Adhyaya 93
Udyoga ParvaAdhyaya 9361 Verses

Adhyaya 93

उद्योगपर्व — अध्याय ९३: कृष्णस्य धृतराष्ट्रोपदेशः (Kṛṣṇa’s Counsel to Dhṛtarāṣṭra in the Assembly)

Upa-parva: Krishna–Dhṛtarāṣṭra Saṃvāda (Peace Counsel in the Royal Assembly)

Vaiśaṃpāyana reports that, as the assembled rulers sit in silence, Kṛṣṇa rises and speaks with deliberate public audibility, addressing Dhṛtarāṣṭra as the responsible sovereign. The discourse argues for śama (conciliation) between Kurus and Pāṇḍavas as an attainable policy outcome if the king chooses to act. Kṛṣṇa frames the Kuru lineage as eminent and ethically obligated to embody compassion, non-cruelty, straightforwardness, forbearance, and truth, warning that neglect will allow a severe crisis to destroy the earth’s political order. He assigns agency: peace depends on Dhṛtarāṣṭra and on Kṛṣṇa’s mediation—Dhṛtarāṣṭra should discipline his sons, while Kṛṣṇa will stabilize the opposing side. The speech emphasizes pragmatic statecraft: unity with the Pāṇḍavas increases security and legitimacy, whereas war entails mutual depletion and civilian ruin. Kṛṣṇa also critiques assembly ethics—when dharma is injured by adharma and truth by falsehood under observers, the sabhā itself is morally compromised. He concludes by urging Dhṛtarāṣṭra to grant the Pāṇḍavas their due share, avert large-scale loss, and restore stable governance; the gathered kings inwardly approve, yet none speaks immediately after.

Chapter Arc: रात्रि के अवसान पर विदुर के धर्मार्थकाम-सम्बन्धी विविध वचनों को सुनते हुए श्रीकृष्ण का मन स्थिर और तेजस्वी रहता है—मानो नीति की धारा के बीच स्वयं नीति का स्रोत बैठा हो। → प्रभात होते ही अमिततेजस्वी शौरि राजसभा की ओर प्रस्थान करते हैं। सभाद्वार पर पहुँचकर, कैलास-शिखर के समान रथ से उतरते हैं; भीतर धृतराष्ट्र, भीष्म, द्रोण और समस्त कुरुवृद्ध-युवा उपस्थित हैं। कर्ण और दुर्योधन श्रीकृष्ण के निकट ही एक आसन पर बैठकर अपने ‘अमर्ष’ को दबाए रखते हैं—सभा में शांति के नीचे ज्वाला धधकती है। → माधव मुसकराते हुए धृतराष्ट्र तथा भीष्म-द्रोण आदि को यथावय अभिवादन/संवाद करते हैं; उसी क्षण सभा के मध्य में पीताम्बरधारी श्यामकान्ति श्रीकृष्ण स्वर्णपात्रस्थ नीलमणि के समान दीप्त हो उठते हैं और समस्त राजाओं की दृष्टि अमृत की तरह तृप्त न होने वाली होकर उन्हीं पर टिक जाती है। → सभा-प्रवेश, आसन-व्यवस्था और दृष्टि-केन्द्र का स्थिर होना—दूतकार्य के लिए मंच तैयार हो जाता है: एक ओर धर्मात्मा दूत, दूसरी ओर क्रोध से भरे कर्ण-दुर्योधन, और बीच में मौन प्रतीक्षा करती कुरुसभा। → अब श्रीकृष्ण क्या वचन कहेंगे—क्या यह सभा शांति का द्वार बनेगी या युद्ध का शंख?

Shlokas

Verse 1

इस प्रकार श्रीमह्याभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वनें श्रीकृष्णवाक्यविषयक तिरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ९३ ॥। [दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल २३ “लोक हैं।] अपन क्ाा बछ। अर: 2 चतुर्नवतितमो< ध्याय: दुर्योधन एवं शकुनिके द्वारा बुलाये जानेपर भगवान्‌ श्रीकृष्णका रथपर बैठकर प्रस्थान एवं कौरवसभामें प्रवेश और स्वागतके पश्चात्‌ आसनग्रहण वैशम्पायन उवाच तथा कथयतोरेव तयोरबुद्धिमतोस्तदा । शिवा नक्षत्रसम्पन्ना सा व्यतीयाय शर्वरी,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! उस समय बुद्धिमान श्रीकृष्ण तथा विदुरके इस प्रकार वार्तालाप करते हुए ही वह नक्षत्रोंसे सुशोभित मंगलमयी रात्रि बहुत-सी व्यतीत हो चुकी थी इस प्रकार श्रीमहाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें श्रीकृष्णका सभामें प्रवेशविषयक चौरानबेवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ९४ ॥ [दाक्षिणात्य अधिक पाठके १० ६ श्लोक मिलाकर कुल ६४ ६ “लोक हैं।] न२््च्स्स्स्ारिस्सि ह्य £:ानप्ट् पञ्चनवतितमो< ध्याय: कौरवसभामें श्रीकृष्णका प्रभावशाली भाषण वैशम्पायन उवाच तेष्वासीनेषु सर्वेषु तूष्णीम्भूतेषु राजसु । वाक्यमभ्याददे कृष्ण: सुदंष्टरो दुन्दुभिस्वन:

বৈশম্পায়ন বললেন—হে জনমেজয়! সেই সময় প্রজ্ঞাবান শ্রীকৃষ্ণ ও বিদুর এইরূপ কথোপকথন করতেই নক্ষত্রশোভিত সেই মঙ্গলময় রাত্রি অধিকাংশই অতিবাহিত হয়ে গেল।

Verse 2

धर्मार्थकामयुक्ताश्च विचित्रार्थपदाक्षरा: । शृण्वतो विविधा वाचो विदुरस्यथ महात्मन:,महात्मा श्रीकृष्ण धर्म, अर्थ और कामके विषयमें अनेक प्रकारकी बातें कहते रहे। उनकी वाणीके पद, अर्थ और अक्षर बड़े विचित्र थे; अतः महात्मा विदुर भगवानकी कही हुई उन विविध वार्ताओंको प्रसन्नता-पूर्वक सुनते रहे। इस प्रकार अमिततेजस्वी श्रीकृष्ण और विदुर दोनों ही एक-दूसरेकी मनोनुकूल कथावार्तामें इतने तन्‍्मय थे कि बिना इच्छाके ही उनकी वह रात्रि बहुत-सी व्यतीत हो गयी थी

বৈশম্পায়ন বললেন—মহাত্মা বিদুর শুনতে থাকলেন, আর শ্রীকৃষ্ণ ধর্ম, অর্থ ও কাম সম্বন্ধে নানাবিধভাবে কথা বলতে লাগলেন। তাঁর বাক্যের পদ, অর্থ ও অক্ষর ছিল বিচিত্র ও মনোহর; তাই বিদুর আনন্দচিত্তে সেই নানা কথোপকথন শ্রবণ করলেন।

