
Dharma-vyādha’s Analysis of Moral Decline and the Mahābhūta–Guṇa Schema (धर्मव्याधोपदेशः)
Upa-parva: Dharma-vyādha Upākhyāna (The Narrative of the Righteous Hunter-Butcher)
Mārkaṇḍeya introduces the continuation of the dharma-vyādha’s instruction to Yudhiṣṭhira. The vyādha outlines a causal chain in human cognition: mind first engages objects for ‘knowing,’ then attachment forms, followed by desire and anger. From repeated pursuit of pleasing forms and scents arises rāga (attraction) and then dveṣa (aversion), which mature into lobha (greed) and moha (delusion). Under these pressures, one loses clear judgment about dharma, performing ‘righteous’ acts as pretexts (vyāja) for gain; even when restrained by friends and learned persons, the person rationalizes wrongdoing with scriptural-sounding replies. Adharma expands in thought, speech, and action; virtues decay and the person gravitates toward similarly disposed companions, resulting in suffering here and harm beyond. The vyādha then presents the corrective: early recognition of faults through prajñā, skillful composure in pleasure and pain, and service to the virtuous—through which dharmic understanding arises. A brāhmaṇa praises the teaching, calling the speaker rishi-like. The vyādha affirms honoring brāhmaṇas and proceeds to a compact metaphysical account: the five great elements and their qualities, the emergence of mind (manas), intellect (buddhi), ego (ahaṃkāra), the senses, and the three guṇas—summarized as a structured tally culminating in a ‘twenty-four’ analytic frame, before inviting further questions.
Chapter Arc: वनवास में धर्म-जिज्ञासा से उद्वेलित पाण्डुनन्दन (युधिष्ठिर) महर्षि मार्कण्डेय से पूछते हैं—दान किस अवस्था में, किसे, किस प्रकार दिया जाए कि फल शुद्ध और अक्षय हो; और कौन-सा दान निन्दित होकर दाता को ही गिरा देता है। → मार्कण्डेय दान के सूक्ष्म विधान खोलते हैं—निन्दित दान, निन्दित जन्म/अयोग्य पात्र, श्राद्ध में ग्राह्य-अग्राह्य ब्राह्मण, दानपात्र के लक्षण, तथा दान के साथ शौच (वाक्-शौच, कर्म-शौच, जल-शौच) की अनिवार्यता। वे बताते हैं कि दान केवल वस्तु नहीं, दाता की नीयत, पात्र की योग्यता और विधि की शुद्धि का संयुक्त संस्कार है। → उपदेश का शिखर तब आता है जब ऋषि ‘शौच’ को स्वर्ग-मार्ग का निर्णायक घोषित करते हैं—तीन प्रकार के शौच से युक्त व्यक्ति के लिए स्वर्ग निश्चित है; और जो दान/कर्म में अशुद्ध, कपटी या अयोग्य-पात्र-सेवी है, उसे भयावह परिणाम (राक्षसी यातना, दुर्गम शून्य-आकाश-सा मार्ग, श्राद्ध-विधि का विघटन) भोगना पड़ता है। → अध्याय दान के सकारात्मक फल-चित्रों से स्थिर होता है—विशुद्ध सुवर्ण, छत्र, अश्व आदि उत्तम दानों से लोक-प्राप्ति, पथिक-विश्राम, आतप-निवारण जैसे लोकहितकारी दानों की प्रशंसा; साथ ही उपवास/नियमों के फल और इन्द्रिय-त्याग की कठिनता का विवेचन कर यह निष्कर्ष कि धर्म का सार ‘शुद्धि + करुणा + योग्य-पात्र’ है। → युधिष्ठिर के मन में यह प्रश्न शेष रह जाता है कि जब पात्र-निर्णय और विधि इतनी सूक्ष्म है, तब संकट-काल में त्वरित दान/श्राद्ध करते समय त्रुटि से कैसे बचा जाए—और आगे के उपदेश की भूमि बनती है।
Verse 1
#:73:.8 #:23:.7 () हि 2 7 द्विशततमो<्ध्याय: निन्दित दान
বৈশম্পায়ন বললেন—তখন সেই রাজা মহাভাগ্যবান মর্কণ্ডেয়ের মুখে রাজর্ষি ইন্দ্রদ্যুম্নের স্বর্গপ্রাপ্তির বৃত্তান্ত শুনে তার মর্মার্থ নিয়ে চিন্তা করলেন।
Verse 2
कीदृशीषु हावस्थासु दत्त्वा दानं महामुने
হে মহামুনি! কোন কোন অবস্থা ও পরিস্থিতিতে দান দিলে তা সত্যই পুণ্যদায়ক বলে গণ্য হয়?
Verse 3
गार्हस्थ्ये5प्यथवा बाल्ये यौवने स्थविरे5पि वा । यथा फलं समश्नाति तथा त्वं कथयस्व मे,“मनुष्य बाल्यावस्था या गृहस्थाश्रममें, जवानीमें अथवा बुढ़ापेमें दान देनेसे जैसा फल पाता है, उसका मुझसे वर्णन कीजिये”
গার্হস্থ্যে, কিংবা বাল্যকালে, যৌবনে অথবা বার্ধক্যেও—মানুষ দানের ফল যেমন ভোগ করে, তেমনই আমাকে বলুন; তার যথার্থ ফল বর্ণনা করুন।
Verse 4
मार्कण्डेय उवाच वृथा जन्मानि चत्वारि वृथा दानानि षोडश । वृथा जन्म ह्[पुत्रस्य ये च धर्मबहिष्कृता:
মার্কণ্ডেয় বললেন—চার প্রকার জন্ম বৃথা, আর ষোলো প্রকার দান বৃথা। পুত্রহীন ব্যক্তির জন্ম বৃথা; আর যারা ধর্ম থেকে বহিষ্কৃত, তাদের জন্মও বৃথা।
Verse 5
परपाकेषु ये5श्रन्ति आत्मार्थ च पचेत् तु यः । पर्यश्नन्ति वृथा ये च तदसत्यं प्रकीर्त्यते
যারা পরের রান্নাঘরে পরিশ্রম করে, আর যে কেবল নিজের জন্যই রান্না করে; এবং যারা বিধি-নিয়ম না মেনে বৃথাই ভোজন করে—এমন আচরণকে ‘অসৎ’ বলা হয়।
Verse 6
आरूढपतिते दत्तमन्यायोपहृतं च यत् । व्यर्थ तु पतिते दान॑ ब्राह्मणे तस्करे तथा
যে উচ্চতর আশ্রম-ধর্ম গ্রহণ করে পরে পতিত হয়েছে, সেই ‘আরূঢ়-পতিত’কে দেওয়া দান নিষ্ফল; অন্যায়ে অর্জিত ধন থেকে দেওয়া দানও নিষ্ফল। পতিত ব্রাহ্মণ ও চোরকে দেওয়া দানও বৃথা।
Verse 7
गुरौ चानृतिके पापे कृतघ्ने ग्रामयाजके । वेदविक्रयिणे दत्तं तथा वृषलयाजके
যে গুরু প্রতারক, পাপী ও অসত্যবাদী; যে কৃতঘ্ন; যে গ্রামযাজক (লোভে যজ্ঞকর্ম করে); যে বেদের বিক্রেতা; এবং যে বৃষলযাজক (বৃষলদের জন্য যাজন করে)—এদেরকে দেওয়া দান শুদ্ধ ফল দেয় না।
Verse 8
ब्रह्मबन्धुषु यद् दत्तं यद् दत्तं वृषलीपतौ । स्त्रीजनेषु च यद् दत्तं व्यालग्राहे तथैव च
মার্কণ্ডেয় বললেন—যে দান কেবল নামমাত্র ব্রাহ্মণ (ব্রহ্মবন্ধু)-কে দেওয়া হয়, যে দান নীচজাত নারীর স্বামীকে দেওয়া হয়, যে দান বিচারবিবেচনা না করে নারীসমষ্টিকে দেওয়া হয়, এবং যে দান কোনো হিংস্র জন্তুর কবলে পড়ে দেওয়া হয়—এ সকল দান বিবেচনাহীন বলে দোষযুক্ত গণ্য হয়।
Verse 9
परिचारकेषु यद् दत्तं वृथा दानानि षोडश । पिता आदि गुरुजन
মার্কণ্ডেয় বললেন—কিছু অপাত্রকে দেওয়া দান নিষ্ফল হয়; এমন ‘ব্যর্থ দান’ ষোলো প্রকার বলা হয়েছে। আর যে ব্যক্তি তমোগুণে আচ্ছন্ন হয়ে ভয় বা ক্রোধ থেকে দান করে, সে সেই দানের ফল ভবিষ্যৎ জন্মে দুঃখরূপে (এমনকি গর্ভাবস্থাতেও) ভোগ করে। কিন্তু যে যোগ্য, শ্রেষ্ঠ ব্রাহ্মণকে দান করে, সে দানের পরিমাণ অনুসারে তার ফল ভোগ করে।
Verse 10
भुदुक्ते च दानं तत् सर्व गर्भस्थस्तु नर: सदा । ददद् दान द्विजातिभ्यो वृद्धभावेन मानव:
মার্কণ্ডেয় বললেন—ভয়, অস্থিরতা, অন্ধকারাচ্ছন্ন চিত্ত বা ক্রোধ থেকে যে দান করা হয়, তার সম্পূর্ণ ফল মানুষ ভবিষ্যৎ জন্মে গর্ভস্থ অবস্থাতেই ভোগ করে—অর্থাৎ তামস দান দুঃখরূপে পরিণত হয়। কিন্তু যে ব্যক্তি পরিণত শ্রদ্ধাভাবে দ্বিজদের (যোগ্য ব্রাহ্মণদের) দান করে, সে সেই দানের ফল অধিক ও যথাযথভাবে ভোগ করে।
Verse 11
राजन! इसीलिये मनुष्यको चाहिये कि वह स्वर्ग-मार्गपर अधिकार पानेकी इच्छासे सभी अवस्थाओंमें (श्रेष्ठ) ब्राह्मणोंको ही सब प्रकारके दान दे
মার্কণ্ডেয় বললেন—হে রাজন! অতএব যে ব্যক্তি স্বর্গমার্গে অধিকার কামনা করে, তাকে জীবনের সর্বাবস্থায় সকল প্রকার দান কেবল শ্রেষ্ঠ, যোগ্য ব্রাহ্মণদেরই দেওয়া উচিত।
Verse 12
युधिछिर उवाच चातुर्वर्ण्यस्य सर्वस्य वर्तमाना: प्रतिग्रहे । केन विप्रा विशेषेण तारयन्ति तरन्ति च
যুধিষ্ঠির বললেন—হে মহামুনি! যে ব্রাহ্মণরা চার বর্ণের সকলের কাছ থেকে দান গ্রহণ করেন, তারা কোন বিশেষ ধর্ম বা শৃঙ্খলা পালন করে অন্যদের উদ্ধার করেন এবং নিজেরাও পার হন?
