Adhyaya 260
Vana ParvaAdhyaya 26043 Verses

Adhyaya 260

Daśagrīva-boonāvaraṇa, Viṣṇv-avatāra-niyoga, Vānara-sahāya-janana, Mantharā-nirmāṇa

Upa-parva: Mārkaṇḍeya-samvāda / Rāvaṇa-avadha-upāya (Vānara-sṛṣṭi-kathā)

This chapter presents a compact chain of reported speech. Mārkaṇḍeya narrates how accomplished brahmarṣis and devarājarṣis, led by Agni, approach Brahmā seeking refuge from the disruptive power of Daśagrīva (Rāvaṇa), who is described as protected by a prior boon. Agni articulates the crisis: widespread affliction of beings and the absence of any alternative protector. Brahmā responds with a constraint-based assessment—Daśagrīva is not readily conquerable in direct battle by devas or asuras—and then identifies the appointed corrective mechanism: Viṣṇu, the foremost among combatants, has descended by Brahmā’s commission to execute the necessary work. Brahmā further instructs the assembled deities to incarnate on earth and to generate heroic sons among vānaras and ṛkṣas, endowed with strength and transformative capacities, thereby establishing a support network for Viṣṇu’s mission. The narrative then specifies particular implementations: groups of devas, gandharvas, and dānavas descend in apportioned fashion; the gandharvī Dundubhī is directed for the success of the divine objective and becomes Mantharā, a hunchbacked figure in the human world. The chapter concludes by describing the extraordinary physical and martial capacities of these offspring and notes that the divine agent subsequently instructs Mantharā in role-specific tasks, which she undertakes with purposeful movement aimed at intensifying enmity.

Chapter Arc: वनवास की कठोरता में फल-मूलाहार करते हुए भी पाण्डवों की तेजस्विता बनी रहती है, पर युधिष्ठिर का मन भीतर-भीतर जलता है—भाइयों के दुःख का कारण वह अपने ही कर्म-दोष को मानते हैं। → राजर्षि युधिष्ठिर बार-बार उसी चिंता में डूबते हैं: ‘सुख के योग्य होकर भी ये महापुरुष कष्ट क्यों भोग रहे हैं?’ इसी मानसिक भार के बीच महर्षि व्यास का आगमन होता है—उनकी वाणी युधिष्ठिर की आत्मग्लानि को धर्म-चिन्तन में रूपान्तरित करने लगती है। → व्यास दान के विषय में कठोर सत्य उद्घाटित करते हैं—पृथ्वी पर दान से बढ़कर दुष्कर कुछ नहीं, क्योंकि अर्थ की तृष्णा महान है और धन दुःख से मिलता है; फिर भी समय पर आए अतिथि को प्रसन्नचित्त, मत्सर-रहित होकर यथाशक्ति देना ही धर्म है। → व्यास युधिष्ठिर को तप और काल-स्वीकार का मार्ग दिखाते हैं: सुख-दुःख पर्याय से आते हैं; विवेकी पुरुष को प्राप्त सुख का त्यागपूर्वक उपभोग और स्वतः आए दुःख का धैर्यपूर्वक वहन करना चाहिए—कृषक की भाँति काल की प्रतीक्षा और साधना में स्थिर रहना ही विजय है। → व्यास की शिक्षा के बाद भी प्रश्न शेष रहता है—क्या युधिष्ठिर इस उपदेश को केवल सुनेंगे, या दान-तप-धैर्य को अपने राजधर्म की अग्नि बनाकर आगामी परीक्षाओं में उतारेंगे?

Shlokas

Verse 1

््स् “+(>9) #::.# #55-7 (व्रीहिद्रोणिकपर्व) एकोनषष्ट्यधिकद्वधिशततमो< ध्याय: युधिष्ठिरकी चिन्ता, व्यासजीका पाण्डवोंके पास आगमन और दानकी महत्ताका प्रतिपादन वैशम्पायन उवाच वने निवसतां तेषां पाण्डवानां महात्मनाम्‌ | वर्षण्येकादशातीयु: कृच्छेण भरतर्षभ,वैशम्पायनजी कहते हैं--भरतश्रेष्ठ जनमेजय! इस प्रकार वनमें रहते हुए उन महात्मा पाण्डवोंके ग्यारह वर्ष बड़े कष्टसे बीते

বৈশম্পায়ন বললেন—হে ভরতশ্রেষ্ঠ জনমেজয়! বনে বাস করতে করতে সেই মহাত্মা পাণ্ডবদের এগারো বছর অতি কষ্টে অতিবাহিত হল।