Verse 3

कथाभिरनुरूपाभि: कृष्णस्यामिततेजस: । अकामस्येव कृष्णस्य सा व्यतीयाय शर्वरी,महात्मा श्रीकृष्ण धर्म, अर्थ और कामके विषयमें अनेक प्रकारकी बातें कहते रहे। उनकी वाणीके पद, अर्थ और अक्षर बड़े विचित्र थे; अतः महात्मा विदुर भगवानकी कही हुई उन विविध वार्ताओंको प्रसन्नता-पूर्वक सुनते रहे। इस प्रकार अमिततेजस्वी श्रीकृष्ण और विदुर दोनों ही एक-दूसरेकी मनोनुकूल कथावार्तामें इतने तन्‍्मय थे कि बिना इच्छाके ही उनकी वह रात्रि बहुत-सी व्यतीत हो गयी थी

বৈশম্পায়ন বললেন—অমিততেজস্বী কৃষ্ণের উপযুক্ত সেই কথোপকথনে রাত্রি কেটে গেল; এমনকি কৃষ্ণেরও মনে হল, যেন তাঁর অইচ্ছাতেই রাতটি সরে গেল। ধর্ম ও সদাচারের পরস্পর-প্রিয় আলাপে উভয়েই এমন নিমগ্ন ছিলেন যে সময়ের বোধ রইল না।

Verse 4

ततस्तु स्वरसम्पन्ना बहव: सूतमागधा: । शड्खदुन्दुभिनिर्घोषै: केशवं प्रत्यवोधयन्‌,तदनन्तर मधुर स्वरसे युता बहुत-से सूत और मागध शंख और दुन्दुभियोंके घोषसे भगवान्‌ श्रीकृष्णको जगाने लगे

তারপর মধুর ও সুসংস্কৃত কণ্ঠস্বরসম্পন্ন বহু সূত ও মাগধ শঙ্খ ও দুন্দুভির ধ্বনিতে কেশবকে জাগাতে লাগল।

Verse 5

तत उत्थाय दाशाह ऋषभ: सर्वसात्वताम्‌ | सर्वमावश्यकं चक्रे प्रातःकार्य जनार्दन:,तब समस्त यदुवंशियोंके शिरोमणि दशार्हनन्दन श्रीकृष्णने शय्यासे उठकर प्रात:कालका समस्त आवश्यक कर्म क्रमश: सम्पन्न किया

তখন দাশার্হদের শ্রেষ্ঠ ও সকল সাত্বতের শিরোমণি জনার্দন শ্রীকৃষ্ণ শয্যা ত্যাগ করে উঠলেন এবং প্রাতঃকালের সকল আবশ্যক কর্ম যথাক্রমে সম্পন্ন করলেন।

Verse 6

कृतोदकानुजप्य: स हुताग्नि: समलंकृत: । ततश्नादित्यमुद्यन्तमुपातिषछतत माधव:,संध्या-तर्पण और जप करके अन्निहोत्र करनेके पश्चात्‌ माधवने अलंकृत होकर उदयकालमें सूर्यका उपस्थान किया

সন্ধ্যা-তর্পণ ও জপ সম্পন্ন করে এবং যথাবিধি অগ্নিহোত্র করে মাধব অলংকৃত হয়ে প্রভাতে উদীয়মান সূর্যের উপাসনায় দাঁড়ালেন।

Verse 7

अथ दुर्योधन: कृष्णं शकुनिश्चापि सौबल: । संध्यां तिष्ठन्तम भ्येत्य दाशाहमपराजितम्‌,इसी समय राजा दुर्योधन और सुबलपुत्र शकुनि भी संध्योपासनामें लगे हुए अपराजित वीर दशार्हनन्दन श्रीकृष्णके पास आये और उनसे इस प्रकार बोले--“गोविन्द! महाराज धृतराष्ट्र सभामें आ गये हैं। भीष्म आदि कौरव तथा अन्य समस्त भूपाल भी वहाँ उपस्थित हैं। जैसे स्वर्गमें देवता इन्द्रका आवाहन करते हैं, इसी प्रकार भीष्म आदि सब लोग आपसे वहाँ दर्शन देनेकी प्रार्थना करते हैं।! यह सुनकर भगवान्‌ श्रीकृष्णने परम मधुर सान्त्वनापूर्ण वचनद्वारा उन दोनोंका अभिनन्दन किया

বৈশম্পায়ন বললেন— তখন রাজা দুর্যোধন ও সুবলপুত্র শকুনি, সন্ধ্যা-উপাসনায় রত দাশার্হবংশীয় অপরাজিত বীর শ্রীকৃষ্ণের কাছে এসে বলল— “গোবিন্দ! মহারাজ ধৃতরাষ্ট্র সভায় প্রবেশ করেছেন। ভীষ্মপ্রমুখ কৌরব-বৃদ্ধগণ এবং অন্যান্য সকল রাজাও সেখানে উপস্থিত। যেমন স্বর্গে দেবতারা শক্র (ইন্দ্র)-কে আহ্বান করে, তেমনই ভীষ্মাদি সকলেই আপনার দর্শন প্রার্থনা করছেন।” এ কথা শুনে ভগবান শ্রীকৃষ্ণ অতিশয় মধুর ও সান্ত্বনাময় বাক্যে তাদের দুজনকে অভ্যর্থনা করলেন।

Verse 8

आचतक्षेतां तु कृष्णस्य धृतराष्ट्रं सभागतम्‌ । कुरूंश्व॒ भीष्मप्रमुखान्‌ राज्ञ: सर्वाश्व पार्थिवान्‌,इसी समय राजा दुर्योधन और सुबलपुत्र शकुनि भी संध्योपासनामें लगे हुए अपराजित वीर दशार्हनन्दन श्रीकृष्णके पास आये और उनसे इस प्रकार बोले--“गोविन्द! महाराज धृतराष्ट्र सभामें आ गये हैं। भीष्म आदि कौरव तथा अन्य समस्त भूपाल भी वहाँ उपस्थित हैं। जैसे स्वर्गमें देवता इन्द्रका आवाहन करते हैं, इसी प्रकार भीष्म आदि सब लोग आपसे वहाँ दर्शन देनेकी प्रार्थना करते हैं।! यह सुनकर भगवान्‌ श्रीकृष्णने परम मधुर सान्त्वनापूर्ण वचनद्वारा उन दोनोंका अभिनन्दन किया

বৈশম্পায়ন বললেন— তখন তারা শ্রীকৃষ্ণকে জানাল— “ধৃতরাষ্ট্র সভায় এসেছেন; ভীষ্মপ্রমুখ কুরুগণ এবং সকল রাজাই সেখানে সমবেত। স্বর্গে দেবতারা যেমন শক্রকে আহ্বান করে, তেমনই তারা আপনাকে আহ্বান করছে— আপনি এসে দর্শন দিন।” এ কথা শুনে ভগবান শ্রীকৃষ্ণ অতিমধুর, সান্ত্বনাময় বাক্যে তাদের অভ্যর্থনা করলেন।

Verse 9

त्वामर्थयन्ते गोविन्द दिवि शक्रमिवामरा: । तावभ्यनन्दद्‌ गोविन्द: साम्ना परमवल्गुना,इसी समय राजा दुर्योधन और सुबलपुत्र शकुनि भी संध्योपासनामें लगे हुए अपराजित वीर दशार्हनन्दन श्रीकृष्णके पास आये और उनसे इस प्रकार बोले--“गोविन्द! महाराज धृतराष्ट्र सभामें आ गये हैं। भीष्म आदि कौरव तथा अन्य समस्त भूपाल भी वहाँ उपस्थित हैं। जैसे स्वर्गमें देवता इन्द्रका आवाहन करते हैं, इसी प्रकार भीष्म आदि सब लोग आपसे वहाँ दर्शन देनेकी प्रार्थना करते हैं।! यह सुनकर भगवान्‌ श्रीकृष्णने परम मधुर सान्त्वनापूर्ण वचनद्वारा उन दोनोंका अभिनन्दन किया