Verse 13
तस्मात् सर्वास्ववस्थासु सर्वदानानि पार्थिव | दातव्यानि द्विजातिभ्य: स्वर्गमार्गजिगीषया
মার্কণ্ডেয় বললেন—অতএব, হে রাজন, জীবনের সর্বাবস্থায় ও সর্বদা, স্বর্গপথ জয় করতে ইচ্ছুক ব্যক্তির উচিত দ্বিজদের দান করা। জপ, মন্ত্রোচ্চারণ, হোম, স্বাধ্যায় ও বেদাধ্যয়নের দ্বারা ব্রাহ্মণেরা ‘বেদময় নৌকা’ নির্মাণ করেন; সেই নৌকায় তারা অন্যদেরও পার করান এবং নিজেরাও পার হন।
Verse 14
ब्राह्मणांस्तोषयेद् यस्तु तुष्यन्ते तस्य देवता: । वचनाच्चापि विप्राणां स्वर्गलोकमवाप्लनुयात्
মার্কণ্ডেয় বললেন—যে ব্রাহ্মণদের সন্তুষ্ট করে, তার প্রতি দেবতাগণও সন্তুষ্ট হন। আর ব্রাহ্মণদের বাক্য—অর্থাৎ তাঁদের আশীর্বাদ—দ্বারা মানুষ স্বর্গলোক লাভ করতে পারে।
Verse 15
पितृदैवतपूजाभिर््राह्यिणाभ्यर्चनेन च । अनन्तं पुण्यलोकं तु गन्तासि त्वं न संशय:,राजन! तुम पितरों और देवताओंकी पूजासे तथा ब्राह्मणोंका आदर-सत्कार करनेसे अक्षय पुण्यलोकमें जाओगे, इसमें संशय नहीं है
মার্কণ্ডেয় বললেন—হে রাজন, পিতৃগণ ও দেবতাদের পূজা এবং ব্রাহ্মণদের সম্মান-সেবা দ্বারা তুমি নিঃসন্দেহে অনন্ত, অক্ষয় পুণ্যলোক লাভ করবে।
Verse 16
युधिष्ठिरो महाराज पुन: पप्रच्छ तं॑ मुनिम् । वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! महाभाग मार्कण्डेयजीके मुखसे राजर्षि इन्द्रद्युम्नको पुनः स्वर्गकी प्राप्तिका वृत्तान्त सुनकर राजा युधिष्ठिरने उन मुनीश्वरसे फिर प्रश्न किया
বৈশম্পায়ন বললেন—ভগবান মার্কণ্ডেয়ের মুখে রাজর্ষি ইন্দ্রদ্যুম্নের পুনরায় স্বর্গপ্রাপ্তির বৃত্তান্ত শুনে মহারাজ যুধিষ্ঠির আবার সেই মুনিকে জিজ্ঞাসা করলেন—“যার দেহ কফ প্রভৃতি দোষে আচ্ছন্ন, যে মরণাপন্ন ও অচেতন—তবু যদি সে পুণ্যময় স্বর্গলোক কামনা করে, তবে কি তার উচিত ব্রাহ্মণদের যথাবিধি পূজা করা?”
Verse 17
श्राद्धकाले तु यत्नेन भोक्तव्या हाजुगुप्सिता: । दुर्वर्गः कुनखी कुछी मायावी कुण्डगोलकी
মার্কণ্ডেয় বললেন—শ্রাদ্ধকালে যত্ন করে কেবল অনিন্দ্য ব্যক্তিদেরই ভোজন করানো উচিত। যারা দুর্বৃত্ত, যাদের নখ রোগাক্রান্ত, যারা ঘৃণ্য রোগে পীড়িত, যারা ছলনাকারী-ধূর্ত, এবং যাদের জন্ম নিন্দিত—তাদের শ্রাদ্ধে পরিহার করা উচিত। কারণ অযোগ্য পাত্রকে দিয়ে সম্পন্ন শ্রাদ্ধ নিন্দিত হয়, আর নিন্দিত শ্রাদ্ধ যজমানকে তেমনি ক্ষতি করে যেমন অগ্নি শুকনো কাঠ ভস্ম করে।
Verse 18
वर्जनीया: प्रयत्नेन काण्डपृष्ठाश्न देहिनः । जुगुप्सितं हि यच्छाद्धं दहत्यग्निरिवेन्धनम्
শ্রাদ্ধকর্মে যত্নসহকারে তাদের বর্জন করা উচিত, যারা নীচ ও অপবিত্র উপায়ে জীবিকা নির্বাহ করে—যারা ভাঙা পাত্রের পিঠে লেগে থাকা উচ্ছিষ্টসদৃশ অবশিষ্ট ভক্ষণ করে। কারণ নিন্দিত শ্রাদ্ধ ঘৃণ্য হয়ে যজমানকে ঠিক যেমন অগ্নি ইন্ধন দগ্ধ করে, তেমনই বিনাশ করে।
Verse 19
ये ये श्राद्धे न युज्यन्ते मूकान्धवधिरादय: । तेडपि सर्वे नियोक्तव्या मिश्रिता वेदपारगै:
শ্রাদ্ধে যাদের অযোগ্য বলা হয়েছে—যেমন মূক, অন্ধ, বধির প্রভৃতি—তাদের সকলকেই বেদপारগ ব্রাহ্মণদের সঙ্গে মিশিয়ে বসালে শ্রাদ্ধে নিয়োজিত করা যেতে পারে।
Verse 20
प्रतिग्रहश्च वै देय: शृणु यस्य युधिष्ठिर । प्रदातारं तथा55त्मानं यस्तारयति शक्तिमान्
হে যুধিষ্ঠির, শোনো—দান গ্রহণও ধর্মরূপে করণীয়। কেবল সেই সক্ষম দাতার কাছ থেকেই গ্রহণ করা উচিত, যার দান দাতাকেও এবং গ্রহণকারীকেও উদ্ধার করতে পারে।
Verse 21
तस्मिन् देयं द्विजे दानं सर्वागमविजानता । प्रदातारं यथा55त्मानं तारयेद् यः स शक्तिमान्
অতএব যিনি সকল শাস্ত্রের মর্ম জানেন, তিনি সেই দ্বিজকে দান দিন, যে দাতাকেও এবং নিজেকেও সংসার-সাগর থেকে পার করাতে সক্ষম; সেই ব্রাহ্মণই প্রকৃতপক্ষে শক্তিমান।
Verse 22
न तथा हविषो होमैर्न पुष्पैननिलेपनै: । अग्नय: पार्थ तुष्यन्ति यथा हृतिथिभोजने
হে পার্থ, কুন্তীপুত্র! অগ্নিদেব হব্যের হোমে, পুষ্পে বা সুগন্ধি লেপনে ততটা তুষ্ট হন না, যতটা হন আনন্দচিত্তে অতিথিদের ভোজন করালে।
Verse 23
तस्मात् त्वं सर्वयत्नेन यतस्वातिथिभोजने । पादोदकं पादघृतं दीपमन्न॑ प्रतिश्रयम्
অতএব সর্বপ্রযত্নে অতিথিদের সৎকার ও ভোজন করাও। পাদপ্রক্ষালনের জল, পাদে লেপনের ঘৃত/উপলেপ, দীপ, অন্ন এবং যথোচিত আশ্রয়—এই সবই ধর্মরক্ষাকারী আচরণ।
Verse 24
देवमाल्यापनयन द्विजोच्छिष्टावमार्जनम्
মার্কণ্ডেয় বললেন—হে নৃপশ্রেষ্ঠ! দেববিগ্রহে অর্পিত চন্দন-পুষ্পাদি যথাসময়ে অপসারণ করা, ব্রাহ্মণদের ভোজনোত্তর অবশিষ্ট পরিষ্কার করা, তাদের চন্দন-হারাদি দিয়ে অলংকৃত করা, তাদের সেবা-पूজা করা এবং পা ও অঙ্গ মর্দন করা—এই প্রতিটি কর্মই একাই গোদান অপেক্ষা অধিক পুণ্যদায়ক।
Verse 25
आकल्प: परिचर्या च गात्रसंवाहनानि च । अन्नैकैकं नृपश्रेष्ठ गोदानाद्धयतिरिच्यते
মার্কণ্ডেয় বললেন—হে নৃপশ্রেষ্ঠ! যথোচিত উপচার, নিবিড় পরিচর্যা, অঙ্গ-সংবাহন—এমন এক-একটি বিনীত সেবাকর্মও গোদান অপেক্ষা অধিক ফলদায়ক।
Verse 26
इन्द्रलोक॑ त्वनुभवेत् पुरुषस्तद् ब्रवीहि मे । “महामुने! किन अवस्थाओंमें दान देकर मनुष्य इन्द्रलोकका सुख भोगता है? यह मुझे बतानेकी कृपा करें”
বৈশম্পায়ন বললেন—আমাকে বলুন, কোন দানে মানুষ ইন্দ্রলোকের সুখ ভোগ করে? কপিলা গাভী দান করলে নিঃসন্দেহে পাপমুক্তি হয়; অতএব কপিলা গাভীকে অলংকৃত করে দ্বিজ (ব্রাহ্মণ)কে দান করা উচিত।
Verse 27
श्रोत्रियाय दरिद्राय गृहस्थायाग्निहोत्रिणे | पुत्रदाराभिभूताय तथा हानुपकारिणे
মার্কণ্ডেয় বললেন—দান দেওয়া উচিত সেই ব্রাহ্মণকে, যিনি শ्रोত্রিয় (বেদজ্ঞ) ও দরিদ্র, গৃহস্থ হয়ে নিত্য অগ্নিহোত্র পালন করেন; যিনি পুত্র-দারার ভারে ক্লিষ্ট এবং দারিদ্র্যের কারণে তাদের তিরস্কার সহ্য করেন; এবং যার কাছ থেকে দাতা কোনো প্রতিদান পায়নি, ভবিষ্যতেও পাওয়ার আশা নেই।
Verse 28
एवंविधेषु दातव्या न समृद्धेषु भारत । को गुणो भरतश्रेष्ठ समृद्धेष्वभिवर्जितम्,भारत! ऐसे ही लोगोंको गोदान करना चाहिये, धनवानोंको नहीं। भरतश्रेष्ठ! धनवानोंको देनेसे क्या लाभ है?
হে ভারত! এইরূপ লোকদেরই দান দেওয়া উচিত, সমৃদ্ধদের নয়। হে ভরতশ্রেষ্ঠ! যাদের কোনো অভাব নেই, সেই ধনীদের দান করলে কী পুণ্যফল হয়?