Verse 2

फलमूलाशनास्ते हि सुखारहँ दुःखमुत्तमम्‌ प्राप्तकालमनुध्यान्त: सेहिरे वरपूरुषा:,वे फल-मूल खाकर रहते थे। सुख भोगनेके योग्य होकर भी महान्‌ कष्ट भोगते थे और यह सोचकर कि यह हमारे कष्टका समय है, इसे धैर्यपूर्वक सहन करना चाहिये, चुपचाप सब दु:ख झेलते थे। उनमें ऐसा विवेक इसलिये था कि वे सब-के-सब श्रेष्ठ पुरुष थे

তাঁরা ফল-মূল আহার করে দিন কাটাতেন। সুখভোগের যোগ্য হয়েও মহাদুঃখ সহ্য করতেন; আর মনে করতেন—এটাই দুঃখভোগের নির্ধারিত কাল—এই ভাবনায় ধৈর্য ধরে নীরবে সব যন্ত্রণা বহন করতেন, কারণ তাঁরা সকলেই শ্রেষ্ঠ পুরুষ।

Verse 3

युधिष्ठिरस्तु राजर्षिरात्मकर्मापराधजम्‌ | चिन्तयन्‌ स महाबाहुर्भातृणां दुःखमुत्तमम्‌,महाबाहु राजर्षि युधिष्ठिर सदा यही सोचते रहते थे कि “मेरे भाइयोंपर जो यह महान्‌ दुःख आ पड़ा है, मेरी ही करनीका फल है। मेरे ही अपराधसे इन्हें कष्ट भोगना पड़ रहा है!

রাজর্ষি মহাবাহু যুধিষ্ঠির সর্বদা এই কথাই ভাবতেন—‘আমার ভাইদের ওপর যে মহাদুঃখ নেমে এসেছে, তা আমারই কর্মদোষ থেকে জন্মেছে; আমারই অপরাধের ফলে তাদের কষ্ট ভোগ করতে হচ্ছে।’

Verse 4

न सुष्वाप सुखं राजा हृदि शल्यैरिवार्पिति: । दौरात्म्यमनुपश्यंस्तत्‌ काले द्यूतोद्‌्भवस्य हि,इसी चिन्तामें पड़े-पड़े राजा युधिष्ठिर रातमें सुखकी नींद नहीं सो पाते थे। ये बातें उनके हृदयमें चुभे हुए काँटोंके समान दुःख दिया करती थीं। जूआ खेलनेके कारणभूत शकुनि आदिकी दुष्टतापर दृष्टिपात करके तथा सूतपुत्र कर्णकी कठोर बातोंको स्मरण करके पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर दीनभावसे लंबी साँसें लेते रहते और महान्‌ क्रोधरूपी विषको अपने हृदयमें धारण करते थे

রাজা সুখে নিদ্রা করতে পারতেন না—যেন হৃদয়ে শূল বিদ্ধ হয়েছে। কারণ সেই সময় জুয়া থেকে জন্ম নেওয়া দুষ্কৃতির নিষ্ঠুর অভিপ্রায় স্মরণ করলেই তাঁর মন অস্থির ও ব্যাকুল হয়ে উঠত।

Verse 5

संस्मरन्‌ परुषा वाच: सूतपुत्रस्य पाण्डव: । निःश्वासपरमो दीनो बिभ्रत्‌ कोपविषं महत्‌,इसी चिन्तामें पड़े-पड़े राजा युधिष्ठिर रातमें सुखकी नींद नहीं सो पाते थे। ये बातें उनके हृदयमें चुभे हुए काँटोंके समान दुःख दिया करती थीं। जूआ खेलनेके कारणभूत शकुनि आदिकी दुष्टतापर दृष्टिपात करके तथा सूतपुत्र कर्णकी कठोर बातोंको स्मरण करके पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर दीनभावसे लंबी साँसें लेते रहते और महान्‌ क्रोधरूपी विषको अपने हृदयमें धारण करते थे

সারথিপুত্র কর্ণের কঠোর বাক্য স্মরণ করে পাণ্ডব যুধিষ্ঠির বিষণ্ণ হয়ে পড়তেন, ঘনঘন দীর্ঘশ্বাস ফেলতেন, আর অন্তরে ক্রোধরূপী মহাবিষ ধারণ করতেন।

Verse 6

अर्जुनों यमजौ चोभौ द्रौपदी च यशस्विनी । स च भीमो महातेजा: सर्वेषामुत्तमो बली

অর্জুন, দুই যমজ, যশস্বিনী দ্রৌপদী এবং মহাতেজস্বী ভীম—তাঁরা সকলেই তাদের মধ্যে শক্তিতে সর্বশ্রেষ্ঠ ছিলেন।