“গোবিন্দ! তারা আপনাকে ঠিক তেমনই প্রার্থনা করছে, যেমন স্বর্গে অমরগণ শক্রকে প্রার্থনা করে।” এ কথা শুনে গোবিন্দ অতিশয় মধুর ও সান্ত্বনাময় বাক্যে তাদের দুজনকে অভ্যর্থনা করলেন।

Verse 10

ततो विमल आदित्ये ब्राह्मणे भ्यो जनार्दन: । ददौ हिरण्यं वासांसि गाश्षाश्वांक्ष परंतप:,तदनन्तर निर्मल सूर्यदेवका उदय हो जानेपर शत्रुओंको संताप देनेवाले भगवान्‌ जनार्दनने ब्राह्मणोंको सुवर्ण, वस्त्र, गौ तथा घोड़े दान किये। अनेक प्रकारके रत्नोंका दान करके खड़े हुए उन अपराजित दाशा्ह वीरके पास जाकर सारथिने उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया

এরপর নির্মল সূর্য উদিত হলে, শত্রু-সন্তাপক জনার্দন ব্রাহ্মণদের স্বর্ণ, বস্ত্র, গাভী ও অশ্ব দান করলেন।

Verse 11

विसृज्य बहुरत्नानि दाशार्हमपराजितम्‌ । तिष्ठन्तमुपसंगम्य ववन्दे सारथिस्तदा,तदनन्तर निर्मल सूर्यदेवका उदय हो जानेपर शत्रुओंको संताप देनेवाले भगवान्‌ जनार्दनने ब्राह्मणोंको सुवर्ण, वस्त्र, गौ तथा घोड़े दान किये। अनेक प्रकारके रत्नोंका दान करके खड़े हुए उन अपराजित दाशा्ह वीरके पास जाकर सारथिने उनके चरणोंमें मस्तक झुकाया

বহু রত্ন দান করে, সেখানে দাঁড়িয়ে থাকা দাশার্হবংশীয় অপরাজিত বীরের কাছে সারথি এগিয়ে গিয়ে তাঁর চরণে মস্তক নত করে প্রণাম করল।

Verse 12

ततो रथेन शुभ्रेण महता किड्किणीकिना । हयोत्तमयुजा शीघ्रमुपातिषछ्तत दारुक:,इसके बाद क्षुद्र घण्टिकाओंसे विभूषित और उत्तम घोड़ोंसे जुते हुए चमकीले विशाल रथके साथ दारुक शीघ्र ही भगवान्‌की सेवामें उपस्थित हुआ

তখন দারুক শ্রেষ্ঠ অশ্বযোজিত, উজ্জ্বল ও বৃহৎ—ক্ষুদ্র কিঙ্কিণীর ঝংকারে অলংকৃত—রথসহ দ্রুত প্রভুর সেবায় উপস্থিত হল।

Verse 13

(तस्मै रथवरो युक्त: शुशुभे लोकविश्रुत: । वाजिभि: शैब्यसुग्रीवमेघपुष्पबनलाहकै: ।। भगवानके लिये जोतकर खड़ा किया हुआ वह विश्वविख्यात श्रेष्ठ रथ बड़ी शोभा पा रहा था। उसमें शैब्य, सुग्रीव, मेघपुष्प और बलाहक नामवाले चार घोड़े जुते हुए थे। शैब्यस्तु शुकपत्राभ: सुग्रीव: किंशुकप्रभ: । मेघपुष्पो मेघवर्ण: पाण्डुरस्तु बलाहक: ।। उनमेंसे शैब्यका रंग तोतेकी पाँखके समान हरा था। सुग्रीव पलासके फूलकी भाँति लाल था। मेघपुष्पकी कान्ति मेघोंके ही समान थी और बलाहक सफेद था। दक्षिणं चावहच्छैब्य: सुग्रीव: सव्यतो5वहत्‌ । पृष्ठवाहौ तयोरास्तां मेघपुष्पबनलाहकौ ।। शैब्य दाहिने भागमें जुतकर उस रथका वहन करता था और सुग्रीव बाँयें भागमें। मेघपुष्प और बलाहक क्रमश: इनके पीछे जुते हुए थे। वैनतेय: स्थितस्तस्यां प्रभाकरमिव स्पृशन्‌ । तस्य सत्त्ववत: केतौ भुजगारिरशो भत ।। सत्वगुणके अधिष्ठानस्वरूप भगवान्‌ श्रीकृष्णके रथमें लगे हुए ध्वजदण्डकी उस पताकामें सूर्यका स्पर्श करते हुए-से सर्पशत्रु विनतानन्दन गरुड विराज रहे थे। तस्य कीर्तिमतस्तेन भास्वरेण विराजता । शुशुभे स्यन्दनश्रेष्ठ: पतगेन्द्रेण केतुना ।। कीर्तिमान्‌ श्रीकृष्णका वह श्रेष्ठ रथ उस उज्ज्वल एवं प्रकाशमान गरुडथ्वजके द्वारा बड़ी शोभा पा रहा था। रुक्मजालै: पताकाभि: सौवर्णेन च केतुना । बभूव स रथश्रेष्ठ; कालसूर्य इवोदित: ।। सोनेकी जालियों, पताकाओं तथा सुवर्णमय ध्वजके द्वारा भगवान्‌का वह उत्तम रथ प्रलयकालमें उदित हुए सूर्यके समान उद्धासित हो रहा था। पक्षिध्वजवितानैश्न रुक्मजालकृतान्तरै: । दण्डमार्गविभागैश्व सुकृतैर्विश्वकर्मणा ।। प्रवालमणिहेमैश्व मुक्तावैडूर्य भूषणै: । किड्किणीशतसड्चैश्व वालजालकृतान्तरै: ।। कार्तस्वरमयीभिश्न पद्मिनीभिरलंकृत: । शुशुभे स्यन्दनश्रेष्ठस्तापनीयैश्न पादपै: ।। व्याप्रसिंहवराहैश्न गोवृषैर्मुगपक्षिभि: । ताराभिभर्भास्करैश्लापि वारणैश्न हिरण्मयै: ।। वज्ाड्कुशविमानैश्व कूबरावृत्तसंधिषु ।) उस रथके गरुडध्वज, चँदोवे, स्वर्णजालविभूषित मध्यभाग तथा पृथक्‌-पृथक्‌ दण्डमार्गोका विश्वकर्माने सुन्दर ढंगसे निर्माण किया था। प्रवाल (मूँगा), मणि, सुवर्ण, वैदूर्य, मुक्ता आदि विविध आभूषणों, शत-शत क्षुद्रधघण्टिकाओं तथा वालमणिकी झालरोंसे उस रथके अन्तःप्रदेश सुसज्जित किये गये थे। सुवर्णमय कमलिनियों, तपाये हुए सुवर्णके ही वृक्षों तथा व्याप्र, सिंह, वराह, वृषभ, मृग, पक्षी, तारा, सूर्य और हाथियोंकी स्वर्णमयी प्रतिमाओंसे उस श्रेष्ठ रथकी अत्यन्त शोभा हो रही थी। कूबर (युगंधर)-की गोलाकार संधियोंमें वज्ञ, अंकुश तथा विमानकी आकृतियोंसे उस रथको विभूषित किया गया था। तमुपस्थितमाज्ञाय रथं दिव्यं महामना: । महाभ्रघननिर्घोषं सर्वरत्नविभूषितम्‌,महान्‌ सजल मेघोंकी गर्जनाके समान गम्भीर शब्द करनेवाले तथा सब प्रकारके रत्नोंसे विभूषित हुए उस दिव्य रथको उपस्थित जान अग्नि एवं ब्राह्मणोंको दाहिने करके, गलेमें कौस्तुभभणि डालकर, अपनी उत्कृष्ट शोभासे प्रकाशित होते हुए, कौरवोंसे घिरकर एवं वृष्णिवंशी वीरोंसे सुरक्षित हो समस्त यादवोंको आनन्द प्रदान करनेवाले महामना शूरनन्दन जनार्दन श्रीकृष्ण उस रथपर आरूढ़ हुए