Verse 29
एकस्यैका प्रदातव्या न बहूनां कदाचन | सा गौर्विक्रयमापन्ना हन्यात् त्रिपुरुषं कुलम्
একটি গাভী কেবল একজন যোগ্য পাত্রকেই দান করা উচিত, কখনও বহুজনকে নয়। দানের পর যদি সেই গাভী বিক্রয়ের বস্তু হয়, তবে সে তিন পুরুষ পর্যন্ত বংশকে বিনাশ করতে পারে।
Verse 30
सुवर्णस्य विशुद्धस्य सुवर्ण य: प्रयच्छति
যে কেউ বিশুদ্ধ, পরিশোধিত স্বর্ণ দান করে, সে মহাপুণ্যের অধিকারী হয়।
Verse 31
अनड्वाहं तु यो दद्याद् बलवन्तं धुरंधरम्
যে কেউ বলবান, জোয়াল বহনে সক্ষম ধুরন্ধর বলদ দান করে, সে মহাপুণ্য অর্জন করে।
Verse 32
वसुन्धरां तु यो दद्याद् द्विजाय विदुरात्मने
যে কেউ বিবেকবান, সংযতচিত্ত যোগ্য দ্বিজ (ব্রাহ্মণ)-কে বসুন্ধরা—ভূমি ও তার ঐশ্বর্য—দান করে…
Verse 33
पृच्छन्ति चात्र दातारं वदन्ति पुरुषा भुवि
এই পৃথিবীতে মানুষ দাতার কথা জিজ্ঞাসা করে এবং যিনি দান করেন তাঁর প্রশংসা করে; আর যে ব্যক্তি খাদ্য পাওয়ার পথ বা স্থান দেখিয়ে দেয়, সেও অন্নদাতার সমানই প্রশংসিত হয়—এতে সন্দেহ নেই।
Verse 34
अध्वनि क्षीणगात्राश्न पांसुपादावगुण्ठिता: । तेषामेव श्रमार्तानां यो हान्न॑ं कथयेद् बुध:
পথে অঙ্গপ্রত্যঙ্গ ক্লান্ত, পা ধুলোয় আচ্ছন্ন, পরিশ্রমে কাতর সেই পথিকদের জন্য যে জ্ঞানী ব্যক্তি তখনই অন্নের ব্যবস্থা বলে দেয় (এবং করায়), সেই-ই প্রকৃত কল্যাণকামী।
Verse 35
तस्मात् त्वं सर्वदानानि हित्वान्नं सम्प्रयच्छ ह
অতএব তুমি অন্য সব দান পরিহার করে সর্বদা অন্ন দান করো।
Verse 36
यथाशक्ति च यो दद्यादन्नं विप्रेषु संस्कृतम्
যে ব্যক্তি নিজের সামর্থ্য অনুযায়ী ব্রাহ্মণদের যথাবিধি প্রস্তুত করা অন্ন দান করে, সে ধর্মসম্মত দাননীতিকে ধারণ করে এবং পবিত্র অতিথিদের যথোচিত সম্মান জানায়।
Verse 37
अन्नमेव विशिष्ट हि तस्मात् परतरं न च
অন্নই সত্যিই শ্রেষ্ঠ; তার চেয়ে বড় কিছু নেই। বেদে অন্নকে প্রজাপতি বলা হয়েছে; প্রজাপতিকে সংবৎসর (বর্ষচক্র) রূপে মানা হয়। সংবৎসর যজ্ঞস্বরূপ, আর যজ্ঞের মধ্যেই সকল প্রাণীর প্রতিষ্ঠা ও মঙ্গল নিহিত।
Verse 38
अन्न प्रजापतिश्नोक्त: स च संवत्सरो मतः । संवत्सरस्तु यज्ञोडसौ सर्व यज्ञे प्रतेष्ठितम्
মার্কণ্ডেয় বললেন— বেদে অন্নকে প্রজাপতি বলা হয়েছে, আর প্রজাপতিকেই সংবৎসর (বর্ষ) রূপে বোঝা হয়। সংবৎসরই যজ্ঞস্বরূপ, এবং যজ্ঞেই সকলের প্রতিষ্ঠা। অতএব অন্নই সর্ববস্তুর মধ্যে সর্বাধিক প্রাণধারক; তার চেয়ে শ্রেষ্ঠ আর কিছু নেই।
Verse 39
तस्मात् सर्वाणि भूतानि स्थावराणि चराणि च । तस्मादन्नं विशिष्ट हि सर्वेभ्य इति विश्रुतम्,यज्ञसे समस्त चराचर प्राणी उत्पन्न होते हैं। अत: अन्न ही सब पदार्थोसे श्रेष्ठ है। यह बात सर्वत्र प्रसिद्ध है
মার্কণ্ডেয় বললেন— অন্ন থেকেই সকল জীবের উৎপত্তি—স্থাবর ও জঙ্গম উভয়েরই। অতএব অন্নই সকল কিছুর চেয়ে শ্রেষ্ঠ; এ কথা সর্বত্র প্রসিদ্ধ।
Verse 40
येषां तटाकानि महोदकानि वाप्यश्च कूपाश्च प्रतिश्रयाश्व अन्नस्य दानं मधुरा च वाणी यमस्य ते निर्वचना भवन्ति
মার্কণ্ডেয় বললেন— যারা গভীর জলে পূর্ণ পুকুর-দিঘি নির্মাণ করায়, কূপ, কুয়া ও পথিকদের আশ্রয়স্থল গড়ে তোলে, অন্নদান করে এবং মধুর বাক্য বলে—তাদের ক্ষেত্রে যমের আদেশ অকার্যকর হয়; যমের আহ্বানও তাদের কানে পৌঁছায় না।
Verse 41
धान्यं श्रमेणार्जितवित्तसंचितं विप्रे सुशीले च प्रयच्छते यः । वसुन्धरा तस्य भवेत् सुतुष्टा धारां वसूनां प्रतिमुज्चतीव
মার্কণ্ডেয় বললেন— যে ব্যক্তি নিজের পরিশ্রমে অর্জিত ও সঞ্চিত ধন-ধান্য সুশীল ব্রাহ্মণকে দান করে, তার প্রতি বসুন্ধরা দেবী অতিশয় সন্তুষ্ট হন এবং যেন তার জন্য ধনের ধারা প্রবাহিত করেন।
Verse 42
अन्नदा: प्रथमं यान्ति सत्यवाक् तदनन्तरम् | अयाचितप्रदाता च सम॑ यान्ति त्रयो जना:
মার্কণ্ডেয় বললেন— অন্নদাতা প্রথমে স্বর্গে গমন করে; তার পরে সত্যভাষী যায়; তারপর যায় সে, যে না চাইতেই দান করে। এই তিনজন পুণ্যবানই সমান শুভ গতি লাভ করে।
Verse 43
वैशम्पायन उवाच कौतूहलसमुत्पन्न: पर्यपृच्छद् युधिष्ठिर: । मार्कण्डेयं महात्मानं पुनरेव सहानुज:
বৈশম্পায়ন বললেন—জনমেজয়! এরপর ভ্রাতৃসহ ধর্মরাজ যুধিষ্ঠিরের মনে প্রবল কৌতূহল জাগল, এবং তিনি মহাত্মা মার্কণ্ডেয়কে পুনরায় এইভাবে প্রশ্ন করলেন।
Verse 44
यमलोकस्य चाध्वानमन्तरं मानुषस्य च । कीदृशं किम्प्रमाणं वा कथं वा तन्महामुने । तरन्ति पुरुषाश्वैव केनोपायेन शंस मे
“মহামুনে! এই মনুষ্যলোক থেকে যমলোক কত দূরে? তা কেমন, কত বিস্তৃত? আর কোন উপায়ে মানুষ সেখানে উপস্থিত বিপদ-সঙ্কট অতিক্রম করতে পারে—আমাকে বলুন।”
Verse 45
मार्कण्डेय उदाच सर्वगुह्मृतमं प्रश्न॑ पवित्रमृषिसंस्तुतम् । कथयिष्यामि ते राजन् धर्म्य धर्मभूतां वर
মার্কণ্ডেয় বললেন—“রাজন, ধর্মপরায়ণদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ! তুমি এমন এক প্রশ্ন করেছ, যা সর্বাধিক গোপন, পরম পবিত্র, ধর্মসম্মত এবং ঋষিদের দ্বারাও প্রশংসিত। শোনো—আমি তোমাকে এই ধর্ম্য বিষয় ব্যাখ্যা করছি।”
Verse 46
षडशीतिसहस्तराणि योजनानां नराधिप । यमलोकस्य चाध्वानमन्तरं मानुषस्य च,महाराज! मनुष्यलोक और यमलोकके मार्ममें छियासी हजार योजनोंका अन्तर है
“নরাধিপ! মনুষ্যলোক ও যমলোকের মধ্যবর্তী দূরত্ব ছিয়াশি হাজার যোজন।”
Verse 47
आकाशं तदपानीयं घोरं कान्तारदर्शनम् । न तत्र वृक्षच्छाया वा पानीयं केतनानि च
“সে অঞ্চল জলশূন্য, আকাশের মতো ফাঁকা; দৃষ্টিতে ভয়ংকর অরণ্যপ্রান্তর। সেখানে গাছের ছায়া নেই, পানীয় জল নেই, আর কোনো বাসস্থান বা আশ্রয়ও নেই।”
Verse 48
नीयते यमदूतैस्तु यमस्याज्ञाकरैर्बलात्
বৈশম্পায়ন বললেন—যমের আদেশ পালনকারী যমদূতেরা তাকে বলপূর্বক টেনে নিয়ে যায়; বিচারক্ষণ উপস্থিত হলে কর্মফল অনিবার্য হয়ে ওঠে—এ কথাই এতে প্রকাশ পায়।
Verse 49
नरा: स्त्रियस्तथैवान्ये पृथिव्यां जीवसंज्ञिता: । यमराजकी आज्ञाका पालन करनेवाले यमदूत इस पृथ्वीपर आकर यहाँके पुरुषों, स्त्रियों तथा अन्य जीवोंको बलपूर्वक पकड़ ले जाते हैं || ४८ ई ।।
বৈশম্পায়ন বললেন—পৃথিবীতে যাদের জীব বলা হয়—পুরুষ, নারী ও অন্যান্য সকল প্রাণী—তাদের যমরাজের আদেশ পালনকারী যমদূতেরা এই লোকেই এসে বলপূর্বক ধরে নিয়ে যায়। আর হে রাজন, যারা এখানে ব্রাহ্মণদের উৎকৃষ্ট দান করেছে—বহু প্রকার, যেমন শ্রেষ্ঠ অশ্ব ও অন্যান্য বাহন—তারা পরপথে সেই বাহনগুলির দ্বারাই স্বচ্ছন্দে যাত্রা করে। আর যারা ছত্র দান করেছে, তারা সেখানে প্রাপ্ত ছত্র দিয়ে রৌদ্র নিবারণ করে অগ্রসর হয়।
Verse 50
हयादीनां प्रकृष्टानि ते5ध्वानं यान्ति वै नरा: । संनिवार्यातपं यान्ति छत्रेणैव हि छत्रदा:
বৈশম্পায়ন বললেন—যে মানুষ এ জগতে ব্রাহ্মণদের শ্রেষ্ঠ অশ্বাদি বাহন দান করেছে, তারা সেই পথেই সেই বাহনগুলির দ্বারাই স্বচ্ছন্দে অগ্রসর হয়। আর হে রাজন, যারা ছত্র দান করেছে, তারা সেখানে প্রাপ্ত ছত্র দিয়ে রৌদ্র নিবারণ করে চলে।
Verse 51
तृप्ताश्चैवान्नदातारो हातृप्ताश्चाप्यनन्नदा: | वस्त्रिणो वस्त्रदा यान्ति अवस्त्रा यान्त्यवस्त्रदा:
বৈশম্পায়ন বললেন—অন্নদাতা তৃপ্ত হয়ে পথ চলে; আর যারা অন্ন দান করেনি, তারা ক্ষুধার যন্ত্রণায় অতৃপ্ত হয়ে পথ চলে। বস্ত্রদাতা বস্ত্র পরিধান করে যায়; আর যারা বস্ত্র দান করেনি, তারা বস্ত্রহীন হয়ে যায়।