Verse 7

अवशिष्टमल्पकाल मन्वाना: पुरुषर्षभा:

বৈশম্পায়ন বললেন—অল্প সময়ই অবশিষ্ট, এই মনে করে সেই পুরুষশ্রেষ্ঠ, বৃষভসম বীরেরা মুহূর্তের তাড়না স্মরণে রেখে তদনুযায়ী দৃঢ় সংকল্প করল।

Verse 8

कस्यचित्‌ त्वथ कालस्य व्यास: सत्यवतीसुत:

বৈশম্পায়ন বললেন—কিছু কাল অতিবাহিত হলে সত্যবতীপুত্র ব্যাস সেখানে উপস্থিত হলেন।

Verse 9

आजगाम महायोगी पाण्डवानवलोकक: । तमागतमभिप्रेक्ष्य कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर:

মহাযোগী পাণ্ডবদের দর্শন করতে সেখানে এলেন। তাঁকে আসতে দেখে কুন্তীপুত্র যুধিষ্ঠির শ্রদ্ধাভরে তাঁর দিকে দৃষ্টি দিলেন।

Verse 10

प्रत्युद्गम्य महात्मान प्रत्यगृह्नाद्‌ यथाविधि । तदनन्तर किसी समय महायोगी सत्यवतीनन्दन व्यास पाण्डवोंको देखनेके लिये वहाँ आये। उन महात्माको आया देख कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर उनकी अगवानीके लिये कुछ दूर आगे बढ़ गये और विधिपूर्वक स्वागत-सत्कारके साथ उन्हें अपने साथ लिवा लाये ।। ८-९ >॥ तमासीनमुपासीन: शुश्रूषुर्नियतेन्द्रिय:

মহাত্মাকে অভ্যর্থনা করতে এগিয়ে গিয়ে যুধিষ্ঠির বিধিমতো তাঁকে গ্রহণ করলেন। তিনি আসনে উপবিষ্ট হলে যুধিষ্ঠিরও নিকটে বসে, ইন্দ্রিয়সংযমী হয়ে, সেবা ও শ্রবণে তৎপর রইলেন।

Verse 11

तानवेक्ष्य कृशान्‌ पौत्रान्‌ वने वन्‍्येन जीवत:

বনে বনজ আহারে জীবনধারণকারী নিজের পৌত্রদের কৃশদেহ দেখে (ব্যাসের হৃদয় দুঃখে আর্দ্র হল)।

Verse 12

युधिष्ठटिर महाबाहो शृणु धर्मभूतां वर,“धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महाबाहु युधिष्ठिर! मेरी बात सुनो, संसारमें जिन्होंने तपस्या नहीं की है, वे महान्‌ सुखकी उपलब्धि नहीं कर पाते हैं। मनुष्य बारी-बारीसे सुख और दुःख दोनोंका सेवन करता है

বৈশম্পায়ন বললেন— মহাবাহু, ধর্মাত্মাদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ যুধিষ্ঠির, আমার কথা শোনো। জগতে যারা তপস্যা ও সংযম করেনি, তারা মহাসুখ লাভ করতে পারে না। মানুষ কালের নিয়মে পর্যায়ক্রমে সুখ ও দুঃখ—উভয়ই ভোগ করে।

Verse 13

नातप्ततपसो लोके प्राप्रुवन्ति महासुखम्‌ | सुखदु:खे हि पुरुष: पर्यायेणोपसेवते,“धर्मात्माओंमें श्रेष्ठ महाबाहु युधिष्ठिर! मेरी बात सुनो, संसारमें जिन्होंने तपस्या नहीं की है, वे महान्‌ सुखकी उपलब्धि नहीं कर पाते हैं। मनुष्य बारी-बारीसे सुख और दुःख दोनोंका सेवन करता है

যারা তপস্যা করেনি, তারা এই জগতে মহাসুখ লাভ করে না। মানুষ পর্যায়ক্রমে সুখ ও দুঃখ—উভয়ই ভোগ করে।

Verse 14

& ॥ | [5 है £ | 80५, 204८ ॥/.%% (जज 00॥7₹ 7 ॥:20॥067//॥ 4 , है. ब् हि: 006५2 | ४: ३< न हानन्तं सुखं कक्षित्‌ प्राप्नोति पुरुषर्षभ । प्रज्ञावांस्त्वेव पुरुष: संयुक्त: परया घधिया

হে পুরুষশ্রেষ্ঠ! কেউই অবিরাম, অখণ্ড সুখ লাভ করে না। কিন্তু যিনি প্রজ্ঞাবান—পরম বিবেকসম্পন্ন—তিনি পরিবর্তমান ভাগ্যের মধ্যেও সংযত ও স্থির থাকেন।