তাঁর জন্য পূর্বেই যোজিত, লোকবিখ্যাত শ্রেষ্ঠ রথটি অপূর্ব শোভা পাচ্ছিল। তাতে শৈব্য, সুগ্রীব, মেঘপুষ্প ও বলাহক—এই চার অশ্ব সংযুক্ত ছিল।

Verse 14

आने प्रदक्षिणं कृत्वा ब्राह्मणांश्व जनार्दन: । कौस्तुभं मणिमामुच्य श्रिया परमया ज्वलन्‌,महान्‌ सजल मेघोंकी गर्जनाके समान गम्भीर शब्द करनेवाले तथा सब प्रकारके रत्नोंसे विभूषित हुए उस दिव्य रथको उपस्थित जान अग्नि एवं ब्राह्मणोंको दाहिने करके, गलेमें कौस्तुभभणि डालकर, अपनी उत्कृष्ट शोभासे प्रकाशित होते हुए, कौरवोंसे घिरकर एवं वृष्णिवंशी वीरोंसे सुरक्षित हो समस्त यादवोंको आनन्द प्रदान करनेवाले महामना शूरनन्दन जनार्दन श्रीकृष्ण उस रथपर आरूढ़ हुए

জনার্দন অগ্নি ও ব্রাহ্মণদের প্রদক্ষিণ করলেন; কৌস্তুভ মণি ধারণ করে পরম শ্রীতে দীপ্ত হয়ে তিনি সেই দিব্য রথের নিকট অগ্রসর হলেন।

Verse 15

कुरुभि: संवृतः कृष्णो वृष्णिभिश्चाभिरक्षित: । आतिष्ठत रथं शौरि: सर्वयादवनन्दन:,महान्‌ सजल मेघोंकी गर्जनाके समान गम्भीर शब्द करनेवाले तथा सब प्रकारके रत्नोंसे विभूषित हुए उस दिव्य रथको उपस्थित जान अग्नि एवं ब्राह्मणोंको दाहिने करके, गलेमें कौस्तुभभणि डालकर, अपनी उत्कृष्ट शोभासे प्रकाशित होते हुए, कौरवोंसे घिरकर एवं वृष्णिवंशी वीरोंसे सुरक्षित हो समस्त यादवोंको आनन्द प्रदान करनेवाले महामना शूरनन्दन जनार्दन श्रीकृष्ण उस रथपर आरूढ़ हुए

কুরুদের দ্বারা পরিবেষ্টিত এবং বৃষ্ণিবীরদের দ্বারা রক্ষিত, সকল যাদবকে আনন্দদানকারী শৌরি শ্রীকৃষ্ণ সেই রথে আরোহণ করলেন।

Verse 16

अन्वारुरोह दाशारईं विदुर: सर्वधर्मवित्‌ । सर्वप्राणभुतां श्रेष्ठ सर्वबुद्धिमतां वरम्‌,समस्त प्राणियोंमें श्रेष्ठ और सम्पूर्ण बुद्धिमानोंमें उत्तम दशार्हनन्दन श्रीकृष्णके पश्चात्‌ समस्त धर्मोंके ज्ञाता विदुरजी भी उस रथपर जा बैठे

সমস্ত প্রাণীদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ ও সকল জ্ঞানীদের মধ্যে উত্তম দাশার্হনন্দন শ্রীকৃষ্ণের পরে, সর্বধর্মবিদ্ বিদুরও সেই রথে আরোহণ করলেন।

Verse 17

ततो दुर्योधन: कृष्णं शकुनिश्चापि सौबल: । द्वितीयेन रथेनैनमन्वयातां परंतपम्‌,तदनन्तर शत्रुओंको संताप देनेवाले श्रीकृष्णके पीछे-पीछे दुर्योधन और सुबलपुत्र शकुनि भी दूसरे रथपर बैठकर चले

তখন শত্রু-তাপকারী শ্রীকৃষ্ণের পশ্চাতে দুর্যোধন এবং সুবলপুত্র শকুনিও দ্বিতীয় রথে আরূঢ় হয়ে অনুসরণ করল।

Verse 18

सात्यकि: कृतवर्मा च वृष्णीनां चापरे रथा: । पृष्ठतो$नुययु: कृष्णं गजैरश्वेः रथैरपि,सात्यकि, कृतवर्मा तथा वृष्णिवंशके दूसरे रथी भी हाथी, घोड़ों तथा रथोंपर बैठकर श्रीकृष्णके पीछे-पीछे गये

সাত্যকি ও কৃতবর্মা, আর বৃষ্ণিকুলের অন্যান্য রথীরা—কেউ গজে, কেউ অশ্বে, কেউ রথে—শ্রীকৃষ্ণের পশ্চাতে পশ্চাতে চলল।

Verse 19

तेषां हेमपरिष्कारैर्युक्ता: परमवाजिभि: । गच्छतां घोषिण श्षित्ररथा राजन्‌ विरेजिरे,राजन्‌! उन सबके जाते समय सोनेके आभूषणोंसे विभूषित, उत्तम घोड़ोंसे जुते हुए एवं गम्भीर घोषयुक्त उनके विचित्र रथ बड़ी शोभा पा रहे थे

হে রাজন্! তারা যাত্রা করলে স্বর্ণালঙ্কারে ভূষিত, উৎকৃষ্ট অশ্বযোজিত ও গম্ভীর ধ্বনিতে নিনাদিত তাদের বিচিত্র রথসমূহ অপূর্ব শোভা পেত।

Verse 20

सम्मृष्टसंसिक्तरज: प्रतिपेदे महापथम्‌ । राजर्षिचरितं काले कृष्णो धीमाडञ्छ़िया ज्वलन्‌,अपनी दिव्य कान्तिसे प्रकाशित होनेवाले परम बुद्धिमान्‌ भगवान्‌ श्रीकृष्ण यथासमय उस विशाल राजपथपर जा पहुँचे, जिसपर पूर्वकालके राजर्षि यात्रा करते थे। वहाँकी धूल झाड़ दी गयी थी और सर्वत्र जलसे छिड़काव किया गया था

নিজ দিব্য কান্তিতে দীপ্ত, পরম বুদ্ধিমান ভগবান শ্রীকৃষ্ণ যথাসময়ে সেই মহারাজপথে উপস্থিত হলেন, যে পথে প্রাচীনকালে রাজর্ষিগণ যাত্রা করতেন। সেখানে ধূলি ঝেড়ে ফেলা হয়েছিল এবং সর্বত্র জল ছিটানো ছিল।