Verse 52
हिरण्यदा: सुखं यान्ति पुरुषास्त्वभ्यलंकृता: । भूमिदास्तु सुखं यान्ति सर्वे: कामै: सुतर्पिता:
বৈশম্পায়ন বললেন—সোনা দানকারী পুরুষেরা নানা অলংকারে ভূষিত হয়ে সেই পথে সুখে যায়। আর ভূমিদানকারী দাতারা সকল কাম্য ভোগে পরিতৃপ্ত হয়ে আনন্দে সেই পথ অতিক্রম করে।
Verse 53
यान्ति चैवापरिक्लिष्टा नस: सस्यप्रदायका: । नरा: सुखतरं यान्ति विमानेषु गृहप्रदा:
যারা শস্যফলদায়ী চাষকৃত ক্ষেত্র দান করে, তারা কোনো ক্লেশ না ভোগ করে এ লোক ত্যাগ করে। আর যারা গৃহদান করে, তারা দিব্য বিমানে আরো অধিক সুখ-স্বাচ্ছন্দ্যে গমন করে।
Verse 54
पानीयदा हाूतृषिता: प्रह्ृष्टमनसो नरा: । पन्थानं द्योतयन्तश्न यान्ति दीपप्रदा: सुखम्
যারা জলদান করেছে, তাদের তৃষ্ণার যন্ত্রণা ভোগ করতে হয় না; তারা প্রফুল্লচিত্তে সেই লোকের দিকে অগ্রসর হয়। আর যারা দীপদান করে, তারা পথ আলোকিত করতে করতে সুখে যাত্রা করে।
Verse 55
गोप्रदास्तु सुखं यान्ति निर्मुक्ता: सर्वपातकै: । विमानै्हससंयुक्तैर्यान्ति मासोपवासिन:
গোদানকারী মানুষ সকল পাপ থেকে মুক্ত হয়ে সুখে গমন করে। আর এক মাস উপবাস-ব্রত পালনকারীরা হাঁস-যুক্ত দিব্য বিমানে যাত্রা করে।
Verse 56
तथा बर्लिप्रयुक्तैश्न षष्ठरात्रोपवासिन: । त्रिरात्र क्षपते यस्तु एकभक्तेन पाण्डव
তদ্রূপ, হে পাণ্ডব, যারা বিধিপূর্বক বলি-সমর্পণসহ ছয় রাত্রি উপবাস করে, এবং যে ব্যক্তি তিন রাত্রি একভক্তে (দিনে একবার আহার) থেকে অতিবাহিত করে—এমন সংযমব্রতও ফলপ্রদ বলা হয়েছে।
Verse 57
पानीयस्य गुणा दिव्या: प्रेतलोकसुखावहा:
জলদানের গুণ দিব্য এবং প্রেতলোকে সুখদায়ক। জলদানের প্রভাব সত্যই অলৌকিক; তা পরলোকে আরাম ও আনন্দ দান করে। যারা পুণ্যবান হয়ে জলদান করে, তাদের পথে ‘পুষ্পোদকা’ নামে এক নদী লাভ হয়; তারা তার শীতল, অমৃতসম মধুর জল পান করে।
Verse 58
तत्र पुष्योदका नाम नदी तेषां विधीयते | शीतलं सलिल तत्र पिबन्ति हामृतोपमम्
বৈশম্পায়ন বললেন—সেখানে তাদের জন্য পুষ্যোদকা নামে এক নদী নির্ধারিত হয়। সেখানে তারা তার শীতল, অমৃতসম জল পান করে—জলদান-পুণ্যের অলৌকিক ফলস্বরূপ পরলোকে সুখ লাভ করে।
Verse 59
ये च दुष्कृतकर्माण: पूय॑ं तेषां विधीयते । एवं नदी महाराज सर्वकामप्रदा हि सा,महाराज! इस प्रकार वह नदी सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाली है; किंतु जो पापी जीव हैं उनके लिये उस नदीका जल पीब बन जाता है
বৈশম্পায়ন বললেন—যাদের কর্ম দুষ্কৃত, তাদের জন্য সেই একই জল পুঁজে পরিণত হয়। এইভাবে, মহারাজ, সে নদী সর্বকামপ্রদ; কিন্তু পাপীদের কাছে তা কলুষিত ও ঘৃণ্য হয়ে ওঠে।
Verse 60
तस्मात् त्वमपि राजेन्द्र पूजयैनान् यथाविधि । अध्वनि क्षीणगात्रश्व पथि पांसुसमन्वित:
অতএব, রাজেন্দ্র, তুমিও এদের যথাবিধি পূজা-সৎকার করো। পথে—যখন দেহ ও অশ্ব ক্লান্ত ও ক্ষীণ হয়ে পড়ে, আর পথ ধূলিতে আচ্ছন্ন থাকে—তখন যথোচিত সম্মান ও ধর্মাচরণ বিশেষ প্রয়োজনীয়।
Verse 61
पृच्छते हुन्नदातारं गृहमायाति चाशया । त॑ पूजयाथ यत्नेन सो3तिथित्रद्यमिणश्व॒ सः
বৈশম্পায়ন বললেন—সে অন্নদাতার খোঁজ জিজ্ঞেস করে আশায় গৃহে আসে। অতএব তাকে যত্নসহকারে সম্মান করো; কারণ অতিথি ধর্মের পরীক্ষক।
Verse 62
अतः राजेन्द्र! तुम भी इन ब्राह्मणोंका विधिपूर्वक पूजन करो। जो रास्ता चलनेसे थककर दुबला हो गया है, जिसका शरीर धूलसे भरा है और जो अन्नदाताका पता पूछता हुआ भोजनकी आशासे घरपर आ जाता है, उसका तुम यत्नपूर्वक सत्कार करो; क्योंकि वह अतिथि है, इसलिये ब्राह्मण ही है। अर्थात् ब्राह्मणके ही तुल्य है ।।
বৈশম্পায়ন বললেন—অতএব, রাজেন্দ্র, তুমিও এই ব্রাহ্মণদের যথাবিধি পূজা করো। যে পথচলায় কৃশ হয়ে গেছে, যার দেহ ধূলিতে আচ্ছন্ন, আর যে অন্নদাতার খোঁজ করতে করতে আহারের আশায় গৃহে এসে পৌঁছায়—তাকে যত্নসহকারে সৎকার করো; কারণ সে অতিথি, ব্রাহ্মণেরই তুল্য। এমন অতিথির পশ্চাতে ইন্দ্রসহ সকল দেবতা গমন করেন। সেই অতিথি যথোচিত সম্মান পেলে দেবতারা প্রসন্ন হন; আর সম্মান না পেলে তারা নিরাশ হয়ে ফিরে যান।
Verse 63
तस्मात् त्वमपि राजेन्द्र पूजयैनं यथाविधि । एतत् ते शतशः प्रोक्ते कि भूय: श्रोतुमिच्छसि
অতএব, রাজেন্দ্র! তুমিও এই অতিথিকে বিধিপূর্বক সম্মান করো। এ কথা আমি তোমাকে শতবার বলেছি; এখন আর কী শুনতে চাও?
Verse 64
युधिछिर उवाच पुन: पुनरहं श्रीतुं कथां धर्मसमा श्रयाम् । पुण्यामिच्छामि धर्मज्ञ कथ्यमानां त्वया विभो,युधिष्ठिरे कहा--धर्मज्ञ विभो! आपके द्वारा कही हुई पुण्यमय धर्मकी चर्चा मैं बारंबार सुनना चाहता हूँ
যুধিষ্ঠির বললেন—ধর্মজ্ঞ বিভো! ধর্মাশ্রিত এই কাহিনি আমি বারবার শুনতে চাই। আপনি যে পুণ্যময় বৃত্তান্ত বলছেন, সেটিই আবার বলুন।
Verse 65
मार्कण्डेय उदाच धर्मान्तरं प्रति कथां कथ्यमानां मया नृप । सर्वपापहरां नित्यं शृणुष्वावहितो मम
মার্কণ্ডেয় বললেন—হে রাজন! এখন আমি ধর্মসম্বন্ধীয় আরেকটি কাহিনি বলছি, যা সর্বদা সকল পাপ হরণ করে। মনোযোগ দিয়ে আমার কথা শোনো।
Verse 66
कपिलायां तु दत्तायां यत् फल ज्येष्ठपुष्करे । तत् फलं भरतश्रेष्ठ विप्राणां पादधावने,भरतश्रेष्ठ! ज्येष्ठपुष्करतीर्थमें कपिला गौ दान करनेसे जो फल मिलता है वही ब्राह्मणोंका चरण धोनेसे प्राप्त होता है
হে ভরতশ্রেষ্ঠ! জ্যেষ্ঠপুষ্কর তীর্থে কপিলা গাভী দান করলে যে ফল লাভ হয়, ব্রাহ্মণদের চরণ ধৌত করলেও সেই একই ফল লাভ হয়।
Verse 67
द्विजपादोदकक्लिन्ना यावत् तिष्ठति मेदिनी । तावत् पुष्करपर्णेन पिबन्ति पितरो जलम्,ब्राह्मणोंके चरण पखारनेके जलसे जबतक पृथ्वी भीगी रहती है, तबतक पितरलोग कमलके पत्तेसे जल पीते हैं
ব্রাহ্মণদের চরণ ধোয়া জলে যতক্ষণ পৃথিবী সিক্ত থাকে, ততক্ষণ পিতৃগণ পদ্মপত্রে করে যেন সেই জল পান করেন।
Verse 68
स्वागतेनाग्नयस्तृप्ता आसनेन शतक्रतुः । पितर: पादशौचेन अन्नाद्येन प्रजापति:
যুধিষ্ঠির বললেন— ব্রাহ্মণকে স্বাগত জানালে পবিত্র অগ্নিগণ তৃপ্ত হন; তাঁকে আসন দিলে শতক্রতু ইন্দ্র তৃপ্ত হন; তাঁর পদপ্রক্ষালনে পিতৃগণ তৃপ্ত হন; আর ভোজনোপযোগী অন্ন প্রদান করলে প্রজাপতি (ব্রহ্মা) তৃপ্ত হন।
Verse 69
यावद् वत्सस्य वै पादौ शिरश्रैव प्रदृश्यते । तस्मिन् काले प्रदातव्या प्रयत्नेनान्तरात्मना
গর্ভিণী গাভী যখন প্রসব করছে এবং বাছুরের কেবল মুখ ও দুই পা-ই বাইরে বেরিয়ে দেখা যায়, ঠিক সেই সময় অন্তঃকরণে পবিত্রতা রেখে যত্নসহকারে সেই গাভী দান করা উচিত।
Verse 70
अन्तरिक्षगतो वत्सो यावद् योन्यां प्रदृश्यते । तावत् गौ पृथिवी ज्ञेया यावद् गर्भ न मुडचति
প্রসবকালে বাছুরটি যতক্ষণ যোনিদ্বারেই দৃশ্যমান থাকে—মাঝআকাশে ঝুলে আছে যেন—এবং যতক্ষণ গাভী সম্পূর্ণভাবে গর্ভকে মুক্ত না করে, ততক্ষণ সেই গাভীকে পৃথিবীরই রূপ বলে জানতে হবে।
Verse 71
यावन्ति तस्या रोमाणि वत्सस्य च युधिष्ठिर । तावद् युगसहस््राणि स्वर्गलोके महीयते
হে যুধিষ্ঠির! সেই গাভী ও বাছুরের দেহে যত লোম আছে, তত সহস্র যুগ দাতা স্বর্গলোকে সম্মানিত ও প্রতিষ্ঠিত থাকে।
Verse 72
सुवर्णनासां यः कृत्वा सुखुरां कृष्णधेनुकाम् । तिलै: प्रच्छादितां दद्यात् सर्वरत्नैरलंकृताम्