Verse 15

सुखमापतितं सेवेद्‌ दुः:खमापतितं वहेत्‌

যে সুখ আপনা থেকেই আসে, তা গ্রহণ করে ভোগ করো; আর যে দুঃখ অযাচিতভাবে আসে, তা ধৈর্য ধরে বহন করো।

Verse 16

तपसो हि परं नास्ति तपसा विन्दते महत्‌

তপস্যার চেয়ে উচ্চতর কিছু নেই; তপস্যার দ্বারাই মানুষ মহৎ ফল লাভ করে।

Verse 17

सत्यमार्जवमक्रोध: संविभागो दम: शम:,“महाराज! सत्य, सरलता, क्रोधका अभाव, देवता और अतिथियोंको देकर अन्न आदि ग्रहण करना, इन्द्रियसंयम, मनोनिग्रह, दूसरोंके दोष न देखना, हिंसा न करना, बाहर- भीतरकी पवित्रता रखना तथा सम्पूर्ण इन्द्रियोंको काबूमें रखना--ये पुण्यात्मा पुरुषोंके सद्‌गुण सबको पवित्र करनेवाले हैं

বৈশম্পায়ন বললেন—মহারাজ! সত্য, সরলতা, ক্রোধহীনতা, দেবতা ও অতিথিকে অর্ঘ্য-অন্ন নিবেদন করে পরে অন্নাদি ভাগ করে গ্রহণ, ইন্দ্রিয়সংযম ও অন্তঃশান্তি—এগুলি পুণ্যবান নরদের পবিত্র গুণ; যা ব্যক্তি ও সমাজ উভয়কেই শুদ্ধ করে।

Verse 18

अनसूयाविहिंसा च शौचमिन्द्रियसंयम: । पावनानि महाराज नराणां पुण्यकर्मणाम्‌,“महाराज! सत्य, सरलता, क्रोधका अभाव, देवता और अतिथियोंको देकर अन्न आदि ग्रहण करना, इन्द्रियसंयम, मनोनिग्रह, दूसरोंके दोष न देखना, हिंसा न करना, बाहर- भीतरकी पवित्रता रखना तथा सम्पूर्ण इन्द्रियोंको काबूमें रखना--ये पुण्यात्मा पुरुषोंके सद्‌गुण सबको पवित्र करनेवाले हैं

বৈশম্পায়ন বললেন—মহারাজ! অনসূয়া (অন্যের গুণে দোষ না খোঁজা), অহিংসা, শৌচ (বাহ্য-অন্তঃপবিত্রতা) এবং ইন্দ্রিয়সংযম—এগুলি পুণ্যকর্মে নিবিষ্ট নরদের পবিত্রকারী গুণ।

Verse 19

अधर्मरुचयो मूढास्तिर्यग्गतिपरायणा: । कृच्छाां योनिमनुप्राप्ता न सुखं विन्दते जना:,“जो लोग अधर्ममें रुचि रखनेवाले हैं, वे मूढ़ मानव पशु-पक्षी आदि तिर्यग्‌-योनियोंमें जन्म ग्रहण करते हैं। उन कष्टदायक योनियोंमें पड़कर वे कभी सुख नहीं पाते हैं

বৈশম্পায়ন বললেন—যারা মোহগ্রস্ত হয়ে অধর্মে আসক্ত, তারা তির্যক্‌গতিরই অনুগামী হয়—পশু-পাখি প্রভৃতি নীচ যোনিতে জন্ম পায়। সেই কষ্টময় জন্মে পতিত হয়ে তারা সুখ লাভ করে না।

Verse 20

इह यत्‌ क्रियते कर्म तत्‌ परत्रोपयुज्यते । तस्माच्छरीरं युञज्जीत तपसा नियमेन च,“इस लोकमें जो कर्म किया जाता है, उसका फल परलोकमें भोगना पड़ता है। इसलिये अपने शरीरको तप और नियमोंके पालनमें लगावे

বৈশম্পায়ন বললেন—এই লোকেতে যে কর্ম করা হয়, তাই পরলোকে ফলদায়ক হয়। অতএব তপস্যা ও নিয়মপালনে দেহকে নিয়োজিত করা উচিত।

Verse 21

यथाशक्ति प्रयच्छेत सम्पूज्याभिप्रणम्य च । काले प्राप्ते च हृष्टात्मा राजन्‌ विगतमत्सर:,“राजन! समयपर यदि कोई अतिथि आ जाय तो क्रोधरहित और प्रसन्नचित्त होकर अपनी शक्तिके अनुसार उसे दान दे; और विधिवत्‌ पूजन करके उसे प्रणाम करे