Verse 21

श्रीकृष्णका कौरवस भामें प्रवेश ततः प्रयाते दाशाहिें प्रावाद्यन्तैकपुष्करा: । शड्खाश्न दश्ष्मिरे तत्र वाद्यान्यन्यानि यानि च,भगवान्‌ श्रीकृष्णके प्रस्थान करनेपर ढोल, शंख तथा दूसरे-दूसरे बाजे एक साथ बज उठे

ভগবান শ্রীকৃষ্ণ প্রস্থান করলে তখন একসঙ্গে ঢাক-ঢোল বাজল; সেখানে শঙ্খধ্বনি উঠল, এবং অন্যান্য নানা বাদ্যও বেজে উঠল।

Verse 22

प्रवीरा: सर्वलोकस्य युवान: सिंहविक्रमा: । परिवार्य रथं शौरेरगच्छन्त परंतपा:,शत्रुओंको संताप देनेवाले, सिंहके समान पराक्रमी तथा सम्पूर्ण जगतके प्रख्यात तरुण वीर भगवान्‌ श्रीकृष्णके रथको घेरकर चलते थे

সমগ্র জগতে খ্যাত, সিংহসম বিক্রমশালী ও শত্রু-সন্তাপক তরুণ বীরেরা শৌরি (শ্রীকৃষ্ণ)-এর রথকে পরিবেষ্টন করে অগ্রসর হচ্ছিল।

Verse 23

ततो<न्ये बहुसाहस्रा विचित्राद्भुतवासस: । असिप्रासायुधधरा: कृष्णस्यासन्‌ पुर:सरा:,श्रीकृष्णके आगे चलनेवाले सैनिकोंकी संख्या कई सहस्र थी। उन सबने विचित्र एवं अद्भुत वस्त्र धारण कर रखे थे। उनके हाथोंमें खड्ग और प्रास आदि आयुध शोभा पाते थे

তারপর কৃষ্ণের অগ্রে অগ্রসর হওয়া আরও বহু সহস্র সৈন্য এগিয়ে চলল। তাদের পরিধানে ছিল বিচিত্র ও আশ্চর্য বস্ত্র, আর হাতে ঝলমল করছিল খড়্গ, প্রাস প্রভৃতি অস্ত্র।

Verse 24

गजा: पञ्चशतास्तत्र रथाश्चासन्‌ सहस्रश: । प्रयान्तमन्वयुर्वीरं दाशाहमपराजितम्‌,किसीसे पराजित न होनेवाले दशार्हवंशी वीर भगवान्‌ श्रीकृष्णके पीछे उस यात्राके समय पाँच सौ हाथी और सहस्रों रथ जा रहे थे

সেই যাত্রায় অপরাজিত দাশার্হ বীর শ্রীকৃষ্ণের পশ্চাতে পাঁচ শত হাতি ও সহস্র সহস্র রথ অনুসরণ করছিল।

Verse 25

पुरं कुरूणां संवृत्तं द्रष्टकामं जनार्दनम्‌ । सबालवृद्धं सस्त्रीकं रथ्यागतमरिंदम,शत्रुदमन जनमेजय! उस समय भगवान्‌ श्रीकृष्णका दर्शन करनेके लिये बालक, वृद्ध तथा स्त्रियोंसहित कौरवोंका सारा नगर सड़कपर आ गया था

হে শত্রুদমন জনমেজয়! জনার্দন (শ্রীকৃষ্ণ)-কে দর্শন করার আকাঙ্ক্ষায় কৌরবদের সমগ্র নগর—শিশু, বৃদ্ধ ও নারীদেরসহ—রাস্তায় নেমে এসেছিল।

Verse 26

वेदिकामश्रिताभिक्षू समाक्रान्तान्यनेकश: । प्रचलन्तीव भारेण योषिद्धिर्भवनान्युत,छतोंके सड़ककी ओरवाले भागपर बैठी हुई झुंड-की-झुंड स्त्रियोंके भारसे मानो हस्तिनापुरके वे सारे भवन कम्पित-से हो रहे थे

রাস্তার দিকে মুখ করা ছাদ-বারান্দায় বসা নারীদের ভিড়ের ভারে হস্তিনাপুরের সেই সব ভবন যেন কেঁপে উঠছিল।

Verse 27

स पूज्यमान: कुरुभि: संशृण्वन्‌ मधुरा: कथा: । यथाहईं प्रतिसत्कुर्वन्‌ प्रेक्षमाण: शनैर्यया,भगवान्‌ श्रीकृष्ण कौरवोंसे सम्मानित होते हुए, उनकी मीठी-मीठी बातें सुनते हुए और यथायोग्य उनका भी सत्कार करते हुए धीरे-धीरे सबकी ओर देखते जा रहे थे

কুরুদের দ্বারা সম্মানিত হয়ে শ্রীকৃষ্ণ তাঁদের মধুর বাক্য শুনতে শুনতে, যথোচিতভাবে প্রতিসৎকার করে, সংযতচিত্তে ধীরে ধীরে সকলের দিকে দৃষ্টি মেলে অগ্রসর হলেন।

Verse 28

ततः सभां समासाद्य केशवस्यानुयायिन: । सशड्खेैरवेणुनिर्घोषैर्दिश: सर्वा व्यनादयन्‌,कौरवसभाके समीप पहुँचकर श्रीकृष्णके अनुगामी सेवकोंने शंख और वेणु आदि वाद्योंकी ध्वनिसे सम्पूर्ण दिशाओंको गुँजा दिया

তারপর সভাগৃহের নিকটে পৌঁছে কেশবের অনুচররা শঙ্খধ্বনি, বেণুর উচ্চ সুর ও অন্যান্য বাদ্যের নিনাদে চারিদিকের দিকসমূহকে মুখরিত করে তুলল।

Verse 29

ततः सा समिति: सर्वा राज्ञाममिततेजसाम्‌ | सम्प्राकम्पत हर्षेण कृष्णागमनकाड्क्षया,तत्पश्चात्‌ अमिततेजस्वी राजाओंकी वह सारी सभा भगवान्‌ श्रीकृष्णके शुभागमनकी आकांक्षाके कारण हर्षोल्लाससे चंचल हो उठी

তারপর অপরিমেয় তেজস্বী রাজাদের সেই সমগ্র সভা শ্রীকৃষ্ণের শুভাগমনের আকাঙ্ক্ষায় আনন্দে কেঁপে উঠল ও চঞ্চল হয়ে উঠল।

Verse 30

ततो<भ्याशगते कृष्णे समहृष्यन्‌ नराधिपा: । श्रुत्वा तं रथनिर्घोषं पर्जन्यनिनदोपमम्‌

তারপর কৃষ্ণ নিকটে আসতেই নৃপতিরা পরম আনন্দে উল্লসিত হলেন। তাঁর রথের সেই গর্জন—বর্ষামেঘের নিনাদের তুল্য—শুনে সকলেই উৎকণ্ঠিত উচ্ছ্বাসে ভরে উঠল।

Verse 31

आसाद्य तु सभाद्वारमृषभ: सर्वसात्वताम्‌ | अवतीर्य रथाच्छौरि: कैलासशिखरोपमात्‌

তারপর সভাদ্বারে পৌঁছে সাত্বতদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ শৌরি রথ থেকে অবতরণ করলেন—সে রথ যেন কৈলাসশিখরের ন্যায় মহিমান্বিত।

