Śāṃtanu’s Ideal Rule; Devavrata’s Return; The Satyavatī Marriage Condition and Bhīṣma’s Vow (आदि पर्व, अध्याय ९४)
(वैशग्पायन उवाच) (एतस्मिन्नन्तरे चैव माधवी तु तपोधना । मृगचर्मपरीताड़्ी परिणामे मृगव्रतम् ।। मृगै: सह चरन्ती सा मृगाहारविचेष्टिता । यज्ञवाट्टं मृगगणै: प्रविश्य भृशविस्मिता ।। आध्रायन्ती धूमगन्धं मृगैरैव चचार सा । वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! इसी समय तपस्विनी माधवी उधर आ निकली। उसने मृगचर्मसे अपने सब अंगोंको ढक रखा था। वृद्धावस्था प्राप्त होनेपर वह मृगोंके साथ विचरती हुई मृगव्रतका पालन कर रही थी। उसकी भोजन-सामग्री और चेष्टा मृगोंके ही तुल्य थी। वह मृगोंके झुंडके साथ यज्ञमण्डपमें प्रवेश करके अत्यन्त विस्मित हुई और यज्ञीय धूमकी सुगन्ध लेती हुई मृगोंके साथ वहाँ विचरने लगी। यज्ञवाटमटन्ती सा पुत्रांस्तानपराजितान् ।। पश्यन्ती यज्ञमाहात्म्यं मुदं लेभे च माधवी । यज्ञशालामें घूम-घूमकर अपने अपराजित पुत्रोंकोी देखती और यज्ञकी महिमाका अनुभव करती हुई माधवी बहुत प्रसन्न हुई। असंस्पृशन्तं वसुधां ययातिं नाहुषं तदा ।। दिविष्ठं प्राप्तमाज्ञाय ववन्दे पितरं तदा । ततो वसुमना:- पृच्छन् मातरं वै तपस्विनीम् ।। उसने देखा, स्वर्गवासी नहुषनन्दन महाराज ययाति आये हैं, परंतु पृथ्वीका स्पर्श नहीं कर रहे हैं (आकाशमें ही स्थित हैं)। अपने पिताको पहचानकर माधवीने उन्हें प्रणाम किया। तब वसुमनाने अपनी तपस्विनी मातासे प्रश्न करते हुए कहा। वसुमना उवाच भवत्या यत् कृतमिदं वन्दनं वरवर्णिनि । को<यं देवो5थवा राजा यदि जानासि मे वद ।। वसुमना बोले--माँ! तुम श्रेष्ठ वर्णकी देवी हो। तुमने इन महापुरुषको प्रणाम किया है। ये कौन हैं? कोई देवता हैं या राजा? यदि जानती हो तो मुझे बताओ। माधव्युवाच शृणुध्वं सहिता: पुत्रा नाहुषो5यं पिता मम | ययातिर्मम पुत्राणां मातामह इति श्रुतः ।। पूरुं मे भ्रातरं राज्ये समावेश्य दिवं गत: । केन वा कारणेनैव इह प्राप्तो महायशा: ।। माधवीने कहा--पुत्रो! तुम सब लोग एक साथ सुन लो--'ये मेरे पिता नहुषनन्दन महाराज ययाति हैं। मेरे पुत्रोंके सुविख्यात मातामह (नाना) ये ही हैं। इन्होंने मेरे भाई पूरुको राज्यपर अभिषिक्त करके स्वर्गलोककी यात्रा की थी; परंतु न जाने किस कारणसे ये महायशस्वी महाराज पुनः यहाँ आये हैं'। वैशम्पायन उवाच तस्यास्तदू वचन श्रुत्वा स्थान भ्रष्टेति चाब्रवीत् | सा पुत्रस्य वच: श्रुत्वा सम्भ्रमाविष्टचेतना ।। माधवी पितरं प्राह दौहित्रपरिवारितम् । वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! माताकी यह बात सुनकर वसुमनाने कहा--माँ! ये अपने स्थानसे भ्रष्ट हो गये हैं। पुत्रका यह वचन सुनकर माधवी भ्रान्तचित्त हो उठी और दौहित्रोंसे घिरे हुए अपने पितासे इस प्रकार बोली। माधव्युवाच तपसा निर्जिताल्लोकान् प्रतिगृह्नीष्व मामकान् । पुत्राणामिव पौत्राणां धर्मादधिगतं धनम् ।। स्वार्थमेव वदन््तीह ऋषयो वेदपारगा: । तस्माद् दानेन तपसा अस्माकं दिवमाव्रज ।। माधवीने कहा--पिताजी! मैंने तपस्याद्वारा जिन लोकोंपर अधिकार प्राप्त किया है, उन्हें आप ग्रहण करें। पुत्रों और पौत्रोंकी भाँति पुत्री और दौहित्रोंका धर्माचरणसे प्राप्त किया हुआ धन भी अपने ही लिये है, यह वेदवेत्ता ऋषि कहते हैं; अतः आप हमलोगोंके दान एवं तपस्याजनित पुण्यसे स्वर्गलोकमें जाइये। ययातिरुवाच यदि धर्मफलं होतच्छोभनं भविता तथा । दुहित्रा चैव