হে ভারত! যে ব্যক্তি সোনার নাসিকা-ভূষণ পরিয়ে, সুন্দর রূপার খুরে শোভিত করে, সর্বপ্রকার রত্নে অলঙ্কৃত করে, তিল দিয়ে আচ্ছাদিত করে কালো গাভী দান করে; আর যে তা গ্রহণ করে পুনরায় অন্য কোনো শ্রেষ্ঠ পুরুষকে অর্পণ করে—সে সর্বোত্তম ফলের অধিকারী হয়।
Verse 73
प्रतिग्रहं गृहीत्वा यः पुनर्ददति साधवे । फलानां फलमश्नाति तदा दत्त्वा च भारत
হে ভারত! যে ব্যক্তি দান গ্রহণ করে তা আবার কোনো সাধু‑যোগ্য পুরুষকে দান করে, সে ‘ফলেরও ফল’—অর্থাৎ সর্বোচ্চ পুণ্য—ভোগ করে।
Verse 74
ससमुद्रगुहा तेन सशैलवनकानना । चतुरन्ता भवेद् दत्ता पृथिवी नात्र संशय:,उस गौके दानसे समुद्र, गुफा, पर्वत, वन और काननोंसहित चारों दिशाओंकी भूमिके दानका पुण्य प्राप्त होता है, इसमें संशय नहीं है
সেই গৌ‑দানের দ্বারা সমুদ্র, গুহা, পর্বত, বন ও কাননসহ চার দিকবেষ্টিত সমগ্র পৃথিবী দান করার পুণ্য লাভ হয়—এতে সন্দেহ নেই।
Verse 75
अन्तर्जानुशयो यस्तु भुड्क्ते संसक्तभाजन: । यो द्विज: शब्दरहितं स क्षमस्तारणाय वै
যে দ্বিজ হাঁটুর ভেতরে হাত গুটিয়ে, নীরবে, পাত্রে মন নিবদ্ধ রেখে আহার করে—সে নিজেকে এবং অন্যকেও পার করাতে সক্ষম হয়।
Verse 76
अपानपा न गदितास्तथान्ये ये द्विजातय: । जपन्ति संहितां सम्यक ते नित्यं तारणक्षमा:
যে দ্বিজ ও অন্যান্যজন অনুচিত বাক্য উচ্চারণ করে না এবং যথাবিধি সংহিতার জপ করে, তারা সর্বদা (নিজে ও অন্যকে) পার করাতে সক্ষম।
Verse 77
जो मदिरा नहीं पीते, जिनपर किसी प्रकारका दोष नहीं लगाया गया है तथा जो अन्य द्विज विधिपूर्वक वेदोंकी संहिताका पाठ करते हैं, वे सदा दूसरोंको तारनेमें समर्थ होते हैं ७६ ।।
যারা মদ্যপান করে না, যাদের বিরুদ্ধে কোনো দোষ আরোপিত নয়, এবং অন্যান্য দ্বিজ যারা বিধিপূর্বক বেদ‑সংহিতা পাঠ করে—তারা সর্বদা অন্যকে পার করাতে সক্ষম। যজ্ঞের হব্য হোক বা শ্রাদ্ধের কব্য—যা কিছুই হোক, শ्रोত্রিয় ব্রাহ্মণই তার অধিকারী। যোগ্য শ्रोত্রিয়কে দেওয়া দান জ্বলন্ত অগ্নিতে আহুতি দেওয়ার মতোই ফলপ্রদ।
Verse 78
मन्युप्रहरणा विप्रा न विप्रा: शस्त्रयोधिन: । निहन्युर्मन्युना विप्रा वजपाणिरिवासुरान्
ব্রাহ্মণদের অস্ত্রই হলো ক্রোধ; ব্রাহ্মণরা লৌহাস্ত্রে যুদ্ধকারী নন। যেমন হাতে বজ্রধারী ইন্দ্র অসুরদের বিনাশ করেন, তেমনি ব্রাহ্মণ ধর্মসম্মত ক্রোধে অপরাধীকে দমন করেন।
Verse 79
धर्मश्रितेयं तु कथा कथितेयं तवानघ । या श्र॒ुत्वा मुनयः प्रीता नैमिषारण्यवासिन:,निष्पाप युधिष्ठिर! यह मैंने धर्मयुक्त कथा कही है। इसे सुनकर नैमिषारण्यनिवासी मुनि बड़े प्रसन्न हुए थे
হে নিষ্পাপ, এই কাহিনি আমি তোমাকে ধর্মাশ্রিত করে বলেছি। এটি শুনে নৈমিষারণ্যে নিবাসী মুনিগণ অত্যন্ত প্রসন্ন হয়েছিলেন।
Verse 80
वीतशोकभयक्रोधा विपाप्मानस्तथैव च । श्रुत्वेमां तु कथां राजन् न भवन्तीह मानवा:,राजन्! इस कथाको सुनकर मनुष्य शोक, भय, क्रोध और पापसे रहित हो फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेते हैं
হে রাজন, এই কাহিনি শুনলে মানুষ শোক, ভয়, ক্রোধ ও পাপ থেকে মুক্ত হয়; এবং এই লোকেতে আর পুনর্জন্ম লাভ করে না।
Verse 81
युधिछिर उवाच कि तच्छौचं भवेद् येन विप्र: शुद्ध: सदा भवेद् | तदिच्छामि महाप्राज्ञ श्रोतुं धर्मभृतां वर
যুধিষ্ঠির বললেন—হে মহাপ্রাজ্ঞ, ধর্মধারীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ ঋষে! সেই শৌচ কী, যার দ্বারা ব্রাহ্মণ সর্বদা শুদ্ধ থাকে? আমি তা শুনতে চাই।
Verse 82
मार्कण्डेय उदाच वाक्शौचं कर्मशौचं च यच्च शौचं जलात्मकम् | त्रिभि: शौचैरुपेतो यः स स्वर्गी नात्र संशय:
মার্কণ্ডেয় বললেন—হে রাজন, শৌচ তিন প্রকার: বাকশৌচ (বাণীর পবিত্রতা), কর্মশৌচ (কর্মের পবিত্রতা) এবং জলাত্মক শৌচ (জলের দ্বারা দেহশুদ্ধি)। যে এই তিন শৌচে সমন্বিত, সে স্বর্গের যোগ্য—এতে সন্দেহ নেই।
Verse 83
सायं प्रातश्न संध्यां यो ब्राह्मणो5भ्युपसेवते । प्रजपन् पावनीं देवीं गायत्रीं वेदमातरम्
যে ব্রাহ্মণ প্রাতে ও সায়ং—উভয় সন্ধ্যায় বিধিপূর্বক সন্ধ্যোপাসনা করে এবং বেদমাতা, পবিত্রকারিণী দেবী গায়ত্রীকে জপ করে, সে তাঁর কৃপায় পরম পবিত্র ও নিষ্পাপ হয়। সে যদি সমুদ্র-পর্যন্ত সমগ্র পৃথিবীও দানরূপে গ্রহণ করে, তবু কোনো বিপদে পতিত হয় না।
Verse 84
स तया पावितो देव्या ब्राह्मणो नष्टकिल्बिष: । न सीदेत् प्रतिगृह्लानो महीमपि ससागराम्
সেই দিব্য দেবী (গায়ত্রী) দ্বারা পবিত্রিত ব্রাহ্মণ পাপমুক্ত হয়। সে যদি সমুদ্র-পর্যন্ত সমগ্র পৃথিবীও দানরূপে গ্রহণ করে, তবু দুঃখ বা সংকটে পতিত হয় না—কারণ শুচিব্রত পালনকারীর জন্য দেবী গায়ত্রীর পবিত্রকারী শক্তি অতি মহান।
Verse 85
ये चास्य दारुणा: केचिद् ग्रहा: सूर्यादयो दिवि | ते चास्य सौम्या जायन्ते शिवा: शिवतरा: सदा
আকাশে সূর্য প্রভৃতি যে গ্রহসমূহ তার জন্য ভয়ংকর হতো, গায়ত্রী-জপের প্রভাবে সেগুলিও তার জন্য সর্বদা কোমল, সুখদ ও পরম মঙ্গলদায়ক হয়ে ওঠে।
Verse 86
सर्वे नानुगतं चैनं दारुणा: पिशिताशना: । घोररूपा महाकाया धर्षयन्ति द्विजोत्तमम्,भयंकर रूप और विशाल शरीरवाले, समस्त क्रूरकर्मा, मांसभक्षी राक्षस भी गायत्रीजपपरायण उस श्रेष्ठ द्विजपर आक्रमण नहीं कर सकते
ভয়ংকর রূপ ও বিশাল দেহধারী, নিষ্ঠুরকর্মা মাংসভোজী সকল রাক্ষসও গায়ত্রী-জপে পরায়ণ সেই শ্রেষ্ঠ দ্বিজকে আক্রমণ করতে পারে না।
Verse 87
नाध्यापनाद् याजनाद् वा अन्यस्माद् वा प्रतिग्रहात् | दोषो भवति विप्राणां ज्वलिताग्निसमा द्विजा:
ব্রাহ্মণদের জন্য অধ্যাপনা, যাজন (যজ্ঞ করানো) কিংবা অন্য বিধিসম্মত দানগ্রহণ থেকে কোনো দোষ জন্মায় না। সন্ধ্যোপাসনায় রত এমন দ্বিজেরা প্রজ্বলিত অগ্নির ন্যায় দীপ্ত ও পবিত্র; তাই জীবিকার ধর্মকর্মে তারা কলুষিত হয় না।
Verse 88
दुर्वेदा वा सुवेदा वा प्राकृता: संस्कृतास्तथा । ब्राह्मणा नावमन्तव्या भस्मच्छन्ञा इवाग्नय:
ব্রাহ্মণরা বেদে অল্পজ্ঞ হোন বা সুজ্ঞ, সদাচারে সংস্কৃত হোন বা সাধারণ লোকের মতো অসংস্কৃত প্রতীয়মান হোন—তাঁদের অবজ্ঞা করা উচিত নয়; কারণ তাঁরা ছাইয়ের আড়ালে লুকানো অগ্নির মতো।
Verse 89
यथा श्मशाने दीप्तौजा: पावको नैव दुष्यति । एवं विद्वानविद्दान् वा ब्राह्मणो दैवतं महत्
যেমন শ্মশানেও প্রজ্বলিত অগ্নি কলুষিত হয় না, তেমনি ব্রাহ্মণ বিদ্বান হোন বা অবিদ্বান—তাঁকে মহান দেবতাস্বরূপই মান্য করা উচিত।
Verse 90
प्राकारैश्न पुरद्वारैः प्रासादैश्व पृथग्विधै: । नगराणि न शोभन्ते हीनानि ब्राह्मणोत्तमै:
প্রাচীর, নগরদ্বার ও নানা প্রকার প্রাসাদ থাকলেই নগর শোভিত হয় না; উত্তম ব্রাহ্মণবিহীন নগরের প্রকৃত দীপ্তি নেই।
Verse 91
वेदाढ्या वृत्तसम्पन्ना ज्ञानवन्तस्तपस्विन: । यत्र तिष्ठन्ति वै विप्रास्तन्नाम नगरं नूप,राजन! वेदज्ञ, सदाचारी, ज्ञानी और तपस्वी ब्राह्मण जहाँ निवास करते हों, उसीका नाम नगर है
হে নূপরাজ! যেখানে বেদসমৃদ্ধ, সদাচারসম্পন্ন, জ্ঞানী ও তপস্বী বিপ্রগণ বাস করেন, সেই স্থানই প্রকৃত অর্থে ‘নগর’ নামে অভিহিত।
Verse 92
व्रजे वाप्यथवारण्ये यत्र सन्ति बहुश्रुता: । तत् तन्नगरमित्याहु: पार्थ तीर्थ च तद् भवेत्
হে কুন্তীনন্দন পার্থ! গোপালদের বসতি হোক বা অরণ্য—যেখানে বহুশ্রুত পণ্ডিতেরা বাস করেন, সেই স্থানকে ‘নগর’ বলা হয়; এবং সেই স্থানই তীর্থও হয়ে ওঠে।
Verse 93