বৈশম্পায়ন বললেন—রাজন! যথাসময়ে অতিথি এলে ঈর্ষা ও ক্রোধ ত্যাগ করে প্রফুল্লচিত্তে, সামর্থ্য অনুযায়ী দান কর; বিধিপূর্বক পূজা করে শ্রদ্ধায় প্রণাম কর।

Verse 22

सत्यवादी लभेतायुरनायासमथार्जवम्‌ | अक्रोधनो5नसूयश्न निर्वतिं लभते पराम्‌,'सत्यवादी मनुष्य दीर्घ आयु, क्लेशशून्यता (सुख) तथा सरलता प्राप्त करता है। जो क्रोध नहीं करता और दूसरोंके दोष नहीं देखता है, उसे परमानन्दपदकी प्राप्ति होती है

বৈশম্পায়ন বললেন— যে সত্যভাষী, সে দীর্ঘায়ু, ক্লেশহীন স্বস্তি ও সরলতা লাভ করে। যে ক্রোধমুক্ত এবং অন্যের দোষ অন্বেষণ করে না, সে পরম শান্তি ও পরিতৃপ্তি অর্জন করে।

Verse 23

दान्त: शमपर: शश्वत्‌ परिक्लेशं न विन्दति । न च तप्यति दान्तात्मा दृष्टवा परगतां श्रियम्‌,“जो सदा अपनी इन्द्रियोंकों संयममें रखकर मनका निग्रह करता है, उसे कभी क्लेशका सामना नहीं करना पड़ता। जिसने अपने मनको वशमें कर लिया है, वह दूसरोंकी सम्पत्तिको देखकर संतप्त नहीं होता है”

বৈশম্পায়ন বললেন— যে ইন্দ্রিয়সংযমী এবং সদা অন্তঃশান্তিতে নিবিষ্ট, সে বারবার ক্লেশে পতিত হয় না। যে মনকে বশ করেছে, সে অন্যের সমৃদ্ধি দেখে ঈর্ষায় দগ্ধ হয় না।

Verse 24

संविभक्ता च दाता च भोगवान्‌ सुखवान्‌ नर: । भवत्यहिंसकश्चैव परमारोग्यमश्चुते,“जो देवताओं और अतिथियोंको उनका भाग समर्पित करता है वह भोगसामग्रीसे सम्पन्न होता है। दान करनेवाला मनुष्य सुखी होता है। जो किसी भी प्राणीकी हिंसा नहीं करता उसे उत्तम आरोग्यकी प्राप्ति होती है

বৈশম্পায়ন বললেন— যে যথাযথ ভাগ বণ্টন করে—বিশেষত দেবতা ও অতিথিদের—অর্পণ করে, সে ভোগসামগ্রীতে সমৃদ্ধ হয়। দানশীল মানুষ সুখী থাকে। আর যে সকল প্রাণীর প্রতি অহিংস, সে সর্বোত্তম আরোগ্য লাভ করে।

Verse 25

मान्यमानयिता जन्म कुले महति विन्दति । व्यसनैर्न तु संयोगं प्राप्रोति विजितेन्द्रिय:,(विन्दते सुखमत्यन्तमिह लोके परत्र च ।) “जो माननीय पुरुषोंका सम्मान करता है वह महान्‌ कुलमें जन्म पाता है। जितेन्द्रिय पुरुष कभी दुर्व्यसनोंमें नहीं फँसता है। उसे इस लोक और परलोकमें भी अत्यन्त सुखकी प्राप्ति होती है

বৈশম্পায়ন বললেন— যে মান্যজনকে মান দেয়, সে মহৎ কুলে জন্ম লাভ করে। ইন্দ্রিয়জয়ী ব্যক্তি ব্যসন ও বিপদের সঙ্গ পায় না; সে ইহলোকে ও পরলোকে—উভয়ত্র—অত্যন্ত সুখ অর্জন করে।

Verse 26

शुभानुशयबुद्धिह्हि संयुक्त: कालधर्मणा । प्रादुर्भवति तद्योगात्‌ कल्याणमतिरेव स:,“जिसकी बुद्धि शुभमें ही आसक्त होती है, वह मनुष्य मृत्युको प्राप्त होनेपर उस शुभके संयोगसे कल्याणबुद्धि होकर ही उत्पन्न होता है”