दौहित्रैस्तारितो5हं महात्मभि: ।। ययाति बोले--यदि यह धर्मजनित फल है, तब तो इसका शुभ परिणाम अवश्यम्भावी है। आज मुझे मेरी पुत्री तथा महात्मा दौहित्रोंने तारा है। तस्मात् पवित्र दौहित्रमद्यप्रभृति पैतृके । भविष्यति न संदेह: 828, | प्रीतिवर्धनम् ।। इसलिये आजसे पितृ-कर्म (श्राद्ध)-में दौहित्र परम पवित्र समझा जायगा। इसमें संशय नहीं कि वह पितरोंका हर्ष बढ़ानेवाला होगा। त्रीणि श्राद्धे पवित्राणि दौहित्र: कुतपस्तिला: । त्रीणि चात्र प्रशंसन्ति शौचमक्रोधमत्वराम् ।। भोक्तार: परिवेष्टार: श्रावितार: पवित्रका: । श्राद्धमें तीन वस्तुएँ पवित्र मानी जायँगी--दौहित्र, कुतप और तिल। साथ ही इसमें तीन गुण भी प्रशंसित होंगे--पवित्रता, अक्रोध और अत्वरा (उतावलेपनका अभाव)। तथा श्राद्धमों भोजन करनेवाले, परोसनेवाले और (वैदिक या पौराणिक मन्त्रोंका पाठ) सुनानेवाले--ये तीन प्रकारके मनुष्य भी पवित्र माने जायूँगे। दिवसस्याष्टमे भागे मन्दी भवति भास्करे | स काल: कुतपो नाम पितृणां दत्तमक्षयम् ।। दिनके आठवें भागमें जब सूर्यका ताप घटने लगता है, उस समयका नाम कुतप है। उसमें पितरोंके लिये दिया हुआ दान अक्षय होता है। तिला: पिशाचाद् रक्षन्ति दर्भा रक्षन्ति राक्षसात् । रक्षन्ति श्रोत्रिया: पद्धक्ति यतिभिर्भुक्तमक्षयम् ।। तिल पिशाचोंसे श्राद्धकी रक्षा करते हैं, कुश राक्षसोंसे बचाते हैं, श्रोत्रिय ब्राह्मण पंक्तिकी रक्षा करते हैं और यदि यतिगण श्राद्धमें भोजन कर लें तो वह अक्षय हो जाता है। लब्ध्वा पात्र तु दिद्वांसं श्रोत्रियं सुव्रतं शुचिम् । स काल: कालतो दत्त नान्यथा काल इष्यते ।। उत्तम व्रतका आचरण करनेवाला पवित्र श्रोत्रिय ब्राह्मण श्राद्धका उत्तम पात्र है। वह जब प्राप्त हो जाय, वही श्राद्धका उत्तम काल समझना चाहिये। उसको दिया हुआ दान उत्तम कालका दान है। इसके सिवा और कोई उपयुक्त काल नहीं है। वैशम्पायन उवाच एवमुक्त्वा ययातिस्तु पुनः प्रोवाच बुद्धिमान । सर्वे ह्वभूथस्नातास्त्वरध्वं कार्यगौरवात् ।।) वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! बुद्धिमान् ययाति उपर्युक्त बात कहकर पुनः अपने दौहित्रोंसे बोले--“तुम सब लोग अवभूथस्नान कर चुके हो। अब महत्त्वपूर्ण कार्यकी सिद्धिके लिये शीघ्र तैयार हो जाओ'। अष्टक उवाच आतिष्ठस्व रथान् राजन् विक्रमस्व विहायसम् । वयमप्यनुयास्यथामो यदा कालो भविष्यति,अष्टक बोले--राजन्! आप इन रथोंमें बैठिये और आकाशमें ऊपरकी ओर बढ़िये। जब समय होगा, तब हम भी आपका अनुसरण करेंगे
Aṣṭaka uvāca |
ātiṣṭhasva rathān rājan vikramasva vihāyasam |
vayam apy anuyāsyathāmo yadā kālo bhaviṣyati ||
Aṣṭaka sagte: „O König, besteige diese Wagen und steige zum Himmel empor. Wenn die rechte Zeit gekommen ist, werden auch wir dir folgen.“
अष्टक उवाच
Dharma operates with both effort and proper timing: one should act decisively in a righteous cause, yet proceed according to kāla (the fitting moment). The verse also reinforces the supportive role of descendants in restoring an elder’s spiritual standing.
After Yayāti’s fall from heaven and his encounter with his daughter Mādhavī and grandsons, Aṣṭaka addresses Yayāti, urging him to mount the chariots and rise into the sky, promising that the grandsons will follow when the appropriate time arrives.