रक्षितारं च राजानं ब्राह्मणं च तपस्विनम् । अभिगम्याभिपूज्याथ सद्यः पापात् प्रमुच्यते
যে ব্যক্তি প্রজাপালক রাজা ও তপস্বী ব্রাহ্মণের নিকট গিয়ে যথাবিধি সেবা-সম্মান করে, সে তৎক্ষণাৎ পাপমুক্ত হয়।
Verse 94
पुण्यतीर्थाभिषेकं च पवित्राणां च कीर्तनम् । सद्धिः सम्भाषणं चैव प्रशस्तं कीर्त्यते बुधै:
পুণ্য তীর্থে স্নান, পবিত্র মন্ত্রের কীর্তন এবং সজ্জনদের সঙ্গে শ্রদ্ধাপূর্ণ আলাপ—এ সবই জ্ঞানীরা উৎকৃষ্ট বলে প্রশংসা করেছেন।
Verse 95
साधुसज्भरमपूतेन वाक्सुभाषितवारिणा | पवित्रीकृतमात्मानं सन््तो मन्यन्ति नित्यश:,सत्संगसे पवित्र किये हुए वाणीके सुन्दर सम्भाषणरूप जलसे अभिकषिक्त श्रेष्ठ पुरुष अपनेको सदा पवित्र हुआ मानते हैं
সৎসঙ্গের দ্বারা পবিত্র, কলুষহীন ও সুভাষিত-রূপ জলের ন্যায় বাক্যে অভিষিক্ত হয়ে সজ্জনরা নিজেদের নিত্য পবিত্র মনে করেন।
Verse 96
त्रिदण्डधारणं मौनं जटाभारो5थ मुण्डनम् । वल्कलाजिनसंचवेष्ट ब्रतचर्याभिषेचनम्
ত্রিদণ্ড ধারণ, মৌন পালন, জটার ভার বহন বা মুণ্ডন, বল্কল ও মৃগচর্ম পরিধান, ব্রতাচরণ ও স্নান—এসবই বাহ্য আচরণ।
Verse 97
अग्निहोत्रं वने वास: शरीरपरिशोषणम् | सर्वाण्येतानि मिथ्या स्युर्यदि भावो न निर्मल:
অগ্নিহোত্র, বনে বাস এবং দেহকে শুষ্ক করে তোলা—অন্তঃভাব নির্মল না হলে এ সবই বৃথা।
Verse 98
न दुष्करमनाशि त्वं सुकरं हाशनं विना । विशुद्धि चक्षुरादीनां षण्णामिन्द्रियगामिनाम्
যুধিষ্ঠির বললেন—যে আহার করে না, তার কাছে কিছুই দুষ্কর নয়; যা সাধারণত কঠিন, আহার ত্যাগে তাও সহজ হয়। আর এই সংযমে চক্ষু প্রভৃতি ছয় ইন্দ্রিয় শুদ্ধ হয়ে বশীভূত হয়।
Verse 99
ये पापानि न कुर्वन्ति मनोवाक्कर्मबुद्धिभि: । ते तपन्ति महात्मानो न शरीरस्य शोषणम्
যুধিষ্ঠির বললেন—যারা মন, বাক্য, কর্ম ও বুদ্ধি দ্বারা পাপ করে না, তারাই মহাত্মা, তারাই সত্য তপস্বী। কেবল দেহকে শুষ্ক করে তোলাই তপস্যা নয়।
Verse 100
न ज्ञातिभ्यो दया यस्य शुक्लदेहोडविकल्मष: । हिंसा सा तपसस्तस्य नानाशित्वं तप: स्मृतम्
যুধিষ্ঠির বললেন—যে ব্রত-উপবাসে দেহকে বাহ্যত শুদ্ধ করেছে এবং নানাবিধ পাপকর্ম থেকেও বিরত থাকে, কিন্তু নিজের স্বজনদের প্রতি যার হৃদয়ে দয়া জাগে না—তার সেই কঠোরতা হিংসা হয়ে তার তপস্যা নষ্ট করে। কেবল আহার ত্যাগই তপস্যা নয়।
Verse 101
तिष्ठन् गृहे चैव मुनिर्नित्यं शुचिरलंकृत: । यावज्जीवं दयावांश्व सर्वपापै: प्रमुच्यते
যে ব্যক্তি গৃহে অবস্থান করেও সদা পবিত্রভাবে থাকে, সদ্গুণে ভূষিত থাকে এবং জীবনভর সকল প্রাণীর প্রতি দয়া রাখে—তাকে মুনিই জ্ঞান করা উচিত; সে সর্ব পাপ থেকে মুক্ত হয়।
Verse 102
न हि पापानि कर्माणि शुद्धयबन्त्यनशनादिभि: । सीदत्यनशनादेव मांसशोणितलेपन:
যুধিষ্ঠির বললেন—পাপকর্ম কেবল উপবাস প্রভৃতি দ্বারা শুদ্ধ হয় না। যে মাংস ও রক্তে লিপ্ত, সে উপবাসে শুধু ক্ষয়প্রাপ্ত হয়।
Verse 103
भोजन छोड़ने आदिसे पापकर्मोंका शोधन हो जाता हो, ऐसी बात नहीं है। हाँ, भोजन त्याग देनेसे यह रक्त-मांससे लिपा हुआ शरीर अवश्य क्षीण हो जाता है ।।
যুধিষ্ঠির বললেন— শুধু আহার ত্যাগ করলেই পাপকর্ম শোধিত হয়—এ কথা নয়। আহার ত্যাগে রক্ত-মাংসে লিপ্ত এই দেহ অবশ্যই ক্ষীণ হয়। শাস্ত্রসম্মত নয় এমন কর্ম করলে ফল হয় কেবল ক্লেশ; তাতে পাপ নাশ হয় না। আর যে ব্যক্তি ভাবশূন্য—অর্থাৎ শ্রদ্ধা ও শুদ্ধ অভিপ্রায়হীন—তার পূর্বকর্মকে অগ্নিহোত্র প্রভৃতি পবিত্র ক্রিয়াও দগ্ধ করতে পারে না।
Verse 104
पुण्यादेव प्रव्रजन्ति शुद्धयन्त्यमशनानि च । न मूलफलभभक्षित्वान्न मौनान्नानिलाशनात्
যুধিষ্ঠির বললেন— পুণ্যের বলেই মানুষ সত্যার্থে প্রব্রজ্যা গ্রহণ করে, আর উপবাসও পুণ্যের দ্বারাই—অর্থাৎ নিষ্কাম ভাবের দ্বারা—শুদ্ধিদায়ক হয়। শুধু ফল-মূল খেয়ে, শুধু মৌন পালন করে, কিংবা ‘বায়ুভক্ষণ’ করে শুদ্ধি লাভ হয় না। অন্তঃশুদ্ধি ও নিষ্কাম সংকল্প না থাকলে বাহ্য তপস্যা নিজে থেকে পবিত্র করে না।
Verse 105
शिरसो मुण्डनाद् वापि न स्थानकुटिकासनात् । न जटाधारणाद्ू वापि न तु स्थण्डिलशय्यया
যুধিষ্ঠির বললেন— মাথা মুণ্ডন করলেই নয়, এক স্থানে কুটির বেঁধে থাকলেই নয়, জটা ধারণ করলেই নয়, কিংবা খালি মাটিতে শয়ন করলেই নয়—মানুষ শুদ্ধ হয় না। অন্তঃশুদ্ধি থেকে জন্ম নেওয়া পুণ্যবলের দ্বারাই উত্তম গতি লাভ হয়।
Verse 106
नित्यं हनशनादू् वापि नाग्निशुश्रूषणादपि । न चोदकप्रवेशेन न च क्ष्माशयनादपि
যুধিষ্ঠির বললেন— নিত্য উপবাস করলেও নয়, অগ্নিসেবা করলেও নয়, জলে নিমজ্জিত হলেও নয়, কিংবা ভূমিতে শয়ন করলেও নয়—মানুষ শুদ্ধ হয় না। অন্তঃপুণ্য ও নিষ্কাম সংকল্পহীন বাহ্য তপস্যা নিজে থেকে শোধন করে না।
Verse 107
ज्ञानेन कर्मणा वापि जरामरणमेव च । व्याधयश्र प्रहीयन्ते प्राप्यते चोत्तमं पदम्,तत्त्वज्ञान या सत्कर्मसे ही जरा, मृत्यु तथा रोगोंका नाश होता है और उत्तम पद (मुक्ति)-की प्राप्ति होती है
যুধিষ্ঠির বললেন— তত্ত্বজ্ঞান দ্বারা অথবা সৎকর্ম দ্বারা জরা, মৃত্যু ও রোগ দূর হয়; এবং উত্তম পদ—মোক্ষ—লাভ হয়।
Verse 108
बीजानि हाग्निदग्धानि न रोहन्ति पुनर्यथा । ज्ञानदग्धैस्तथा क्लेशैरनत्मा संयुज्यते पुन:
যেমন অগ্নিদগ্ধ বীজ আর অঙ্কুরিত হয় না, তেমনই জ্ঞান দ্বারা অবিদ্যা প্রভৃতি ক্লেশ দগ্ধ হয়ে গেলে অনাত্মা (মন-দেহ-সমষ্টি) তাদের সঙ্গে পুনরায় যুক্ত হয় না।
Verse 109
आत्मना विप्रहीणानि काष्ठकुड्योपमानि च । विनश्यन्ति न संदेह: फेनानीव महार्णवे
যারা আত্মা-শূন্য, তারা কাঠের প্রাচীরের মতোই নিতান্ত নীরস; নিঃসন্দেহে তারা বিনষ্ট হয়—মহাসাগরের ফেনার মতো মিলিয়ে যায়।
Verse 110
जीवात्मासे परित्यक्त होनेपर सारे शरीर काठ और दीवारकी भाँति जडवत् होकर महासागरमें उठे हुए फेनोंकी तरह नष्ट हो जाते हैं, इसमें संशय नहीं है ।।
জীবাত্মা ত্যাগ করামাত্র দেহ কাঠ ও প্রাচীরের মতো জড় হয়ে যায় এবং মহাসাগরে ওঠা ফেনার মতো বিনষ্ট হয়—এতে সন্দেহ নেই। কিন্তু যদি এক শ্লোক বা অর্ধশ্লোকেই সকল প্রাণীর হৃদয়-গুহায় অধিষ্ঠিত পরমাত্মাকে জানা যায়, তবে তার জন্য শাস্ত্রের বিস্তৃত অধ্যয়নের প্রয়োজন সিদ্ধ হয়ে যায়।
Verse 111
द्वयक्षरादभिसंधाय केचिच्छलोकपदाड्कितै: । शतैरन्यै: सहसैश्न प्रत्ययो मोक्षलक्षणम्
কেউ মাত্র দুই অক্ষরের মন্ত্রে মন স্থির করে পরম তত্ত্বকে জানে; আর কেউ শ্লোক ও পদে চিহ্নিত শত-সহস্র শাস্ত্রবাক্যে পরমাত্মার স্বরূপ বোঝে। যেভাবেই হোক—দৃঢ় বোধ, অন্তঃপ্রত্যয়ই মোক্ষের লক্ষণ।
Verse 112
नायं लोको<स्ति न परो न सुखं संशयात्मन: । ऊचुर्ज्ञनिविदो वृद्धा: प्रत्ययो मोक्षलक्षणम्
যার মন সন্দেহে পূর্ণ, তার জন্য না এ লোক, না পরলোক, না সুখ। বৃদ্ধ ও জ্ঞানীজন বলেন—দৃঢ় অন্তঃপ্রত্যয়ই মোক্ষের লক্ষণ।
Verse 113
विदितार्थस्तु वेदानां परिवेद प्रयोजनम् । उद्विजेत् स तु वेदेभ्यो दावाग्नेरिव मानव:
মানুষ যখন বেদের প্রকৃত অর্থ ও উদ্দেশ্য যথার্থভাবে উপলব্ধি করে, তখন সেই বেদজ্ঞ ব্যক্তি কেবল কর্মবিধানকারী বেদাংশ থেকে ঠিক যেমন লোকেরা দাউদাউ বনাগ্নি থেকে সরে যায়, তেমনই সরে দাঁড়ায়।
Verse 114
शुष्क॑ तर्क परित्यज्य आश्रयस्व श्रुति स्मृतिम् एकाक्षराभिसम्बद्धं तत्त्वं हेतुभिरिच्छसि । बुद्धिर्न तस्य सिद्धयेत साधनस्य विपर्ययात्