Verse 32

नवमेघप्रतीकाशां ज्वलन्तीमिव तेजसा । महेन्द्रसदनप्रख्यां प्रविवेश सभां तत:

তখন তিনি সভাগৃহে প্রবেশ করলেন—নবীন মেঘের মতো ঘন-শ্যাম, অথচ তেজে যেন দগ্ধমান; আর সেই সভা নিজেই মহেন্দ্র (ইন্দ্র)-ভবনের ন্যায় দীপ্ত ও মহিমান্বিত ছিল।

Verse 33

श्रीकृष्णके निकट आनेपर उनके रथका मेघगर्जनाके समान गम्भीर घोष सुनकर सभी नरेश रोमांचित हो उठे। सभाके द्वारपर पहुँचकर सर्वयादवशिरोमणि भगवान्‌ श्रीकृष्णने कैलासशिखरके समान समुज्ज्वल रथसे नीचे उतरकर नूतन मेघके समान श्याम तथा तेजसे प्रज्वलित-सी होनेवाली इन्द्रभवनतुल्य उस कौरव-सभाके भीतर प्रवेश किया ॥। ३० -३२ ।। पाणोौ गृहीत्वा विदुरं सात्यकिं च महायशा: । ज्योतींष्यादित्यवद्‌ राजन्‌ कुरून्‌ प्राच्छादयज्छ़िया,राजन! जैसे सूर्य अपनी प्रभासे आकाशके तारोंको तिरोहित कर देते हैं, उसी प्रकार महायशस्वी भगवान्‌ श्रीकृष्ण अपनी दिव्य कान्तिसे कौरवोंको आच्छादित करते हुए विदुर और सात्यकिका हाथ पकड़े सभामें आये

রাজন, মহাযশস্বী ভগবান শ্রীকৃষ্ণ বিদুর ও সাত্যকির হাত ধরে কৌরব-সভায় প্রবেশ করলেন। যেমন সূর্য নিজের আলোয় আকাশের নক্ষত্রসমূহকে অদৃশ্য করে দেয়, তেমনি তাঁর দিব্য শ্রী-জ্যোতিতে কৌরবগণ যেন আচ্ছাদিত ও ম্লান হয়ে গেল।

Verse 34

अग्रतो वासुदेवस्य कर्णदुर्योधनावुभौ । वृष्णय: कृतवर्मा चाप्यासन्‌ कृष्णस्य पृष्ठत:,वसुदेवनन्दन श्रीकृष्णके आगे-आगे कर्ण और दुर्योधन थे और उनके पीछे कृतवर्मा तथा अन्य वृष्णिवंशी वीर थे

বাসুদেব (শ্রীকৃষ্ণ)-এর অগ্রে কর্ণ ও দুর্যোধন—উভয়েই ছিল; আর শ্রীকৃষ্ণের পশ্চাতে কৃতবর্মা ও অন্যান্য বৃষ্ণিবংশীয় বীরেরা উপস্থিত ছিল।

Verse 35

धृतराष्ट्रं पुरस्कृत्य भीष्मद्रोणादयस्तत: । आसनेभ्यो5चलन्‌ सर्वे पूजयन्तो जनार्दनम्‌,उस समय भीष्म और द्रोणाचार्य आदि सब लोग भगवान्‌ श्रीकृष्णका सम्मान करनेके लिये राजा धृतराष्ट्रको आगे करके अपने आसनोंसे उठकर आगे बढ़े

তখন ধৃতরাষ্ট্রকে অগ্রে রেখে ভীষ্ম, দ্রোণ প্রভৃতি সকলে জনার্দন (শ্রীকৃষ্ণ)-কে সম্মান জানাতে নিজ নিজ আসন থেকে উঠে এগিয়ে গেলেন।

Verse 36

अभ्यागच्छति दाशाहें प्रज्ञाचक्षुनरिश्वर: । सहैव द्रोणभीष्माभ्यामुदतिष्ठन्महायशा:,ब्छ्खटाए- 00 - >खऋू | दशाहईनन्दन श्रीकृष्णके आते ही महायशस्वी प्रज्ञाचक्षु राजा धृतराष्ट्र भीष्म और द्रोणाचार्यके साथ ही उठ गये थे

দাশার্হ (শ্রীকৃষ্ণ) এগিয়ে আসতেই মহাযশস্বী নরাধিপ ধৃতরাষ্ট্র—চক্ষুহীন হয়েও প্রজ্ঞায় দৃষ্টিসম্পন্ন—ভীষ্ম ও দ্রোণের সঙ্গে সঙ্গে তৎক্ষণাৎ উঠে দাঁড়ালেন।

Verse 37

उत्तिष्ठति महाराजे धृतराष्टे जनेश्वरे । तानि राजसहस्राणि समुन्तस्थु: समनन्‍्तत:,महाराज धुृतराष्ट्रके उठनेपर वहाँ चारों ओर बैठे हुए सहस्रों नरेश उठकर खड़े हो गये

মহারাজ, জনেশ্বর ধৃতরাষ্ট্র উঠে দাঁড়াতেই চারিদিকে আসীন সহস্র রাজাও তৎক্ষণাৎ উঠে দাঁড়ালেন।

Verse 38

आसन सर्वतोभद्रं जाम्बूनदपरिष्कृतम्‌ । कृष्णार्थे कल्पितं तत्र धृतराष्ट्रस्य शासनात्‌,राजा धृतराष्ट्रकी आज्ञासे वहाँ भगवान्‌ श्रीकृष्णके लिये सुवर्णभूषित सर्वतोभद्र नामक सिंहासन रखा गया था

রাজা ধৃতরাষ্ট্রের আদেশে সেখানে কৃষ্ণের জন্য ‘সর্বতোভদ্র’ নামে, উৎকৃষ্ট স্বর্ণে অলংকৃত এক সিংহাসন প্রস্তুত করা হয়েছিল।

Verse 39

स्मयमानस्तु राजानं भीष्मद्रोणौ च माधव: । अभ्यभाषत धर्मात्मा राज्ञश्नान्यान्‌ यथावय:,उस समय धर्मात्मा भगवान्‌ श्रीकृष्णने मुसकराते हुए राजा धृतराष्ट्र, भीष्म, द्रोणाचार्य तथा अवस्थाके अनुसार अन्य राजाओंसे भी वार्तालाप किया

তখন ধর্মাত্মা মাধব শ্রীকৃষ্ণ মৃদু হাস্যে রাজা ধৃতরাষ্ট্রকে, এবং ভীষ্ম ও দ্রোণকে সম্বোধন করলেন; আর প্রত্যেকের মর্যাদা ও অবস্থান অনুসারে অন্যান্য রাজাদের সঙ্গেও কথা বললেন।

Verse 40

तत्र केशवमानर्चु: सम्यगभ्यागतं सभाम्‌ । राजान: पार्थिवा: सर्वे कुरवश्च जनार्दनम्‌,वहाँ सभामें पधारे हुए भगवान्‌ श्रीकृष्णका भूमण्डलके राजाओं तथा सभी कौरवोंने भलीभाँति पूजन किया

সেখানে সভায় যথাযথভাবে আগত জনার্দন কেশবকে পৃথিবীর সকল রাজা এবং কৌরবরাও বিধিপূর্বক পূজা-সম্মান জানালেন।

