिर आदि उन राजकुमारोंने जेठे-छोटेके क्रमसे स्थित हो उस रंगभूमिके मध्यभागमें बैठे हुए आचार्य द्रोणको प्रणाम करके द्रोण और कृप दोनों आचार्योंकी यथोचित पूजा की। आशीकभ्िरश्व प्रयुक्ताभि: सर्वे संहृष्टमानसा: । अभिवाद्य पुनः शस्त्रान् बलिपुष्पै: समन्वितान् ।। रक्तचन्दनसम्मिश्रै: स्वयमार्चन्त कौरवा: । रक्तचन्दनदिग्धाश्व रक्तमाल्यानुधारिण: ।। सर्वे रक्तपताकाश्न सर्वे रक्तान्तलोचना: । द्रोणेन समनुज्ञाता गृहा शस्त्र परंतपा: ।। धनूंषि पूर्व संगृह्द तप्तकाज्चनभूषिता: । सज्यानि विविधाकारै: शरै: संधाय कौरवा: ।। ज्याघोषं तलघोषं च कृत्वा भूतान्यपूजयन् ।) चक्कुरस्त्रं महावीर्या: कुमारा: परमाद्भुतम्,फिर उनसे आशीर्वाद पाकर उन सबका मन प्रसन्न हो गया। तत्पश्चात् पूजाके पुष्पोंसे आच्छादित अस्त्र-शस्त्रोंको प्रणाम करके कौरवोंने रक्त चन्दन और फूलोंद्वारा पुनः स्वयं उनका पूजन किया। वे सब-के-सब लाल चन्दनसे चर्चित तथा लाल रंगकी मालाओंसे विभूषित थे। सबके रथोंपर लाल रंगकी पताकाएँ थीं। सभीके नेत्रोंके कोने लाल रंगके थे। तदनन्तर तपाये हुए सुवर्णके आभूषणोंसे विभूषित एवं शत्रुओंको संताप देनेवाले कौरव राजकुमारोंने आचार्य द्रोणकी आज्ञा पाकर पहले अपने अस्त्र एवं धनुष लेकर डोरी चढ़ायी और उसपर भाँति-भाँतिकी आकृतिके बाणोंका संधान करके प्रत्यंचाका टंकार करते और ताल ठोंकते हुए समस्त प्राणियोंका आदर किया। तत्पश्चात् वे महापराक्रमी राजकुमार वहाँ परम अद्भुत अस्त्र-कौशल प्रकट करने लगे
anujyeṣṭhaṃ tu te tatra yudhiṣṭhirapurogamāḥ | raṇamadhye sthitaṃ droṇam abhivādya nararṣabhāḥ | pūjāṃ cakrur yathānyāyaṃ droṇasya ca kṛpasya ca ||
Dhṛtarāṣṭra said: There, with Yudhiṣṭhira at their head, those bull-like princes—standing in due order from the younger to the elder—approached Droṇa who was stationed in the midst of the arena. Having bowed to him, they rendered proper honors, as prescribed, to both Droṇa and Kṛpa.
धृतराष्ट उवाच