শুষ্ক তর্ক ত্যাগ করে শ্রুতি ও স্মৃতির আশ্রয় গ্রহণ করো। যদি একাক্ষর ‘ওঁ’-এর সঙ্গে সংযুক্ত পরম তত্ত্বকে যুক্তিসঙ্গতভাবে ও নিঃসন্দেহে জানতে চাও, তবে জেনো—যথাযথ উপায় অবলম্বন না করলে বুদ্ধি সেই তত্ত্বে স্থির সিদ্ধান্তে পৌঁছতে পারে না।
Verse 115
वेदपूर्व वेदितव्यं प्रयत्नात् तत् वै वेदस्तस्य वेद: शरीरम् । वेदस्तत्त्वं तत्समासोपलब्धौ क्लीबस्त्वात्मा ततू स वेद्यस्य वेद्यम्
যা বেদের ভিত্তিতে প্রতিষ্ঠিত, তা সাধনা করে জানতে হবে—সেটাই প্রকৃত ‘বেদ’। যে সত্যিই জানে, তার কাছে বেদই জ্ঞানের দেহ (আধার) হয়ে ওঠে। সংক্ষিপ্ত সাররূপে তাকে ধরতে পারলেই তার তত্ত্ব উপলব্ধ হয়; কিন্তু আত্মা যখন অন্তরে দুর্বল ও অস্পষ্ট হয়ে পড়ে, তখন যা জানার যোগ্য, তাও কেবল ‘জ্ঞেয়’ হয়েই থাকে—জীবন্ত উপলব্ধি হয় না।
Verse 116
इसलिये जाननेयोग्य परमात्मतत्त्वका ज्ञान वेदोंके द्वारा ही यत्नपूर्वक प्राप्त करना चाहिये; क्योंकि वह परमात्मतत्त्व वेदस्वरूप है। वेद उसका शरीर है। उस परमात्मतत्त्वको सहजभावसे प्राप्त करानेमें वेद हेतु है। यह जीवात्मा स्वयं समर्थ नहीं है; क्योंकि वह तत्त्व वेद्यका भी वेद्य है
অতএব জ্ঞেয় পরমাত্ম-তত্ত্বের জ্ঞান কেবল বেদের দ্বারাই, সাধনা করে, অর্জন করা উচিত; কারণ সেই পরম তত্ত্ব বেদস্বরূপ, আর বেদ তাঁরই দেহ—তাঁকে সহজে লাভ করার উপায়। জীবাত্মা একা যথেষ্ট নয়, কেননা সেই তত্ত্ব অতি গভীর—জ্ঞেয়েরও জ্ঞেয়। বেদ দেবতাদের আয়ু এবং কর্মের আশীর্বাদ ও ফলও ঘোষণা করে; সেই বিধান অনুসারেই প্রত্যেক যুগে জগতে দেহধারীদের প্রভাব ও ভাগ্য ফলিত হয়।
Verse 117
इन्द्रियाणां प्रसादेन तदेतत् परिवर्जयेत् । तस्मादनशनं दिव्यं निरुद्धेन्द्रियगोचरम्
অতএব ইন্দ্রিয়শুদ্ধির দ্বারা মানুষকে এই বিষয়ভোগ পরিত্যাগ করতে হবে। ইন্দ্রিয় নির্মল হয়ে সংযত হলে যে ‘অনশন’—অর্থাৎ বিষয়ের গ্রহণ না করা—তা-ই দিব্য।
Verse 118
तपसा स्वर्गगमनं भोगो दानेन जायते | ज्ञानेन मोक्षो विज्ञेयस्तीर्थस्नानादघक्षय:
তপস্যায় স্বর্গগমন লাভ হয়; দানে ভোগসুখ অর্জিত হয়। জ্ঞানে মোক্ষ লাভ হয়—এ কথা জেনে রাখা উচিত; আর তীর্থস্নানে পাপ ক্ষয় হয়।
Verse 119
वैशम्पायन उवाच एवमुक्तस्तु राजेन्द्र प्रत्युवाच महायशा: । भगवन् श्रोतुमिच्छामि प्रधानविधिमुत्तमम्
বৈশম্পায়ন বললেন—হে রাজেন্দ্র! এ কথা শুনে মহাযশস্বী যুধিষ্ঠির উত্তর দিলেন—‘ভগবন্! এখন আমি দান-ক্রিয়ার প্রধান ও উৎকৃষ্ট বিধি শুনতে চাই।’
Verse 120
मार्कण्डेय उवाच यत् त्वमिच्छसि राजेन्द्र दानधर्म युधिष्ठिर । इष्ट चेद॑ं सदा महूं राजन् गौरवतस्तथा
মার্কণ্ডেয় বললেন—হে রাজেন্দ্র যুধিষ্ঠির! তুমি আমার কাছে যে দানধর্ম শুনতে চাও, তা তার গৌরব ও মান্যতার কারণেই আমার কাছে সর্বদা প্রিয়, হে রাজন।
Verse 121
शृणु दानरहस्यानि श्रुतिस्मृत्युदितानि च । छायायां करिण: श्राद्ध तत् कर्णपरिवीजिते । दश कल्पायुतानीह न क्षीयेत युधिछ्िर
শ্রুতি ও স্মৃতিতে বর্ণিত দানের গূঢ় তত্ত্বগুলি শোনো। হে যুধিষ্ঠির! হাতির ছায়ায়—যেখানে তার কানের দোলায় বাতাসের মতো শীতল ঝাপটা লাগে—যে শ্রাদ্ধ করা হয়, তার পুণ্য এখানে দশ ‘কল্পায়ুত’ পর্যন্ত ক্ষয় হয় না।
Verse 122
जीवनाय समाक्तलिन्नं वसु दत्त्वा महीयते । वैश्यं तु वासयेद् यस्तु सर्वयज्ञै: स इष्टवान्
যে অন্যের জীবনধারণের জন্য ধন দান করে, সে সম্মানিত হয়। আর যে কোনো বৈশ্যকে বাসস্থান ও আশ্রয় দেয়, তাকে সকল যজ্ঞ সম্পন্নকারী বলে গণ্য করা হয়।
Verse 123
जो जीविकाके लिये राँधा हुआ अन्नका दान करता है, वह स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। जो आश्रयकी खोज करनेवाले राहगीर-अतिथिको ठहरनेके लिये जगह दे वह सम्पूर्ण यज्ञोंका अनुष्ठान पूर्ण कर लेता है ।।
মার্কণ্ডেয় বললেন— যে জীবিকার জন্য রান্না করা অন্ন দান করে, সে স্বর্গলোকে সুপ্রতিষ্ঠিত হয়। আর যে আশ্রয়প্রার্থী পথিক-অতিথিকে থাকার স্থান দেয়, সে যেন সমস্ত যজ্ঞের অনুষ্ঠান সম্পূর্ণ করে। যেমন ভারবাহী নৌকা প্রতিস্রোতেও এগিয়ে চলে, তেমনি অতিথিসেবা ও অন্নদানের পুণ্যপ্রভাবে সে মহাপাপ থেকে মুক্ত হয়॥
Verse 124
विप्लवे विप्रदत्तानि दधिमस्त्वक्षयाणि च । पूर्वकी ओर बहनेवाली नदीका प्रवाह जहाँ पश्चिमकी ओर मुड़ गया हो
মার্কণ্ডেয় বললেন— উপদ্রবের সময়েও ব্রাহ্মণকে দেওয়া দধি, মটকা ইত্যাদি দান অক্ষয় পুণ্যদায়ক বলা হয়েছে। যেখানে পূর্বমুখী নদীপ্রবাহ পশ্চিমমুখে ঘুরে যায়, সেই স্থান ‘প্রতিস্রোত’ তীর্থ নামে খ্যাত; সেখানে উৎকৃষ্ট অশ্বদান অক্ষয় পুণ্য দেয়। অন্নের সন্ধানে বিচরণকারী অতিথিরূপ ইন্দ্রকে ভোজনে তৃপ্ত করলে তাও অক্ষয় পুণ্যের কারণ হয়। নদীর মহাপ্রবাহে গ্রহণকালে ব্রাহ্মণদের দধিমণ্ড ও পূর্বোক্ত দান অক্ষয় পুণ্য প্রদান করে; এবং সেখানে স্নান করলে মানুষ মহাপাপ থেকে মুক্ত হয়। পৰ্ব্বে দান দ্বিগুণ, ঋতুর আরম্ভে দান দশগুণ ফলদায়ক; উত্তরায়ণ-দক্ষিণায়ণের সূচনা, বিষুবযোগ, মিথুন-কন্যা-ধনু-মীন সংক্রান্তি এবং চন্দ্র-সূর্যগ্রহণে প্রদত্ত দান অক্ষয় বলে ঘোষিত॥
Verse 125
अयने विषुवे चैव षडशीतिमुखेषु च । चन्द्रसूयोपरागे च दत्तमक्षयमुच्यते
মার্কণ্ডেয় বললেন— অয়নের সূচনা (উত্তরায়ণ-দক্ষিণায়ণ), বিষুবযোগ, ষড়শীতিমুখ এবং চন্দ্রগ্রহণ ও সূর্যগ্রহণে প্রদত্ত দান অক্ষয় বলে ঘোষিত। পর্বে দান দ্বিগুণ, ঋতুর আরম্ভে দান দশগুণ ফলদায়ক; উত্তরায়ণ বা দক্ষিণায়ণের সূচনা, বিষুবযোগ, মিথুন-কন্যা-ধনু-মীন সংক্রান্তি এবং চন্দ্র-সূর্যগ্রহণে প্রদত্ত দান অক্ষয় বলে মান্য॥
Verse 126
ऋतुषु दशगुणं वदन्ति दत्तं शतगुणमृत्वयनादिदषु ध्रुवम् । भवति सहस्रगुणं दिनस्य राहो- विंषुवति चाक्षयमश्लुते फलम्
মার্কণ্ডেয় বললেন— ঋতুর আরম্ভে প্রদত্ত দান দশগুণ পুণ্য দেয়; অয়ন প্রভৃতি পবিত্র সন্ধিক্ষণে প্রদত্ত দান নিশ্চিতই শতগুণ ফল দেয়। রাহুর দিনে—অর্থাৎ গ্রহণের দিনে—দেওয়া দান সহস্রগুণ ফলদায়ক; আর বিষুবযোগে প্রদত্ত দান অক্ষয় ফল প্রদান করে॥
Verse 127
नाभूमिदो भूमिमश्राति राजन् नायानदो यानमारुह्य याति । यान् यान् कामानू ब्राह्मुणे भ्यो ददाति तांसतान् कामान् जायमान: स भुड्क्ते
মার্কণ্ডেয় বললেন— হে রাজন! যে ভূমিদান করেনি, সে পরলোকে পৃথিবীর ভোগ পায় না; আর যে যান দান করেনি, সে সেখানে যানে আরোহন করে যেতে পারে না। এই জন্মে মানুষ ব্রাহ্মণদের যে যে কাম্য বস্তু দান করে, পরজন্মে জন্ম নিয়ে সে সেই সেই ভোগই লাভ করে ভোগ করে॥
Verse 128
अग्नेरपत्यं प्रथम सुवर्ण भूर्वैष्णवी सूर्यसुताश्च॒ गाव: । लोकास्त्रयस्तेन भवन्ति दत्ता यः काज्चनं गाश्न महीं च दद्यात्
মার্কণ্ডেয় বললেন—সোনা অগ্নির প্রথম সন্তান বলে ঘোষিত; পৃথিবী বৈষ্ণবী (বিষ্ণুর অধিষ্ঠিতা), আর গাভীগণ সূর্যের কন্যা বলে কথিত। অতএব যে সোনা, গাভী ও ভূমি দান করে, সে যেন তিন লোকই দান করল।
Verse 129
सुवर्ण अग्निकी प्रथम संतान है। भूमि भगवान् विष्णुकी पत्नी है तथा गौएँ भगवान् सूर्यकी कन्याएँ हैं, अतः जो कोई सुवर्ण, गौ और पृथ्वीका दान करता है, उसके द्वारा तीनों लोकोंका दान सम्पन्न हो जाता है ।।