Verse 41

तत्र तिष्ठन्‌ स दाशाहों राजमध्ये परंतप: । अपश्यदन्तरिक्षस्थानृषीन्‌ परपुरंजय: । ततस्तानभिससम्प्रेक्ष्य नारदप्रमुखानृषीन्‌,राजाओंके बीचमें खड़े हुए शत्रुनगरविजयी परंतप श्रीकृष्णने देखा कि आकाशमें कुछ ऋषि-मुनि खड़े हैं। उन नारद आदि महर्षियोंको देखकर श्रीकृष्णने धीरेसे शान्तनुनन्दन भीष्मसे कहा-- “नरेश्वर! इस राजसभाको देखनेके लिये ऋषिगण पधारे हैं

রাজাদের মধ্যখানে দাঁড়িয়ে দাশার্হ পরন্তপ, শত্রুনগরজয়ী শ্রীকৃষ্ণ আকাশে অবস্থানরত কতক ঋষিকে দেখলেন। তারপর নারদ-প্রমুখ সেই মহর্ষিদের সুস্পষ্টভাবে দেখে (ভীষ্মের প্রতি ইঙ্গিত করলেন)।

Verse 42

अभ्यभाषत दाशार्हों भीष्म शान्तनवं शनै: । पार्थिवीं समितिं द्रष्टमूषयो$भ्यागता नूप,राजाओंके बीचमें खड़े हुए शत्रुनगरविजयी परंतप श्रीकृष्णने देखा कि आकाशमें कुछ ऋषि-मुनि खड़े हैं। उन नारद आदि महर्षियोंको देखकर श्रीकृष्णने धीरेसे शान्तनुनन्दन भीष्मसे कहा-- “नरेश्वर! इस राजसभाको देखनेके लिये ऋषिगण पधारे हैं

বৈশম্পায়ন বললেন— দাশার্হ শ্রীকৃষ্ণ শান্তনুনন্দন ভীষ্মকে ধীরে ধীরে বললেন— “নরেশ্বর! রাজাদের এই সভা দর্শন করতে ঋষিগণ আগমন করেছেন।” আকাশে অবস্থানরত নারদাদি মহর্ষিদের দেখে কৃষ্ণ ইঙ্গিত দিলেন— রাজনীতি ও আসন্ন যুদ্ধও উচ্চতর ধর্ম-দৃষ্টির অধীনে প্রত্যক্ষিত হচ্ছে।

Verse 43

निमन्त्रयन्तामासनैश्नव सत्कारेण च भूयसा । नैतेष्वनुपविष्टेषु शक्यं केनचिदासितुम्‌,“इन्हें अत्यन्त सत्कारपूर्वक आसन देकर निमन्त्रित किया जाय, क्योंकि इनके बैठे बिना कोई भी बैठ नहीं सकता

নতুন আসন এনে মহাসম্মানে তাঁদের আমন্ত্রণ করে বসানো হোক; কারণ এঁরা না বসা পর্যন্ত আর কেউ বসতে পারে না।

Verse 44

पूजा प्रयुज्यतामाशु मुनीनां भावितात्मनाम्‌ | ऋषीउ्छान्तनवो दृष्टवा सभाद्वारमुपस्थितान्‌

সংযতচিত্ত মুনিদের তৎক্ষণাৎ পূজা করা হোক। সভাদ্বারে উপস্থিত ঋষিদের দেখে শান্তনুনন্দন (ভীষ্ম) এ কথা বললেন।

Verse 45

त्वरमाणस्ततो भृत्यानासनानीत्यचोदयत्‌ | “पवित्र अन्तःकरणवाले इन मुनियोंकी शीघ्र पूजा की जानी चाहिये।” शान्तनुनन्दन भीष्मने मुनियोंको देखकर सभाद्वारपर स्थित हुए राजकर्मचारियोंको बड़ी उतावलीके साथ आज्ञा दी--'अरे! आसन लाओ' || ४४ ह ।। आसनान्यथ मृष्टानि महान्ति विपुलानि च

তখন তিনি তাড়াহুড়ো করে ভৃত্যদের আসন আনতে আদেশ দিলেন— “পবিত্র অন্তঃকরণসম্পন্ন এই মুনিদের বিলম্ব না করে সম্মান করতে হবে; হে লোকেরা, আসন আনো।” তারপর পালিশ করা, বৃহৎ ও প্রশস্ত আসন আনা হল।

Verse 46

तेषु तत्रोपविष्टेषु गृहीतार्ष्यषु भारत

হে ভারত! যখন তাঁরা সেখানে আসন গ্রহণ করলেন এবং ঋষি-সম্মত বিধি-আচার গ্রহণ করা হল, তখন…

Verse 47

दुःशासन: सात्यकये ददावासनमुत्तमम्‌

বৈশম্পায়ন বললেন—দুঃশাসন সাত্যকিকে এক উৎকৃষ্ট আসন দিল; তীব্র আলোচনার মধ্যেও প্রতিদ্বন্দ্বী শিবিরে বাহ্যিক সম্মান ও আতিথ্যের শিষ্টাচার রক্ষিত রইল।

Verse 48

अविदूरे तु कृष्णस्य कर्णदुर्योधनावुभौ

বৈশম্পায়ন বললেন—কৃষ্ণের অদূরে কর্ণ ও দুর্যোধন—উভয়েই দাঁড়িয়ে ছিল; সংঘাতের নির্ণায়ক মুহূর্তে কৃষ্ণকে ঘিরে নেতারা সমবেত হলে তাদের উপস্থিতি নিকট থেকেই প্রভাব বিস্তার করছিল।

Verse 49

गान्धारराज: शकुनिर्गान्धारैरभिरक्षित:

বৈশম্পায়ন বললেন—গান্ধাররাজ শকুনি গান্ধারীদের প্রহরায় সুরক্ষিত ছিল; এতে দরবারে তার সুদৃঢ় অবস্থান ও স্বজনদের সংগঠিত সমর্থন স্পষ্ট হল।

Verse 50

विदुरो मणिपीठे तु शुक्लस्पर्ध्याजिनोत्तरे

বৈশম্পায়ন বললেন—বিদুর মণিময় আসনে উপবিষ্ট ছিলেন এবং নির্মল শ্বেত মৃগচর্ম পরিধান করেছিলেন; তাঁর ভঙ্গিতে তপস্বীসুলভ গাম্ভীর্য ছিল, যা সংযম ও ধর্মবোধে পরিচালিত জীবনের ইঙ্গিত দিত।

Verse 51

संस्पृशन्नासनं शौरेमहामतिरुपाविशत्‌ । परम बुद्धिमान्‌ विदुर भगवान्‌ श्रीकृष्णके आसनका स्पर्श करते हुए एक मणिमय चौकीपर, जिसके ऊपर श्वैत रंगका स्पृहणीय मृगचर्म बिछाया गया था, बैठे थे || ५० हू ।। चिरस्य दृष्टवा दाशाह राजान: सर्व एव ते

বৈশম্পায়ন বললেন—আসন স্পর্শ করে মহামতি শৌরি (শ্রীকৃষ্ণ) উপবিষ্ট হলেন। পরম বুদ্ধিমান বিদুরও শ্রীকৃষ্ণের জন্য প্রস্তুত আসনটি শ্রদ্ধায় স্পর্শ করে, শ্বেত মৃগচর্ম পাতা মণিময় চৌকিতে বসলেন। দীর্ঘদিন পরে দাশার্হকে দেখে সেখানে উপস্থিত সকল রাজাই মনোযোগে স্থির হলেন।