বৈশম্পায়ন বললেন— যার বুদ্ধি শুভ সংস্কারে নিবদ্ধ থাকে, সে কালের ধর্মের সংযোগে—অর্থাৎ মৃত্যুকালে—সেই শুভ প্রবৃত্তির বলেই কল্যাণমতি হয়ে পুনরায় প্রকাশ পায়।

Verse 27

युधिछिर उवाच भगवन्‌ दानधर्माणां तपसो वा महामुने । किंस्विद्‌ बहुगुणं प्रेत्य कि वा दुष्करमुच्यते,युधिष्ठिरने पूछा--भगवन्‌! महामुने! दानधर्म एवं तपस्या--इनमेंसे किसका फल परलोकमें अधिक माना गया है? और इन दोनोंमें कौन दुष्कर बताया जाता है

যুধিষ্ঠির বললেন— ভগবন্, মহামুনি! দানধর্ম ও তপস্যা—এই দুইয়ের মধ্যে পরলোকে কার ফল অধিক গণ্য হয়? আর এদের মধ্যে কোনটি অধিক দুষ্কর বলা হয়?

Verse 28

व्यास उवाच दानान्न दुष्करं तात पृथिव्यामस्ति किंचन | अर्थ च महती तृष्णा स च दुःखेन लभ्यते,व्यासजीने कहा--तात! दानसे बढ़कर दुष्कर कार्य इस पृथ्वीपर दूसरा कोई नहीं है। लोगोंको धनका लोभ अधिक होता है और धन मिलता भी बड़े कष्टसे है

ব্যাস বললেন— বৎস! এই পৃথিবীতে দানের চেয়ে দুষ্কর আর কিছু নেই। ধনের প্রতি মানুষের তৃষ্ণা অত্যন্ত প্রবল, আর ধনও কষ্ট করেই অর্জিত হয়।

Verse 29

परित्यज्य प्रियान्‌ प्राणाम्‌ धनार्थ हि महामते । प्रविशन्ति नरा वीरा: समुद्रमटवीं तथा,महामते! कितने ही साहसी मनुष्य रत्नोंके लिये अपने प्यारे प्राणोंका मोह छोड़कर समुद्रमें गोते लगाते हैं और धनके लिये घोर जंगलोंमें भटकते फिरते हैं

ব্যাস বললেন— হে মহামতে! ধনের জন্য মানুষ প্রিয় প্রাণের মমতাও ত্যাগ করে। কতক বীর সমুদ্রে ঝাঁপ দেয়, আর কতক লাভের আশায় ভয়ংকর অরণ্যে ঘুরে বেড়ায়।

Verse 30

कृषिगोरक्ष्यमित्येके प्रतिपद्यन्ति मानवा: । पुरुषा: प्रेष्पतामेके निर्गच्छन्ति धनार्थिन:,कुछ मनुष्य कृषि तथा गोरक्षाको अपनी जीविकाका साधन बनाते हैं, कुछ लोग धनकी इच्छासे नौकरी करनेके लिये दूर निकल जाते हैं

ব্যাস বললেন— কেউ কৃষিকাজ ও গোরক্ষা অবলম্বন করে জীবিকা নির্বাহ করে; আর কেউ ধনের আকাঙ্ক্ষায় পরের অধীনে চাকরিতে যোগ দিতে দূরে চলে যায়।

Verse 31

तस्माद्‌ दु:खार्जितस्यैव परित्याग: सुदुष्कर: । न दुष्करतरं दानात्‌ तस्माद्‌ दान॑ मतं मम,अतः दुःख सहकर कमाये हुए धनका परित्याग करना अत्यन्त कठिन है। दानसे बढ़कर दूसरा कोई दुष्कर कार्य नहीं है। इसलिये मेरे मतमें दान ही सर्वश्रेष्ठ है

অতএব কষ্ট করে অর্জিত ধন ত্যাগ করা অত্যন্ত দুষ্কর। দানের চেয়ে দুষ্কর আর কিছু নেই; তাই আমার মতে দানই শ্রেষ্ঠ।

Verse 32

विशेषस्त्वत्र विज्ञेयो न्यायेनोपार्जितं धनम्‌ | पात्रे काले च देशे च साधुभ्य: प्रतिपादयेत्‌,यहाँ विशेष बात यह जाननी चाहिये कि मनुष्य न्यायसे कमाये गये धनको उत्तम देश, काल और पात्रका विचार करते हुए श्रेष्ठ पुरुषोंको दे

এখানে একটি বিশেষ কথা জেনে রাখা উচিত—ন্যায়পথে অর্জিত ধনই, পাত্রের যোগ্যতা এবং যথোচিত দেশ-কাল বিবেচনা করে, সাধু ও সজ্জনদের দান করা কর্তব্য।