মার্কণ্ডেয় বললেন—সোনা অগ্নির প্রথম সন্তান; ভূমি ভগবান বিষ্ণুর সহধর্মিণী, আর গাভীগণ ভগবান সূর্যের কন্যা। অতএব যে সোনা, গাভী ও ভূমি দান করে, সে যেন ত্রিলোক দান করল। সত্যই, ত্রিলোকে দানের চেয়ে অধিক শাশ্বত পুণ্যদায়ক কর্ম কখনও ছিল না—এখনই বা কীভাবে হবে? তাই প্রজ্ঞাবানগণ দানকেই সর্বোচ্চ পুণ্যকর্ম বলে ঘোষণা করেন।
Verse 199
इस प्रकार श्रीमह्याभारत वनपवके अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें इन्द्रहुम्नोपाख्यानविषयक एक सौ निन्यानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ
এইভাবে শ্রীমহাভারতের বনপর্বের অন্তর্গত মার্কণ্ডেয়-সমাস্যাপর্বে ইন্দ্রদ্যুম্নোপাখ্যান-বিষয়ক একশো নিরানব্বইতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।
Verse 200
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि दानमाहात्म्ये द्विशततमो<5ध्याय:
ইতি শ্রীমহাভারতের বনপর্বে, মার্কণ্ডেয়-সমাস্যাপর্বের অন্তর্গত দান-মাহাত্ম্য বিষয়ে দ্বিশতম অধ্যায় সমাপ্ত।
Verse 233
प्रयच्छन्ति तु ये राजन् नोपसर्पन्ति ते समम् | इसलिये तुम सभी उपायोंसे अतिथियोंको भोजन देनेका प्रयत्न करो। राजन्! जो लोग अतिथिको चरण धोनेके लिये जल
মার্কণ্ডেয় বললেন—হে রাজন, যারা অতিথিকে দান করে তারা যারা দান করে না তাদের সমান পরিণতি ভোগ করে না। অতএব সর্ব উপায়ে অতিথিদের ভোজন করাতে চেষ্টা করো। হে রাজন, যারা অতিথিকে পা ধোয়ার জন্য জল, পায়ে মাখার জন্য তেল, আলোর জন্য প্রদীপ, আহারের জন্য অন্ন এবং বাসের জন্য স্থান দেয়—তারা কখনও যমের ধামে যায় না।
Verse 296
न तारयति दातार ब्राह्मणं नैव नैव तु । एक गौ एक ही ब्राह्मणको देनी चाहिये; बहुतोंको कभी नहीं (क्योंकि एक ही गौ यदि बहुतोंको दी गयी
মার্কণ্ডেয় বললেন—এমন দান দাতাকে বা ব্রাহ্মণ গ্রহীতাকে—কাউকেই পার করায় না; মোটেই নয়। এক গাভী এক জন ব্রাহ্মণকেই দান করা উচিত, অনেককে নয়; কারণ দানকৃত গাভী বিক্রি করে তার মূল্য ভাগ করলে দানের পবিত্রতা নষ্ট হয়। দান করা গাভী বিক্রি হলে দাতার তিন পুরুষের ক্ষতি হয়; সে দাতা বা ব্রাহ্মণ—কাউকেই উদ্ধার করে না।
Verse 303
सुवर्णानां शतं तेन दत्त भवति शाश्वतम् । जो उत्तम वर्णवाले विशुद्ध ब्राह्मणको सुवर्ण-दान करता है उसे निरन्तर सौ स्वर्णमुद्राओंके दानका फल प्राप्त होता है
মার্কণ্ডেয় বললেন—সেই কর্মে শত স্বর্ণদানের ফল চিরস্থায়ী হয়। যে ব্যক্তি উৎকৃষ্ট গুণসম্পন্ন শুদ্ধ ব্রাহ্মণকে স্বর্ণ দান করে, সে নিরন্তর শত স্বর্ণমুদ্রা দানের সমান স্থায়ী পুণ্য লাভ করে।
Verse 316
स निस्तरति दुर्गाणि स्वर्गलोक॑ च गच्छति । जो लोग कंधेपर जुआ उठानेमें समर्थ बलवान बैल ब्राह्मणोंको दान करते हैं, वे दुःख और संकटोंसे पार होकर स्वर्गलोकमें जाते हैं
মার্কণ্ডেয় বললেন—সে দুর্গম বিপদ অতিক্রম করে স্বর্গলোকে গমন করে। যারা জোয়াল বহনে সক্ষম বলবান ষাঁড় ব্রাহ্মণদের দান করে, তারা দুঃখ ও সংকট পেরিয়ে স্বর্গে পৌঁছে।
Verse 326
दातारं हानुगच्छन्ति सर्वे कामाभिवाज्छिता: । जो दिद्वान् ब्राह्मणको भूमिदान करता है, उस दाताके पास सभी मनोवाजञ्छित भोग स्वतः आ जाते हैं
মার্কণ্ডেয় বললেন—দাতার পেছনে সব অভীষ্ট কামনা চলতে থাকে। যে জ্ঞানী ব্যক্তি ব্রাহ্মণকে ভূমিদান করে, তার কাছে সব মনোবাঞ্ছিত ভোগ ও সমৃদ্ধি আপনিই এসে উপস্থিত হয়।
Verse 343
अन्नदातृसम: सो<पि कीर््यते नात्र संशय: । यदि कोई रास्तेके थके-माँदे
মার্কণ্ডেয় বললেন—সেও অন্নদাতার সমান বলে কীর্তিত হয়; এতে সন্দেহ নেই। পথে ক্লান্ত, কৃশ, ধূলিধূসর পায়ে ক্ষুধা-তৃষ্ণায় কাতর পথিক যদি জিজ্ঞেস করে—“এখানে কি কেউ অন্ন দেবে?” তখন যে বিদ্বান তাকে যেখানে অন্ন পাওয়া যায় সেই পথ দেখায়, সেও অন্নদাতার তুল্য গণ্য হয়।
Verse 353
न हीदृशं पुण्यफलं विचित्रमिह विद्यते । अतः युधिष्ठिर! तुम सारे दानोंको छोड़कर केवल अन्नदान करते रहो। इस संसारमें अन्नदानके समान विचित्र एवं पुण्यदायक दूसरा कोई दान नहीं है
মার্কণ্ডেয় বললেন—এই জগতে এর মতো আশ্চর্য পুণ্যফল আর কিছু নেই। অতএব, হে যুধিষ্ঠির! অন্যান্য দান ত্যাগ করে কেবল অন্নদানই অবিরত করো। মানবজীবনে অন্নদানসম দান নেই—এর ফল যেমন বিস্ময়কর, তেমনি পুণ্যবর্ধক।
Verse 366
स तेन कर्मणा$5प्रोति प्रजापतिसलोकताम् | जो अपनी शक्तिके अनुसार अच्छे ढंगसे तैयार किया हुआ भोजन ब्राह्मणोंको अर्पित करता है वह उस पुण्यकर्मके प्रभावसे प्रजापतिके लोकमें जाता है
মার্কণ্ডেয় বললেন—সে সেই পুণ্যকর্মের প্রভাবে প্রজাপতির লোক লাভ করে। যে ব্যক্তি নিজের সামর্থ্য অনুযায়ী উত্তমভাবে প্রস্তুত করা ভোজন ব্রাহ্মণদের নিবেদন করে, সে সেই পুণ্যের বলেই প্রজাপতি-লোকে গমন করে।
Verse 4736
विश्रमेद् यत्र वै श्रान्त: पुरुषो5ध्वनि कर्शित: । उसके मार्ममें जलरहित शून्य आकाशमात्र है। वह देखनेमें बड़ा भयानक और दुर्गम है। वहाँ न तो वृक्षोंकी छाया है
বৈশম্পায়ন বললেন—এমন এক স্থান, যেখানে পথের ক্লান্তি ও কষ্টে জর্জরিত মানুষ বিশ্রাম চাইবে। কিন্তু সেখানে জল নেই—আকাশের মতো শূন্য বিস্তীর্ণ প্রান্তর মাত্র। দেখতে ভয়ংকর, অতিক্রম করাও দুরূহ; না আছে বৃক্ষছায়া, না জল, না এমন কোনো আশ্রয় যেখানে পথশ্রান্ত প্রাণী এক মুহূর্তও থামতে পারে।
Verse 5636
अन्तरा चैव नाश्नाति तस्य लोका हानामया: । जो लोग छठी राततक उपवास करते हैं
বৈশম্পায়ন বললেন—যে মধ্যবর্তী সময়ে আহার করে না, সে ক্ষয় ও রোগমুক্ত লোক লাভ করে। যারা ষষ্ঠ রাত্রি পর্যন্ত উপবাস করে, তারা ময়ূর-যোজিত বিমানে গমন করে। হে পাণ্ডুনন্দন! যারা একবার আহার করে সেই আহারেই ভর করে তিন রাত্রি কাটায় এবং মাঝে আর কিছু খায় না, তারা রোগ-শোকহীন পুণ্যলোক প্রাপ্ত হয়।
Verse 9836
विकारि तेषां राजेन्द्र सुदुष्करकरं मन: । राजेन्द्र! चक्षु आदि इन्द्रियोंके आहारको छोड़ देना कठिन नहीं है; क्योंकि इन्द्रियोंके छहों विषयोंका उपभोग न करनेसे वह अपने-आप सुगमतासे हो जाता है
যুধিষ্ঠির বললেন—হে রাজেন্দ্র! তাদের মধ্যে মনই সর্বাধিক বিকারগ্রস্ত; তাই আত্মসংযম অত্যন্ত কঠিন হয়ে ওঠে। চক্ষু প্রভৃতি ইন্দ্রিয়ের ‘আহার’—অর্থাৎ বিষয়ভোগ—ত্যাগ করা তত কঠিন নয়; কারণ ছয় বিষয় ভোগ না করলে ইন্দ্রিয়সমূহ আপনাতেই সহজে নিবৃত্ত হয়। কিন্তু মন অতিশয় চঞ্চল; সুতরাং ভাবশুদ্ধি ব্যতীত তাকে বশ করা অত্যন্ত দুরূহ।
The dilemma is how a person who knows dharma can still drift into wrongdoing by rationalizing greed: performing outwardly ‘righteous’ acts as a pretext for wealth, and defending choices with scriptural rhetoric despite ethical decay.
Ethical failure is processual and preventable: identify faults early with prajñā, cultivate steadiness amid pleasure and pain, and keep sustained company with sādhus—thereby generating stable dharma-buddhi rather than reactive desire-based action.
No explicit phalaśruti is stated; the meta-commentary appears as the brāhmaṇa’s validation of the teaching’s authority and the chapter’s shift to a structured metaphysical enumeration, positioning ethical discipline within a broader account of mind and constituents.
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