Verse 52

अतसीपुष्पसंकाश: पीतवासा जनार्दन:

বৈশম্পায়ন বললেন—আলসীফুলের ন্যায় দীপ্তিমান, পীতবস্ত্রধারী জনার্দন (শ্রীকৃষ্ণ) শান্ত ও মঙ্গলময় জ্যোতিতে উদ্ভাসিত হয়ে আবির্ভূত হলেন—যেন আসন্ন সংঘাতের টানে যুদ্ধের পথে নৈতিক স্থৈর্য ও দিব্য নির্দেশের প্রতীক।

Verse 53

व्यभ्राजत सभाम ध्ये हेम्नीवोपहितो मणि:

বৈশম্পায়ন বললেন—সভামধ্যস্থলে তিনি এমন দীপ্তিমান ছিলেন, যেন স্বর্ণে বসানো এক মণি; প্রবীণ ও রাজাদের ভিড়েও তাঁর গাম্ভীর্যময় জ্যোতি সর্বাধিক উজ্জ্বল হয়ে উঠেছিল।

Verse 54

अलसीके फूलकी भाँति मनोहर श्याम कान्तिवाले पीताम्बरधारी श्रीकृष्ण उस सभाके मध्यभागमें स्वर्ण-पात्रमें रखी हुई नीलमणिके समान शोभा पा रहे थे ।। ततस्तृष्णीं सर्वमासीद्‌ गोविन्दगतमानसम्‌ | न तत्र कश्चित्‌ किज्चिद्‌ वा व्याजहार पुमान्‌ क्वचित्‌,उस समय वहाँ सबका मन भगवान्‌ गोविन्दमें ही लगा हुआ था। अतः सभी चुपचाप बैठे थे। कोई मनुष्य कहीं कुछ भी बोल नहीं रहा था

আলসীফুলের মতো মনোহর শ্যামকান্তিধারী, পীতাম্বর পরিহিত শ্রীকৃষ্ণ সভার মধ্যভাগে স্বর্ণপাত্রে স্থাপিত নীলমণির ন্যায় শোভা পাচ্ছিলেন। তারপর সর্বত্র নীরবতা নেমে এল, কারণ সকলের মন গোবিন্দে নিবিষ্ট হল; সেই সভায় কোথাও কোনো মানুষ একটি কথাও উচ্চারণ করল না।

Verse 94

इति श्रीमहा भारते उद्योगपर्वणि भगवद्यानपर्वणि श्रीकृष्णस भाप्रवेशे चतुर्नवतितमो< ध्याय:

এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বের ভগবদ্যানপর্বে শ্রীকৃষ্ণের সভাপ্রবেশ-বর্ণনাসংবলিত চুরানব্বইতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 456

मणिकाजउ्चनचित्राणि समाजहुस्ततस्ततः । तब सेवकोंने इधर-उधरसे मणि एवं सुवर्ण जड़े हुए शुद्ध, विशाल एवं विस्तृत आसन लाकर रख दिये

বৈশম্পায়ন বললেন—তখন পরিচারকেরা নানা দিক থেকে মণি ও স্বর্ণখচিত, শুচি, বৃহৎ ও প্রশস্ত আসন দ্রুত সংগ্রহ করে এনে যথাস্থানে স্থাপন করল।

Verse 466

निषसादासने कृष्णो राजानश्व यथासनम्‌ | भारत! अर्घ्य ग्रहण करके जब ऋषिलोग उन आसनोंपर बैठ गये, तब भगवान्‌ श्रीकृष्ण तथा अन्य राजाओंने भी अपना-अपना आसन ग्रहण किया

বৈশম্পায়ন বললেন—কৃষ্ণ তাঁর আসনে বসলেন, আর রাজাগণও যথাযথভাবে নিজ নিজ স্থানে আসীন হলেন। হে ভারতবংশধর! ঋষিগণ অর্ঘ্য গ্রহণ করে নির্দিষ্ট আসনে বসার পর, ভগবান শ্রীকৃষ্ণ এবং অন্যান্য রাজাগণও নিজেদের আসন গ্রহণ করলেন।

Verse 476

विविंशतिर्ददौ पीठं काज्चनं कृतवर्मणे । दुःशासनने सात्यकिको उत्तम आसन दिया एवं विविंशतिने कृतवर्माको स्वर्णमय आसन प्रदान किया

বৈশম্পায়ন বললেন—বিবিংশতি কৃতবর্মাকে একটি স্বর্ণময় আসন দিল। আর দুঃশাসন সাত্যকিকে এক উৎকৃষ্ট আসন প্রদান করল।

Verse 486

एकासने महात्मानौ निषीदतुरमर्षणौ । अमर्षमें भरे हुए महामना कर्ण और दुर्योधन दोनों एक आसनपर श्रीकृष्णके पास ही बैठे थे

বৈশম্পায়ন বললেন—অপমান সহ্য করতে অক্ষম, ক্রোধে ভরা সেই দুই মহাত্মা—কর্ণ ও দুর্যোধন—একই আসনে শ্রীকৃষ্ণের নিকটে বসেছিল।

Verse 496

निषसादासने राजा सहतपुत्रो विशाम्पते । जनमेजय! गान्धारदेशीय सैनिकोंसे सुरक्षित पुत्रसहित गान्धारराज शकुनि भी एक आसनपर बैठा था

বৈশম্পায়ন বললেন—হে জনমেজয়! প্রজাপালক রাজা পুত্রসহ নিজের আসনে বসলেন। আর গন্ধারদেশীয় সৈন্যদের দ্বারা রক্ষিত গন্ধাররাজ শকুনি-ও পুত্রসহ এক আসনে আসীন হল।

Verse 513

अमृतस्येव नातृप्यन्‌ प्रेक्षमाणा जनार्दनम्‌ | सब राजा दीर्घकालके पश्चात्‌ दशार्हकुलभूषण भगवान्‌ जनार्दनको देखकर उन्हींकी ओर एकटक दृष्टि लगाये रहे, मानो अमृत पी रहे हों। इस प्रकार उन्हें तृप्ति ही नहीं होती थी

বৈশম্পায়ন বললেন—জনার্দনকে একদৃষ্টে চেয়ে সেই রাজা তৃপ্ত হতে পারল না, যেমন অমৃত পান করলেও তৃপ্তি আসে না। বহুদিন পরে দশার্হকুলভূষণ ভগবান জনার্দনকে দেখে সে তাঁর দিকেই স্থির দৃষ্টি রাখল, যেন অমৃতের স্বাদ গ্রহণ করছে; তবু তার তৃপ্তি হল না।

Frequently Asked Questions

The dilemma is whether the sovereign will enforce lawful restraint within his own family—granting a just settlement and curbing harmful ambition—or allow partiality and inaction to convert a resolvable succession dispute into widespread destruction.

Governance is ethical agency: peace is achievable when rulers choose truth, restraint, and public welfare over short-term acquisition. Institutional silence in the face of wrongdoing is portrayed as a failure of dharma, not neutrality.

No explicit phalaśruti is stated in this passage; instead, the chapter uses consequentialist meta-commentary—warning that ignored counsel and assembly complicity lead to systemic harm—thereby underscoring the interpretive value of dharma-centered political judgment.