Verse 33

अन्यायात्‌ समुपात्तेन दानधर्मो धनेन यः । क्रियते न स कर्तरिं त्रायते महतो भयात्‌,अन्यायसे प्राप्त किये हुए धनके द्वारा जो दानधर्म किया जाता है वह कर्ताकी महान्‌ भयसे रक्षा नहीं कर पाता

অন্যায়ে অর্জিত ধন দিয়ে যে দান-ধর্ম করা হয়, তা দাতাকে মহাভয় থেকে রক্ষা করতে পারে না।

Verse 34

पात्रे दानं स्वल्पमपि काले दत्तं युधिष्ठिर मनसा हि विशुद्धेन प्रेत्यानन्तफलं स्मृतम्‌,युधिष्ठिर! यदि विशुद्ध मनसे उत्तम समयपर सत्पात्रको थोड़ा-सा भी दान दिया गया हो तो वह परलोकमें अनन्त फल देनेवाला माना गया है

হে যুধিষ্ঠির, বিশুদ্ধ মনে যথোচিত সময়ে যোগ্য পাত্রকে অল্প দানও দিলে, মৃত্যুর পরে তা অনন্ত ফলদায়ক বলে স্মৃত হয়েছে।

Verse 35

अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्‌ । ब्रीहिद्रोणपरित्यागाद्‌ यत्‌ फलं प्राप मुदूगल:,इस विषयमें जानकार लोग इस पुराने इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं कि मुद्गल ऋषिने एक द्रोण धानका दान करके महान्‌ फल प्राप्त किया था

এ বিষয়েও জ্ঞানীরা এক প্রাচীন ইতিবৃত্ত উদাহরণ দেন—এক দ्रोণ ধান ত্যাগ করে মুদূগল ঋষি মহৎ ফল লাভ করেছিলেন।

Verse 66

युधिष्ठिरमुदी क्षन्तः सेहुर्दु:खमनुत्तमम्‌ । अर्जुन, दोनों भाई नकुल-सहदेव, यशस्विनी द्रौपदी तथा सर्वश्रेष्ठ बलवान्‌ महातेजस्वी भीमसेन भी राजा युधिष्ठिरकी ओर देखते हुए महान्‌-से-महान्‌ दुःखको चुपचाप सहते रहे

রাজা যুধিষ্ঠিরের দিকে দৃষ্টি স্থির রেখে তারা অতুল দুঃখ সহ্য করল। অর্জুন, দুই ভাই নকুল-সহদেব, যশস্বিনী দ্রৌপদী এবং শ্রেষ্ঠ পুরুষ বলবান্ মহাতেজস্বী ভীমসেন—সকলেই নীরবে মহাদুঃখ বহন করল।

Verse 76

वपुरन्यदिवाकार्षुरुत्साहामर्षचेष्टितै: । “अब तो वनवासका थोड़ा-सा ही समय शेष रह गया है, ऐसा समझकर नरश्रेष्ठ पाण्डवोंने उत्साह एवं अमर्षयुक्त चेष्टाओंसे अपने शरीरको किसी और ही प्रकारका बना लिया था

বনবাসের অল্পই কাল অবশিষ্ট—এ কথা বুঝে নরশ্রেষ্ঠ পাণ্ডবেরা নবউৎসাহ ও ধর্মসম্মত ক্রোধে উদ্দীপ্ত কর্মে নিজেদের দেহকে যেন অন্যরূপে রূপান্তরিত করলেন; তারা সম্পূর্ণ ভিন্ন বলেই প্রতীয়মান হলেন।

Verse 103

तोषयन्‌ प्रणिपातेन व्यासं पाण्डवनन्दन: । जब वे आसनपर बैठ गये तब पाण्डवोंका आनन्द बढ़ानेवाले युधिष्ठिर अपनी इन्द्रियोंको संयममें रखते हुए सेवाकी इच्छासे व्यासजीके पास ही बैठ गये और उनके चरणोंमें प्रणाम करके उन्होंने महर्षिको संतुष्ट किया

সকলেই আসনে উপবিষ্ট হলে পাণ্ডবদের আনন্দবর্ধক যুধিষ্ঠির ইন্দ্রিয়সংযম করে সেবাভাবে ব্যাসের নিকটে বসে মহর্ষির চরণে প্রণাম করলেন; তাতে ব্যাস সন্তুষ্ট হলেন।

Verse 116

महर्षिरनुकम्पार्थमब्रवीद्‌ बाष्पगद्गदम्‌ | अपने पौत्रोंको वनवासके कष्टसे दुर्बल तथा जंगली फल-मूल खाकर जीवननिर्वाह करते देख महर्षि व्यासको बड़ी दया आयी। वे उनपर कृपा करनेके लिये नेत्रोंसे आँसू बहाते हुए गदगद कण्ठसे बोले--

বনবাসের কষ্টে দুর্বল হয়ে বন্য ফলমূল খেয়ে জীবনধারণকারী নিজের পৌত্রদের দেখে মহর্ষি ব্যাস করুণায় অভিভূত হলেন। অনুকম্পা প্রদর্শনের জন্য তিনি অশ্রুসিক্ত নয়নে গদ্গদ কণ্ঠে বললেন।

Verse 146

उदयास्तमनज्ञो हि न हृष्पति न शोचति । “नरश्रेष्ठी कोई भी इस जगत्‌में ऐसा सुख नहीं पाता, जिसका कभी अन्त न हो। उत्तम बुद्धिसे युक्त ज्ञानवान्‌ पुरुष ही उत्पत्ति, स्थिति और लयके अधिष्ठानरूप परमात्माको जानकर कभी हर्ष और शोक नहीं करता है

উদয়-অস্ত না জানা ব্যক্তি না হর্ষিত হয়, না শোক করে। কারণ, হে নরশ্রেষ্ঠ, এ জগতে কেউই এমন সুখ পায় না যার কখনও শেষ নেই। কিন্তু সূক্ষ্ম বুদ্ধিসম্পন্ন জ্ঞানী পুরুষ উৎপত্তি, স্থিতি ও লয়ের অধিষ্ঠানস্বরূপ পরমাত্মাকে জেনে হর্ষ-শোক উভয় থেকেই মুক্ত থাকে।

Verse 153

कालप्राप्तमुपासीत सस्यानामिव कर्षक: । “अतः विवेकी पुरुषको उचित है कि प्राप्त हुए सुखका (त्यागपूर्वक) सेवन करे और स्वतः आये हुए दुःखका भार भी (टैर्यपूर्वक) वहन करे। जैसे किसान बीज बोकर समयके अनुसार प्रारब्धवश जितना अन्न मिलता है, उसे ग्रहण करता है; उसी प्रकार मनुष्य समय- समयपर दैववश प्राप्त हुए सुख तथा दुःखको स्वीकार करें

অতএব বিবেকী পুরুষের উচিত—যে সুখ আসে তা আসক্তিহীনভাবে গ্রহণ করে ভোগ করা, আর যে দুঃখ নিজে থেকেই আসে তার ভার ধৈর্যে বহন করা। যেমন কৃষক বীজ বপন করে ঋতুক্রমে দैববশত যত শস্য পাকে ততই গ্রহণ করে; তেমনি মানুষও সময়ে সময়ে ভাগ্যবশত প্রাপ্ত সুখ-দুঃখ উভয়ই স্বীকার করুক।

Verse 166

नासाध्यं तपस: किंचिदिति बुद्धयस्व भारत । “भारत! तपसे बढ़कर दूसरा कोई साधन नहीं है। तपसे मनुष्य महत्पद (परमात्मा)-को प्राप्त कर लेता है। तुम इस बातको अच्छी तरह जान लो कि तपस्यासे कुछ भी असाध्य नहीं है

বৈশম্পায়ন বললেন—হে ভারত, এ কথা ভালো করে জেনে রাখো: তপস্যার দ্বারা অসাধ্য বলে কিছু নেই। তপই পরম উপায়; তপস্যার বলেই মানুষ সর্বোচ্চ অবস্থায় পৌঁছায়।

Verse 259

इति श्रीमहा भारते वनपर्वणि व्रीहिद्रौणिकपर्वणि दानदुष्करत्वक थने एकोनषष्ट्यधिकद्विशततमो<ध्याय:

এইভাবে শ্রীমহাভারতের বনপর্বের অন্তর্গত ব্রীহিদ্রৌণিক উপপর্বে দানের দুষ্করতা বিষয়ক বর্ণনা-সমাপ্তি ঘটল; এটি দুইশো ঊনষাটতম (২৫৯তম) অধ্যায়।

Frequently Asked Questions

The problem is how to stop a powerful aggressor protected by a boon without violating the constraints that make direct defeat infeasible; the chapter frames a rule-aware solution through incarnation and alliance-building rather than unrestricted force.

The text models governance as multi-layered causality: cosmic order responds to disorder through authorized, proportionate mechanisms—delegation, embodiment, and the creation of enabling conditions—highlighting that efficacy operates within normative limits.

No explicit phalaśruti appears in this excerpted chapter; its meta-function is etiological and explanatory, situating later events within a broader causal architecture rather than promising a stated recitational benefit.